सोमवार, 24 नवंबर 2008

कल्की अवतार कौन?

मुहम्मद सल्ल0 वह अन्तिम संदेष्टा हैं जिनके आगमन की भविष्यवाणी उनके पूर्व प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थों ने की है।
हम यहाँ संक्षिप्त में कुछ उदाहरण प्रस्तुत करने पर बस करेंगे।
महात्मा बुद्ध की भविष्यवाणीः महात्मा बुद्ध ने मरते समय अपने शिष्य नन्दा को कान में (मैत्रेय) के नाम से बुद्ध के आने की सूचना दी जिसका अर्थ (मुहम्मद) होता है।
नराशंस और मुहम्मदः वेदों में नराशंस के नाम से 31 स्थान पर और पुराणों में (कल्की अवतार) के नाम से मुहम्मद सल्ल0 का वर्णन मिलता है। नराशंस (नर) और (आशंस) दो शब्दों से मिल कर बना है, नर का अर्थ होता है (मनुष्य) और (आशंस) का अर्थ होता है (प्रशंसित) अर्थात ( मनुष्यों द्वारा प्रशंसित) और मुहम्मद का अर्थ भी (प्रशंसित मनुष्य) ही होता है। और आप पानी को हिन्दी में जल कहते हैं, अंग्रेज़ी में वाटर कहते हैं, फारसी में आब कहते हैं, और अरबी में माअ कहते हैं पर शब्द एक ही है वैसे ही मुहम्मद को संस्कृत में नराशंत कहा गया है।
मुहम्मद तथा अहमद का उल्लेखः भविष्य पुराण (323/5/8) में है (ऐक दूसरे देश में एक आचार्य अपने मित्रों के साथ आयेगा उनका मान महामद होगा वे रेगिस्तानी क्षेत्र में आएंगे)
और यजुर्वेद (18/31) में है (वेदामहेत पुरुष महान्तमादित्तयवर्ण तमसः प्रस्तावयनाय) वेद अहमद महान व्यक्ति हैं, सूर्य के समान अंधेरे को समाप्त करने वाले,उन्हीं को जान कर प्रलोक में सफल हुआ जा सकता है, उसके अतिरिक्त सफलता तक पहुंचने का कोई दूसरा मार्ग नहीं।)जन्म तिथि का उल्लेखः कल्कि पुराण (2/15) में अन्तिम संदेष्टा के जन्म तिथि का भी उल्लेख किया गया है (जिसके जन्म लेने से दुखी मानवता का कल्याण होगा, उसका जन्म मधुमास के शम्भल पक्ष और रबी फस्ल में चन्द्रमा की 12वीं तिथि को होगा) मुहम्मद सल्ल0 का जन्म भी 12 रबीउल अव्वल को हुआ। रबीउल अव्वल का अर्थ होता है (मधुमास के हर्षोल्लास का महीना)
जन्म भूमि तथा माता पिता का उल्लेखः
श्रीमद-भगवद महापुराण (12/2/18) में कल्की अवतार की जन्मभूमि शम्भल बताया गया है, शम्भल का शाब्दिक अर्थ है (शान्ति का स्थान) औ मक्का जहाँ मुहम्मद सल्ल0 पैदा हुए उसे अरबी में (दारुल अम्न) कहा जाता है, जिसका अर्थ (शान्ति का घर) है।
विष्णुयश कल्कि के पिता का नाम बताया गया है और मुहम्मद सल्ल0 के पिता का नाम अब्दुल्लाह था और जो अर्थ विष्णु का होता है वही अर्थ अब्दुल्लाह का भी होता है। विष्णु यानी अल्लाह और यश यानी बन्दा अर्थात अल्लाह का बन्दा (अब्दुल्लाह)
उसी प्राकार कल्की की माँ का नाम सुमति (सोमवती) आया है जिसका अर्थ होता है (शान्ति एवं मननशील स्वभाव वाली) और मुहम्मद सल्ल0 की माता का नाम भी (आमना) था जिसका अर्थ है (शान्ति वाली) ।
डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय ने अपनी पुस्तक ( कल्की अवतार और मुहम्मद सल्ल0 ) में कल्की तथा मुहम्मद सल्ल0 की विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया है कि आज हिन्दु भाई जिस कल्की अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह आ चुके और वही मुहम्मद सल्ल0 हैं।

रविवार, 23 नवंबर 2008

क़ुरआन में परिवर्तन क्यों सम्भव नहीं ?

