शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

क्या इस्लाम नया धर्म है ?

इस्लाम के सम्बन्ध में सब से बड़ा संदेह जो लोगों में पाया जाता हैं यह है कि इस्लाम एक नया धर्म है जिसे सब से पहले मुहम्मद साहिब ने सातवीं शताब्दी में मानव के समक्ष प्रस्तुत किया-
हालांकि यह बात सत्य के बिल्कुल विरोद्ध है, मुहम्मद सल्ल0 अवश्य सातवीं शताब्दी में पैदा हुए परन्तु उन्होंने इस्लाम की स्थापना नहीं किया बल्कि उसी संदेश की ओर लोगों को आमंत्रित किया जो सारे संदेष्टाओं के संदेशों का सार रहा।
ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो एसा नहीं है कि उसने उनका मार्गदर्शन न किया जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव का संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य ने अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें परन्तु सब से अन्त में ईश्वर ने मुहम्मद सल्ल0 को भेजा।
अब आप पूछ सकते हैं कि उन्हों ने किस चीज़ की ओर बुलाया ? तो इसका उत्तर यह है कि उन्होंने मानव को यह ईश्वरीय संदेश पहुंचाया कि
(1) ईश्वर केवल एक है केवल उसी ईश्वर की पूजा होनी चाहिए उसके अतिरिक्त कोई शक्ति लाभ अथवा हान का अधिकार नहीं रखती
(2) सारे मानव एक ही ईश्वर की रचना हैं क्योंकि उनकी रचना एक ही माता पिता से हुई अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु कहते हैं और सतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, वह प्रथम मनुष्य ने जो धरती पर बसाए गए, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ।
(3) मुहम्मद सल्ल0 ने शताब्दियों से मन में बैठी हुई जातिवाद का खण्डन किया जो लोगों के हृदय में बैठ चुका था और प्रत्येक मनुष्य को समान क़रार दिया।
और जब मुहम्मद सल्ल0 ने वही संदेश दिया जो संदेश हर युग में संदेष्टा देते रहे थे।
इस लिए इस्लाम को नया धर्म कहना ग़लत होगा।
फिर यह भी याद रखें कि इस्लाम में 6 बोतों पर विश्वास रखने का आदेश दिया गया है जिस पर सारे मुसलमानों का विश्वास रखना आवश्यक है। उसे हम ईमान के स्तम्भ कहते हैं यदि कोई मुसलमान उनमें से किसी एक का इनकार कर देता है तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा उनमें से एक है ईश्वर के भेजे हुए संदेष्टाओं पर विश्वास करना – अर्थात इस बात पर विश्वास करना कि ईश्वर ने हर युग तथा देश में मानव मार्गदर्शन हेतु संदेष्टाओं को भेजा जिन्होंने मानव को एक ईश्वर की पूजा की ओर बोलाया और मूर्ति जूजा से दूर रखा, पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था।
जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया।
वह विश्व नायक कौन हैं इस सम्बन्ध में आप जानना चाहते हैं तो आपको डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय की पुस्तक कल्की अवतार और मुहम्मद सल्ल0 तथा डा0 एम ए श्री वास्तव की पुस्तक ( मुहम्मद सल0 और भारतीय धर्म ग्रन्थ) का अध्ययन करना होगा जिसमें इन महान विद्वानों ने सत्य को स्वीकार करते हुए हिन्दुओं को आमंत्रन दिया है कि हिन्दू धर्म में जिस कल्कि अवतार तथा नराशंस के आने की प्रतीक्षा हो रही है वह सातवीं शताब्दी में आ गए और वही मुहम्मद सल्ल0 हैं ।
अंततः ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा, आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है ।
मुहम्मद सल्ल0 ने कभी यह दावा नहीं किया कि वह कोई नया धर्म लेकर आए हैं, वही इस्लाम जिसकी शिक्षा आदि पुरुष आदम (मनू ) ने दिया था उसी को पूर्ण करने के लिए मुहम्मद सल्ल0 भेजे गए। आज मानव का कल्याण इस्लाम धर्म ही में है क्यों कि इस्लाम उन्हीं का है, क़ुरआन उन्हीं का है तथा मुहम्मद सल्ल0 उन्हीं के लिए आए हैं। लेकिन अज्ञानता का बुरा हो कि लोग आज उन्हीं का विरोद्ध कर रहे हैं जो उनके कल्याण हेतु भेजे गए। मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूँ कि ग़लती हमारी हैं कि हम हिन्दू मुस्लिम भारत में शताब्दियों से रह रहे हैं पर हमने सत्य को आप से छुपाए रखा। और ज्ञात है कि यदि इनसान किसी चीज़ की सत्यता को नहीं जानता है तो उसका विरोद्ध करता ही है। अतः आप से निवेदन है कि मेरी बातों पर विशाल हृदय से निष्पक्ष हो कर चिंतन मनन करेंगे। तथा इस्लाम का अध्ययन आरम्भ कर दें।

