शुक्रवार, 6 मार्च 2009

एक प्रार्थना, संदेहों का निवारण

यह एक प्रार्थना है, अनुरोध है, गुज़ारिश है साम्प्रदाइकता के सदस्यों से! क्योंकि मैं भी एक भारतीय हूँ। भारत की धरती से प्यार करता हूं, इस पावन धरती की स्वतंत्रता में अपने पूवर्जों के बलिदान हमें याद हैं। फिर इतिहास ने यह भी देखा है कि हमने अपने देश में शताब्दियों से अनेकता में एकता का प्रदर्शन किया है। हर धर्म एवं पथ के मानने वाले शान्ति के साथ इस धरती पर रहते आ रहे हैं।
इस नाते मैं अपनी भावना जो दिल की गहराई से निकली हुई है साम्प्रदाइकता के सदस्यों के नाम पेश करना चाहता हूं। शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात
आपने मुम्बई में रहने वाले यूपी बिहार के लोगों को मुम्बई से निकालने की योजना बनाई, पूना के लोहगाँव के मुसलमानों को आपने जन्म-भूमि से निकलने पर विवश किया। औऱ अब एक नया शोशा यह छौड़ा है कि (मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहना छोड़ दें और भारत को दारुल हर्ब भी न कहें)
प्रिय बन्धुओ! मैं यही समझता हूं कि आपको मनवता से प्यार है। इस नाते आपने शत्रुता में यह बात न कही होगी, शायद यह आपत्ती अज्ञानता के कारण है। अतः यदि आपने ऐसा बयान अज्ञानता के कारण दिया है तो इसका निवारण किए देता हूं।
हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहींजहां तक भारत को दारुल हर्ब कहने की बात है तो कोई मुसलमान अथवा इस्लामी विद्बान हिन्दुस्तान को दारुल हर्ब नहीं कहते। सब से पहले दारुल हर्ब क्या है इसे समझ लें। दारुल हर्ब वह धरती है जहां मुलमानों के लिए धार्मिक किसी प्रकार का काम करना वर्जित हो। वहां हर समय मुसलमान अपने जान तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में चिंतित हों। और ऐसा मुसलमानों के लिए भारत में नहीं है।
दूसरी बात यह कि दारुल हर्ब को अर्थ युद्ध करने का स्थान नहीं। बल्कि जैसा कि मैंने कहा कि वह देश जहां गैर-मुस्लिम मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हों, और मुसलमानों को वहाँ कोई शक्ति प्राप्त न हो।
इस अर्थ को सामने रखें और स्वंय सोच कर देखें कि मुलममानों के लिए भारत आखिर दारुल- हर्ब कैसे होगा? यही कारण है कि जब मेडिया में यह चर्चा आम हुई लो मुस्लिम समितियों की ओर से फत्वा भी आया कि हिन्दुस्तान दारुल-हर्ब नहीं।
जैसे दारुल-उलूम दिउबंद तथा विभिन्न मुस्लिम विद्वानों ने बयान दिया कि हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं और न कभी हो सकता है।
ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहना
जहां तक ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहने की बात है तो यह याद रखें कि कोई भी मुलमनान किसी गैर-मुस्लिम को काफिर नहीं कहता। बल्कि काफिर कह कर पुकारने से मुहम्मद सल्ल0 ने मना किया है। दूसरी बात यह कि काफिर का अर्थ क्या होता है? उस पर भी ग़ौर करके देख लीजिए काफिर अरबी शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद करें को होगा(अमुस्लिल, अथावा गैर-मुस्लिम) अग्रेज़ी अनुवाद करें तो होगा(Non Muslim) अब आप ही बताएं कि एक व्यक्ति या तो मुस्लिम होगा अथवा गैर-मुस्लिम, तीसरी कोई संज्ञा नहीं। यदी कोई गैर-मुस्लिम होना पसंद न करता हो तो वह मुस्लिम बन जाए। समस्या का समाधान बस इसी में है। इस सम्बन्ध में लीजिए डा0 ज़ाकिर नाइक का उत्तर भी पढ़ लीजिए
(काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है- अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस।)