ईश्वर ने मानव मार्गदशर्न हेतु हर युग तथा हर देश में संदेष्टाओं को भेजा और उनके साथ धार्मिक ग्रन्थ भी अवतरित किया ताकि लोग उसके आदेशानुसार जीवन बिताएं परन्तु पहले के प्रत्येक धर्म तथा ग्रन्थ सीमित काल तक होते थे । बाद में आने वाले संदेष्टाओं के ग्रन्थ पहले आने वाले ग्रन्थ को निरस्त कर देते थे।
ईश्वर ने सब से अंत में जबकि मानव बुद्धि विवेक ऊंची हो गई अन्तिम संदेष्टा ( कल्की अवतार जिनकी आज हिन्दू समाज में प्रतीक्षा हो रही है) को सातवीं शताब्दी में भेजा तथा उन पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन का अवतरण किया। इस धरती पर क़ुरआन के अतिरिक्त कोई धार्मिक ग्रन्थ अपनी वास्तविक रूप में शेष नहीं है चाहे तौरात हो या इंजील (बाईबल) जब कि क़ुरआन अन्तिम ग्रन्थ है तथा अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 कल्की अवतार हैं अतः आपका लाया हुआ धर्म भी अन्तिम धर्म है । अब प्रलय तक आने वाले सारे इनसानों को क़ुरआन के आदेशानुसार जीवन बिताना है।
अब प्रश्न यह है कि क़ुरआन में परिवर्तन क्यों सम्भव नहीं ? तो उसका उत्तर यह है कि
(1) क़ुरआन का अवतरण एक चमत्कार के रूप में हुआ है अर्थात क़ुरआन को ईश्वर नें कल्कि अवतार के लिए चमत्कार के रुप में उतारा। चमत्कार का अर्थ यह है कि ईश्वर अपने संदेष्टाओं को उनकी ईश्दुतत्व के समर्थन के लिए चमत्कारियाँ देता था। मुहम्मद सल्ल0 के लिए क़ुरआन एक चमत्कार है । क़ुरआन में कहा गया है (सूरः बक़रा 2 - 23) यदि तुम क़ुरआन के सम्बन्ध में संदेह में पड़े हो तो उसके समान एक सूरः ही ले आओ यदि तुम सच्चे हो ) पर इतिहास साक्षी है कि आज तक कोई क़ुरआन के समान न एक टूकड़ा बना सका है और न बना सकता है।
(2) ईश्वर ने स्वयं इस ग्रन्थ की सुरक्षा का विशेष प्रबन्ध भी किया वह इस प्रकार कि उसे उतारते समय कहा ( मैंने क़ुरअन को अवतरित किया है तथा स्वयं हम ही उसकी सुरक्षा करने वाले हैं - सूरः हिज्र 9)
(3) कुरआन मुहम्मद सल्ल0 की वाणी नहीं बल्कि ईश्वर की वाणी है जो 23 वर्ष की अवधि में आवश्यकतानुसार अवतरित हुआ। उसने जब जब मुहम्मद सल्ल0 पर क़ुरआन को अवतरित किया मुहम्मद सल्ल0 ने अपने कातिबों (जिनकी संख्या 13 थी) से उसे लिखवा दिया फिर उसे स्वयं अपने साथियों को कंठस्त कराया । उसी प्रकार आकाशीय दूत जिब्रील अलै0 प्रति वर्ष रमज़ान के महीनें में आपके पास आते और क़ुरआन का दौरा करते थे । इस प्रकार लिपि तथा ह्रदय दोनों में कुरआन सुरक्षित हो गया।
(4) संसार के प्रत्येक ग्रन्थों में केवल क़ुरआन एक ऐसा ग्रन्थ है जिसको सब से ज्यादा पढा जाता है । सारी धरती पर बसने वाले लोगों में कहीं पर भी क़ुरआन के किसी एक शब्द में भी कोई परिवर्तन नहीं पाया जाता यहाँ तककि उसके अक्षर और शैली में भी कोई फर्क नहीं मिल सकता।
(5) यदि दुनिया के सारे ग्रन्थ जला दिए जायें तो उसके मानने वालों के लिए उनका दोबारा लिख लेना सम्भव नहीं क्योंकि उन्होंने उसे ह्रदय में सुरक्षित नहीं किया हुआ है यदि यदि काम क़ुरआन के साथ हो तो उसके कल ही हो कर हर देश में उसकी कितनी प्रतियाँ तैयार हो जाएंगी क्यों कि मुसलमानों के लाखों लोगों ने हर देश में उसे पूरा का पूरा कंठस्त किया हुआ है ।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

काफिर कह कर गाली क्यों ?