सोमवार, 11 अगस्त 2008

दोषपूर्ण विचार क्यों?

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वह क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

वास्तविकता यह है कि हम सदैव नकारात्मक सोचते हैं जिसका परिणाम है कि हमारे देश में धृणा फैल रही है। हमारा ज्ञान एक दूसरे के प्रित सुनी सुनाई बातों दोषपूर्ण-विचार तथा काल्पनिक वृत्तानतों पर आधारित है।
भई! इस्लाम तो सारे मानव का धर्म है बल्कि यह सनातन धर्म है इसी के अन्तिम दूत कल्कि अवतार हैं। जब तक इस्लाम का सकारात्मक अध्ययन न होगा हमारे हृदय से घृणा भाव समाप्त नहीं हो सकती। इसी उद्देश्य के अंतर्गत हमने इस्लाम के सकारात्मक परिचय का प्रयास किया है। हमारी आशा है कि हमारे देशवासी विशाल हृदय से इस्लाम का अध्ययन करें।

एक तथ्य

यह भुमि किसी इनसान की नही बल्कि ईश्वर की है जिसने इनसान को इस दुनिया मे बसाया है सब से पहले इनसान आदम और हव्वा है जिनको हिन्दुओ के हाँ मनु और सलरोपा कहा जाता है, इसाइयो के हाँ एदम और इव यह जगत के पहले इनसान है जिनका धर्म इस्लाम (सनातन धर्म) था इस लिए यह कहना कि भारत राम का है सर्वथा गलत है --- आज लोग जाति और धर्म के आधार पर एक दूसरे से अलग हो रहे है लेकिन कभी वह यह नही सोचते कि सारे जगत का स्वमी केवल एक ईश्वर है, एक ही माता पिता से इनसान का वजूद हुआ है, एक प्रकार के विर्य ही से इनसान पैदा होता है, इतनी समानता के बावजूद क्या इनसान का धर्म अलग अलग हो सकता है?? इतिहास मे केवल मुहम्मद स्ल्ल० ऐसे इनसान है जिन्होने विश्व बन्धुत्व का नारा लगाया, सारे इनसानो को समान क़रार दिया, और केवल एक ईश्वर की पुजा की ओर सारे मानव को बुलाया