मुसलमान ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कह कर गाली क्यों देते हैं ?
उत्तर : काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है-
अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस। ( डा0 ज़ाकीर नाइक )

इस्लाम नया धर्म नहीं

इस्लाम के सम्बन्ध में आम तौर पर यह कहा जाता है कि यह धर्म सातवी शताब्दी ईसवी में मुहम्मद साहिब का लाया हुआ धर्म है। हालांकि इस्लाम मुहम्मद सल्ल० का लाया हुआ धर्म नहीं और न ही वह इस्लाम के संस्थापक हैं। अधिकांश लोग इसी तथ्य को न समझ सके जिसके कारण यह कहने लगे कि इस्लाम मुहम्मद सल्ल0 का लाया हुआ धर्म है अथवा एक नया धर्म है। हालांकि हर मुसलमान यह जानता मानता तथा इस बात पर आस्था रखता है कि मुहम्मद सल्ल0 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि उसको अन्तम स्वरूप देने वाले हैं। ऐसा ही जैसे किसी एक देश में भारत का राजदूत भेजा जाता है तो राजदूत को अपने आदेश का पालन कराने का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक अपने पद पर आसीन रहे। जब दो साल की अवधि गुज़रने के बाद दूसरा राजदूत आ जाए तो पहला राजदूत अपना आदेश नहीं चला सकता क्योंकि उसकी कार्य-अवधि समाप्त हो चुकी, ऐसा ही ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें वह हर देश और हर युग में भेजे गए उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती हैं, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे तथा तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ती पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं क्यों कि उनकी रचना एक ही ईश्वर ने की है, सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है ( अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु और सतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ) पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखों का सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना।
परन्तु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाला तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की संतान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता हैं कि उन्होंने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार किया था तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया
बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया जैसे एक हरकारा (डाक घर का पत्रवाहक ) पत्र ले कर किसी के पास जाए अब उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके पर यदि वह पत्रवाहक को ही पिता समझने लगे और उन्हीं का आदर सम्मान शुरू कर दे तो इसे
जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है ।

वेदों तथा क़ुरआन की शिक्षाओं में समानता

मैंने कुरआन तथा वेदों का अध्ययन किया तो पाया कि दोनों की शिक्षायें एक ही हैं और वह यह कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए जिस ईश्वर के सम्बन्ध में आप ने लिखा है। यही धर्म इस्लाम कहें या सनातन धर्म । लेकिन शर्त यह है कि उस धर्म में केवल एक ईश्वर की पूजा होती हो, न कि विभिन्न भगवानों की क्योंकि मैंने यही शिक्षा क़ुरआन , बाइबल तथा वेदों में पाया है---- पर आज लोग ऐसा कर नहीं रहे हैं । क़ुरआन के जैसे ही वेदों ने मूर्ति पूजा का खंडन किया है, एक दो जगह नहीं वल्कि सैकरों जगह । बल्कि जिस प्रकार इस्लामी कलमा यह है कि ( अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं ) उसी प्रकार हिन्दू धर्म के वेदान्त का ब्रह्मसुत्रा यह है ( एकम ब्रह्मम द्वितीय नास्ते:नहे ना नास्ते किंचन अर्थात ईश्वर एक है दूसरा नहीं है , नहीं है , नहीं है, कदापि नहीं है) यही नहीं बल्कि यजुर्वेद (32/3) में है न तस्य प्रतिमा अस्ति अर्थात जिस प्रभू का बड़ा प्रसिद्ध यश है उसकी कोई प्रतिमा नहीं ।

मानव का अपने रब के साथ सम्बंध

वह बुनयाद जिस पर बन्दे का अपने पैदा करने वाले के साथ सम्बन्ध स्थापित होता है वह कलमा शहादत "लाइलाह इल्ल-ल्लाह" है। जिसका अर्थ है "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं"। अपने रब का सच्चा बन्दा वही है जो अपने जीवन की हर स्थिति में अल्लाह तआला की ओर लपके, उसी पर भरोसा करे, उसी का डर रखे और उसी के नियम को स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे।
इबादतें आत्मा को शुद्ध एवं उजव्वल करती हैं, हर स्थिति में अल्लाह की निगरानी का एहसास इनसान को इस योग्य बनाता है कि वह बुराइयों से रुक जाए और नेक अमलों की अदाएगी में जलदी करे। औऱ यह तरीका समाज को शान्तिपूर्ण रखने में बड़ा सहायक है।
बल्कि इबादतें सहानुभूति, नयाय, प्रतिज्ञापालन, सच्चाई, दयालुता, पारस्परिक सम्बंध, स्वार्थ त्याग और अन्य अच्छे आचरण पर उभारती हैं। अतः जब इनसान का सम्बन्ध अपने रब के साथ ठोस हो जाता है तो एक व्यक्ति और समाज के बीच सम्बन्ध का एक विशाल द्वार खुल जाता है। और इस सम्बन्ध को स्थापित करने में मूल भूमिका अल्लाह की इबादत और एकेश्वरवाद की होती है।

इस्लाम की महानता

जब तक मुस्लिम समाज इस्लामी शिक्षाओं को मज़बूती से थामे रहा हर प्रकार के मतभेद, भिन्नता तथा फसाद से सर्वथा सुरक्षित रहा और उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन न हो सका। इस्लाम के उत्थान काल में इस्लामी जगत की शक्ति का रहस्य यही था और पतन के इस दौर में उन्नति पाने का रहस्य भी यही है।
यह धरती विभिन्न नियमों, सिद्धांतों और संस्कृतियों पर सम्मिलित समाज का तजरबा कर चुकी है अब यह कहना बिल्कुल सच होगा कि इस्लामी नियम उन सारे नियमों में जिसे मानवता ने आज तक परखा है श्रेष्ठ, उत्तम और अति लाभदायक है। इस का आगमन ही इस लिए हुआ है ताकि जीवन की रहनुमाई करे। उसके लगाम को थामे रहे और मानव समुदाय के सामने ऐसा जीवन व्यवस्था पेश करे जिसकी रोशनी में वह अपना रास्ता तै कर सके। इस्लाम ने इस्लामी वंश और इस्लामी समाज को अति ठोस और संतुलित नियम पर स्थापित किया है जिसकी बुनयाद फज़ीलत और तक़वा (संयम) पर रखी गई है। और उसे मनोकामनाओं तथा कामवासनाओं पर क़ाबू पाने के लिए हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है। अतः इस्लामी नियम का आधार इस बात पर है कि लोग अच्छे आचरण से सुसज्जित हो जाएं, इस की ओर अल्लाह के रसूल सल0 ने इस प्रकार संकेत फरमाया "मुझे इस लिए भेजा गया है ताकि नैतिकता को शिखर तक पहुंचा दूं।"