एक इसाई वैज्ञानिक Dr. Michael H.Hart ने अपनी पुस्तक The 100 (New York 1978) मे लिखा है कि " आप इतिहास के मात्र व्यक्ति है जो अन्तिम सीमा तक सफल रहे धार्मिक स्तर पर भी और सांसारिक स्तर पर भी"
आखिर क्यो एक इसाई मुहम्मद सल्ल० को दुनिया के क्रान्तिकारी व्यक्तियो मे प्रथम स्थान दे रहा है ? इसलिए कि उनहोने अपनी जाति की ओर नही बुलाया, अपनी पूजा करने को नही कहा, हालाँकि उनको विभिन्न चमत्कारियाँ दी गई थी, क़ुरआन भी एक चमत्कार है जो ईश्वाणी है और चुनौति देता है कि कोई मानव उसके समान एक श्लोक भी पेश नही कर सकते (सुर्:२ आयत २४))
मुहम्मद सल्ल्० ने चाँद की ओर इशारा किया तो चाँद दो टूकड़े हो गया जिसका समर्थन नील आर्म्स टृंग जैसे वैज्ञानिक तथा उनके सहयोगियो ने किया है जब कि वह चाँद पर ग्ए थे .
इतनी चमत्कारियो के बावजूद उन्होने मरते मरते समय कहा कि लोगो मेरी पूजा मत करना मत करना, मै एक मानव मात्र हूँ, मेरे अन्दर कोई ईश्वरीय गुण नही ------------ आज केवल इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसमे केवल एक ईश्वर की पूजा की जाती है जो ईश्वर केवल मुसलमानो का स्वामी नही बल्कि सारे जगत का स्वामी है ............... इस्लाम हमे बताता है कि जिसका जो पद है उसे उसी पद पर रखा जाए, मानव कभी इश्वर नही हो सकता , इसलिए मानव के रूप मे जो हो इस्लाम मे उसकी पूजा महापाप है

रविवार, 10 अगस्त 2008

ईश्वर को जानें

बहुत से लोग कहते हैं कि धर्म नाम है इनसानियत का - मैं कहता हूं कि यह बात कुछ हद तक सही हैं पूर्ण रूप में नहीं क्योंकि असल धर्म यह है कि हम अपने प्रभू को पहचान लें तथा उसकी पूजा करने लगें क्योंकि संसार परीक्षास्थल है परिणाम स्थल नहीं यहाँ सब लोगों को एक समय के लिए रखा गया हैं ताकि ईश्वर देखे कि कौन उसका आभारी होता है तथा कौन अकृतज्ञ
इस लिए में अपने उन भाइयों से कहूंगा जो ईश्वर का नाम अवश्य लेते हैं पर उसे पहचानते नहीं हैं उसे पहचानने का कष्ट करें वह किसी जाति का प्रभू नहीं बल्कि पूरे संसार का है यह है हमारे जीवन का मूल प्रश्न अर्थात ईश्वर की सही खोज

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

टैगोर ने कहा


महाकवि टैगोर के साथ एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे मौलाना सय्यद सुलैमान नदवी, इस्लाम के इतिहासकार, इन दोनों महान विद्वानों को एक साथ देख कर किसी व्यक्ति ने यूं प्रश्न कर दिया कि:
" आज इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों न फैल रहा है जितनी तेज़ी से मुहम्मद साहब और उनके बाद के युग में फैला ?"
सय्यद साहिब ने टैगोर से इस प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की, तब टैगोर ने बताया कि:
" तब सत्य धर्म की अच्छाइयों और भलाइयों को जानने के लिए लोगों को पुस्तकालयों का रुख़ नहीं करना पड़ता था, वह हर मुसलमान के जीवन ही में मौजूद था।"
अर्थात् शुरू ज़माने में लोग मुसलमानों के व्यवहार को देख कर सच्चे धर्म का पता लगा लेते थे कि जिनके व्यवहार इतने अच्छे होंगे उनका धर्म कितना अच्छा होगा, लेकिन आज लोगों को इस्लाम पुस्तकों में ढूंढने की ज़रूरत पड़ती है और वही इस्लाम की सच्चाई को जानने में सफल होगा जो इस्लाम का अध्ययन करेगा।
क्या हम मुसलमान टैगोर की बात पर ध्यान देंगें ? जी हाँ। आज सब से बड़ी बाधा हमारे देशवासियों के लिए कुछ मुसलमानों के घृणित कर्तव्य हैं। आज वे अपने ही धर्म इस्लाम का इस कारण विरोध कर रहे हैं कि वे कुछ मुसलमानों को उसके अनुसार चलते नहीं देखते।