मानवता का धर्म इस्लाम है

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद रहि0 ने इस्लाम के सम्बन्ध में निम्नलिखित टिप्पणी की है जो आँखें खोल देने वाली है। इसे पढ़ें और इस पर चिंतन मनन करें। ईश्वर की आप पर दया हो।
"मुझे पता चला कि जिस धर्म को संसार इस्लाम के नाम से जानता है वास्तव में वही धार्मिक मतभेद के प्रश्न का वास्तविक समाधान है। इस्लाम दुनिया में कोई नया धर्म स्थापित नहीं करना चाहता बल्कि उसका आंदोनक स्वंय उसके बयान के अनुसार मात्र यह है कि संसार में प्रत्येक धर्म के मानने वाले अपनी वास्तविक और शुद्ध सत्य पर आ जाएं और बाहर से मिलाई हुई झूटी बातों को छोड़ दें- यदि वह ऐसा करें तो जो आस्था उनके पास होगी उसी का नाम क़ुरआन की बोली में इस्लाम है।
क़ुरआन कहता है कि खुदा की सच्चाई एक है, आरम्भ से एक है, और सारे इनसानों और समुदायों के लिए समान रूप में आती रही है, दुनिया का कोई देश और कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ अल्लाह के सच्चे बन्दे न पैदा हुए हों और उन्होंने सच्चाई की शिक्षा न दी हो, परन्तु सदैव ऐसा हुआ कि लोग कुछ दिनों तक उस पर क़ाएम रहे फिर अपनी कल्पना और अंधविश्वास से भिन्न भिन्न आधुनिक और झूटी बातें निकाल कर इस तरह फैला दीं कि वह ईश्वर की सच्चाई इनसानी मिलावट के अनदर संदिग्ध हो गई।
अब आवश्यकता थी कि सब को जागरुक करने के लिए एक विश्य-व्यापी आवाज़ लगाई जाए, यह इस्लाम है। वह इसाई से कहता है कि सच्चा इसाई बने, यहूदी से कहता है कि सच्चा यहूदी बने, पारसी से कहता है कि सच्चा पारसी बने, उसी प्रकार हिन्दुओं से कहता है कि अपनी वास्तविक सत्यता को पुनः स्थापित कर लें, यह सब यदि ऐसा कर लें तो वह वही एक ही सत्यता होगी जो हमेशा से है और हमेशा सब को दी गई है, कोई समुदाय नहीं कह सकता कि वह केवल उसी की सम्पत्ती है।
उसी का नाम इस्लाम है और वही प्राकृतिक धर्म है अर्थात ईश्वर का बनाया हुआ नेचर, उसी पर सारा जगत चल रहा है, सूर्य का भी वही धर्म है, ज़मीन भी उसी को माने हुए हर समय घूम रही है और कौन कह सकता है कि ऐसी ही कितनी ज़मीनें और दुनियाएं हैं और एक ईश्वर के ठहराए हुए एक ही नियम पर अमल कर रही हैं।
अतः क़ुरआन लोगों को उनके धर्म से छोड़ाना नहीं चाहता बल्कि उनके वास्तविक धर्म पर उनको पुनः स्थापित कर देना चाहता है। दुनिया में विभिन्न धर्म हैं, हर धर्म का अनुयाई समझता है कि सत्य केवल उसी के भाग में आई है और बाक़ी सब असत्य पर हैं मानो समुदाय और नस्ल के जैसे सच्चाई की भी मीरास है अब अगर फैसला हो तो क्यों कर हो? मतभेद दूर हो तो किस प्रकार हो? उसकी केवल तीन ही सूरतें हो सकती हैं एक यह कि सब सत्य पर हैं, यह हो नहीं सकता क्योंकि सत्य एक से अधिक नहीं और सत्य में मतभेद नहीं हो सकता, दूसरी यह कि सब असत्य पर हैं इस से भी फैसला नहीं होता क्योंकि फिर सत्य कहाँ है? और सब का दावा क्यों है ? अब केवल एक तीसरी सूरत रह गई अर्थात सब सत्य पर हैं और सब असत्य पर अर्थात असल एक है और सब के पास है और मिलावट बातिल है, वही मतभेद का कारण है और सब उसमें ग्रस्त हो गए हैं यदि मिलावट छोड़ दें और असलियत को परख कर शुद्ध कर लें तो वह एक ही होगी और सब की झोली में निकलेगी। क़ुरआन यही कहता है और उसकी बोली में उसी मिली जुली और विश्वव्यापी सत्यता का नाम "इस्लाम" है।"

जैसी करनी वैसी भरनी

कहते हैं कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ भोजन करने बैठा उसके सामने पूरी भूनी हुई मुर्गी थी, उसी समय एक भिकारी द्वार पर आकर कुछ माँगने लगा, उसने दरवाज़ा खोला और भिकारी को डाँट कर भगा दिया। अल्लाह का करना ऐसा हुआ कि कुछ ही दिनों में वह व्यक्ति भी निर्धन हो गया, सारी सम्पत्ती जाती रही यहाँ तक कि उसने अपनी पत्नी को तलाक़ भी दे दिया, उस महिला ने किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया। एक दिन जब अपने दूसरे पति के साथ जलपान हेतु बैठी तो उसी समय एक भिकारी दरवाज़े पर आ गया। दोनों के सामने पूरी भूनी हुई मर्ग़ी थी, भिकारी की आवाज़ सुनते ही पति ने पत्नी से कहा : द्वार खोलो और यह मुर्गी उस भिखारी को दे दो । पत्नी भिकारी को भुनी मुर्गी देने के लिए जब द्वार पर आई तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गई कि भिकारी कोई दूसरा नहीं बल्कि उसी का पहला पति है ( जिसने भिकारी को डाँट कर भगाया था) मुर्गी उसे दे दिया और रोती हुई अपने पति के पास लौटी, जब पति ने रोने का कारण पूछा तो बोली : भिकारी मेरा पहला पति था, फिर उसने सारी घटना सुनाई कि किस प्रकार उसके पति ने एक भिकारी को डाँट कर भगा दिया उसके तुरन्त बाद उसकी सारी समपत्ती जाती रही यहाँ तक कि उसने हमें तलाक़ दे दिया, और मैंने आप से विवाह कर लिया, पति ने कहा : वह पहला भिकारी तो मैं ही था।

क्या आप ईश्वर को मानते है ?

हाँ ईश्वर है और 100 प्रतिशत है, यदि हम कहें कि ईश्वर नहीं है तो हमें स्वयं को कहना होगा कि हम भी नहीं हैं, यदि हम हैं तो हमारा कोई बनाने वाला अवश्य होना चाहिए क्योंकि कोई भी चीज़ बिना बनाए नहीं बनती,और न ही वह स्वयं बनती है
(1) मैं अभी कम्प्यूटर पर लिख रहा हूं, यदि मैं कहूं कि कम्प्यूटर को किसी ने नहीं बनाया, स्वयं बन कर हमारे सामने आ गया है तो क्या आप हमारी बात पर विश्वास कर लेगें?।
(2) उसी प्रकार यदि मैं आपसे कहूं कि एक कम्पनी है जिसका न कोई मालिक है, न कोई इन्जीनियर, न मिस्त्री । सारी पम्पनी आप से आप बन गई, सारी मशीनें स्वंय बन गईं, खूद सारे पूर्ज़े अपनी अपनी जगह लग गए और स्वयं ही अजीब अजीब चीज़े बन बन कर निकल रही हैं, सच बताईए यदि में यह बात आप से कहूं तो क्या आप मेरी बात पर विश्वास करेंगे ? क्यों ? इस लिए कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि बिना बनाए कोई कम्पनी बन जाए या स्वयं कम्प्यूटर तैयार हो कर आ जाए।
जब बात यह ठहरी तो अब हमें उत्तर दीजिए कि क्या यह संसार तथा धरती और आकाश का यह ज़बरदस्त कारख़ाना जो आपके सामने चल रहा है, जिसमें चाँद, सूरज और बड़े बड़े नक्षत्र घड़ी के पुर्ज़ों के समान चल रहे हैं क्या यह बिना बनाए बन गए? यही प्रमाण जब एक ग्रामीण के हृदय में पैदा बैठा तो उसके तुरन्त कहा " पैरो के निशानात चलने वाले को बताते हैं तो यह सय्यारों वाला आकाश और यह विभिन्न चीज़ों को समेटी धरती क्या अपने पैदा करने वाले के लिए प्रमाण नहीं?"
(3) स्वयं हम तुच्छ वीर्य थे, नौ महीना की अवधि में विभिन्न परिस्थितियों से गुज़र कर अत्यंत तंग स्थान से निकले,हमारे लिए माँ के स्तन में दूध उत्पन्न हो गया,हम आग और पानी में अन्तर नहीं कर सकते थे कुछ समय के बाद हमें बुद्धि ज्ञान प्रदान किया गया, हमारा फिंगर प्रिंट सब से अलग अलग रखा गया इन सब परिस्थितियों में माँ का भी हस्तक्षेप न रहा, क्योंकि हर माँ की इच्छा होती है कि होने वाला बच्चा गोरा हो लेकिन काला हो जाता है, लड़का हो लेकिन लड़की हो जाती है। अब सोचिए कि जब कोई चीज़ बिना बनाए नहीं बना करती जैसा कि आप भी मान रहे हैं तथा यह भी स्पष्ट हो गया कि उस में माँ का भी हस्तक्षेप नहीं होता तो अब सोचें कि क्या हम बिना बनाए बन गए ???????
कभी हम संकट में फंसते हैं तो हमारा सर प्राकृतिक रूप में ऊपर की ओर उठने लगता है शायद आपको भी इसका अनुभव होगा—ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि ईश्वर की कल्पना मानव के हृदय में पाई जाती है, पर अधिकांश लोग अपने ईश्वर को पहचान नहीं रहे हैं।
फलसफी बास्काल कहता है "ईश्वर को छोड़ कर कोई चीज़ हमारी प्यास बुझा नहीं सकती" शातोबरीन लिखता है "ईश्वर के इनकार की साहस मानव के अतिरिक्त किसी ने नहीं की"
लायतीह यहाँ तक कहता है कि "जो शब्द सृष्टा का इनकार करे उसके प्रयोग करने वाले के होंट आग में जलाए जाने योग्य हैं"

ईश्वर एक है या अनेक

जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास कर लेते हैं तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि ईश्वर यदि है तो वह एक है अनेक नहीं। क्योंकि हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि एक देश का दो प्रधान मंत्री नहीं होता, एक स्कूल का दो अध्यक्ष नहीं होता, एक सेना का दो कमानडर नहीं होता, एक घर का दो गारजियन नहीं होता। यदि हुआ तो क्या आप समझते हैं कि नियम ठीक ठाक से चल सकेगा? अब आप कल्पना कीजिए कि इतनी बड़ी सृष्टि का प्रबंध एक से ज्यादा ईश्वर से कैसे चल सकता है?
क़रआन जो ईश्वाणी है जो सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शन हेतू अवतरित हुआ है उसने अपने अवतरित काल में मानव को चुनौती दी कि यदि किसी को क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है या वह समझता हो कि मुहम्मद सल्ल0 ने इसकी रचना की है हालांकि वह न पढना जानते हैं न लिखना तो तुम में बड़े बड़े विद्वान पाए जाते हैं ( इस जैसी एक सूरः (छोटा अध्याय) ही बनाकर देखाओ और ईश्वर के सिवा पूरे संसार को अपनी सहायता के लिए बुला लो यदि तुम सच्चे हो) (सूरः बक़रा 23)
लेकिन इतिहास गवाह है कि चौदह सौ साल से आज तक संसार के बसने वाले इसके समान एक श्लोक भी पेश न कर सके हैं और कोई भी आज तक प्रमाण न दे सका कि यह ईश्वर की वाणी नहीं है।
इस पवित्र ग्रन्थ में हमें ईश्वर ने यह प्रमाण दिया है कि (यदि धरती और आकाश में अनेक पूज्य होते तो खराबी और फसाद मच जाता) बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि संसार में दो ईश्वर होते तो संसार का नियम नष्ट भ्रष्ट हो जाता, एक कहता कि आज बारिश होगी तो दूसरा कहता कि आज बारिश नहीं होगी।एक राम दास को किसी पद कर आसीन करना चाहता तो दूसरा चाहता कि राम दास उस पद पर आसीन न हो ।
यदि देवी देवता का यह अधिकार सत्य होता तथा वह ईश्वर के कार्यों में शरीक भी होते तो कभी ऐसा होता कि एक दास ने पूजा अर्चना कर के वर्षा के देवता से अपने बात स्वीकार करा ली, तो बड़े मालिक की ओर से आदेश आता कि आज बारिश नहीं होगी। फिर नीचे वाले हड़ताल कर देते ।
अगर दो ख़ुदा होते संसार में तो दोनों बला होते संसार में
ईधर एक कहता कि मेरी सुनो ईधर एक कहता कि मियाँ चुप रहो।
स्वयं आप कल्पना कीजिए कि यदि दो ड्राईवर एक गाड़ी पर बैठा दिया जाए तो गाड़ी अवश्य एक्सिडेन्ट कर जाएगी। ईसी लिए मानना पड़ेगा कि इस संसार का सृष्टिकर्ता केवल एक है।

ईश्वर है तो देखाई क्यों नहीं देता

ईश्वर कोई हमारे और आप के जैसे नहीं कि जिसे मानव का देख लेना सम्भव हो, वह तो सम्पूर्ण संसार का रचयिता और पालनकर्ता है, उसके सम्बन्ध में कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह देखाई दे। बल्कि जो देखाई दे वह तो सीमित हो गया और ईश्वर की महिमा असीमित है। अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन में बताया गया है कि मूसा नामक एक संदेष्टा (ईश्वर की उन पर दया हो) ने जब ईश्वर से प्रार्थना किया कि "हे ईश्वर हमें अपना रूप देखा दीजिए" तो उत्तर आया कि तुम हमें देख नहीं सकते परन्तु तुम इस पहाड़ पर देखो यदि वह अपने स्थान पर स्थित रहा तो तेरे लिए हमे देखना सम्भव है। जब ईश्वर ने अपना प्रकाश प्रकट किया तो पड़ार टूकड़े टूकड़े हो गया और मूसा बेहोश हो कर गिर पड़े।(सूरः आराफ 143) मानव अपनी सीमित बुद्धि से जब सोचता है तो समझने लगता है कि ईश्वर कोई मानव के समान है जो देखाई देना चाहिए।
यह तो एक रहा! फिर संसार में विभिन्न चीज़ें हैं जो देखाई नहीं देतीं पर इंसान को उनके वजूद पर पूरा विश्वास होता है।
एक व्यक्ति जब तक बात करता होता है हमें उसके अन्दर आत्मा के वजूद का पूरा विश्वास होता है लेकिन जब ही वह धरती पर गिर जाता है,आवाज़ बन्द हो जाती है और शरीर ढीला पड़ जाता है तो हमें उसके अन्दर से आत्मा के निकल जाने का पूरा विश्वास हो जाता है हालाँकि हमने उसके अन्दर से आत्मा को निकलते हुए देखा नहीं।
जब हम घर में बिजली की स्विच आन करते हैं तो पूरा घर प्रकाशमान हो जाता है और हमें घर में प्रकाश के वजूद का पूरा विश्वास हो जाता है फिर जब उसी स्विच को आफ करते हैं तो प्रकाश चला जाता है हालाँकि हमने उसे आते और जाते हुए अपनी आँखों से नहीं देखा। उसी प्रकार जब हवा बहती है तो हम उसे देखते नहीं पर उसका अनुभव करके उसके बहने पर पूरा विश्वास प्राप्त कर लेते हैं।
तो जिस प्रकार आत्मा, बिजली और हवा के वजूद पर उसे देखे बिना हमारा पूरा विश्वास होता है उसी प्रकार ईश्वर के वजूद की निशानियाँ पृथ्वी और आकाश स्वयं मानव के अन्दर स्पष्ट रूप में विधमान है और संसार का कण कण ईश्वर का परिचय कराता है क्योंकि किसी चीज़ का वजूद बनाने वाले की माँग करता है, अब आप कल्पना कीजिए कि यह धरती, यह आकाश, यह नदी, यह पहाड़, यह पशु और यह पक्षी क्या यह सब एक ईश्वर के वजूद हेतु प्रमाण नहीं? प्रति दिन सूर्य निकलता है और अपने निश्चित समय पर डूबता है, स्वयं इनसान का एक एक अंग अपना अपना काम कर रहा है यदि अपना काम करना बन्द कर दे तो इनसान का वजूद ही स्माप्त हो जाए। यह सारे तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि ईश्वर है पर उसे देखना इनसान के बस की बात नहीं।
एक दूसरा उदाहरण लीजिए, एक बच्चे के सम्बन्ध में कल्पना करें जो जन्म के तुरंत बाद अपनी माँ से अलग कर दिया गाय और किसी और देश में भेज दिया गया. लेकिन वहां उसके अभिभावक उसे लगातार उसकी माँ के बारे में बताते रहते हैं कि उसकी माँ कैसी है?, वह कैसे उसे याद करती है?, उसकी क्या आदतों है?, वह सुबह और शाम क्या करती है? आदि. तो क्या बेटा केवल इस आधार पर उसे माँ मानने से इनकार कर देगा कि उसने तो उसे देखा ही नहीं है?. वह अपनी माँ को देखे बिना उसके गुणों को समझ सकता, उसके स्पर्श को महसूस कर सकता, उसकी तड़प दिल में ला सकता और उसके विचार से अपने दिल को बहला सकता है. अल्लाह का मामला भी कुछ ऐसा ही है कि हम उसे देखे बिना उसके गुणों को समझ कर उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।