बुधवार, 29 जुलाई 2009

ईश्वर का साझी बनाना सब से बड़ा पाप है

उस सच्चे मालिक ने अपने कुरआन में हमें बताया कि नेकियों, सतकर्म, पुण्य ओर सदाचार छोटे भी होते हैं और बड़े भी इसी प्राकर उस मालिक के यहॉ गुनाह, कुकर्म, पाप भी छोटे बड़े होते हैं उसने हमें बताया है कि जो पाप हमें सब से अधिक सज़ा का भागीदार बनाता है, और जिसको वह कभी क्षमा नही करेगा, और जिस का करने वाला सदैव नरक में जलता रहेगा, ओर उसको मौत भी न आयेगी वह उस अकेले मालिक का किसी को साझी बनाना है, अपने शीश और मस्तिष्क को उसके अतिरिक्त किसी दूसरे के आगे झुकाना, अपने हाथ किसी और के आगे जोड़ना, उसके अलावा किसी और को पूजा के योग्य मानना, मारने वाला जिन्दा करने वाला, रोजी देने वाला और लाभ हानि का मालिक समझना घोर पाप और अत्यन्त अत्याचार है चाहे वह किसी देवी देवता को माना जाये या सूरज चाँद नक्षत्र अथवा किसी पीर फ़कीर को। किसी को भी उस मालिक के अलावा पूजा योग्य समझना शिर्क है जिसको वह मालिक कभी माफ़ नहीं करेगा, इसके अलावा हर पाप को वह अगर चाहे तो माफ़ (क्षमा) कर देगा। इस पाप को स्वंय हमारी बुद्धि भी इतनी ही बुरा समझती है और हम भी इस कर्म को इतना ही नापसंद करते हैं।
एक उदाहरणउदाहरणार्थ यदि आपकी पत्नी बड़ी झगड़ालू और बात-बात पर गालियों देने वाली हो। और कुछ कहना सुनना नहीं मानती हो लेकिन आप उस से घर से निकलने को कह दें तो वह कहती है कि मैं केवल तेरी हूँ तेरी रहूँगी, और तेरे दरवाजे पर मरूंगी, और एक पल क लि‍ए तेरे घर से बाहर नहीं जाऊँगी तो आप लाख क्रोध और गुस्से के बाद भी उससे निर्वाह करने पर विवश हो जाएंगे। इसके विपरीत यदि आपकी पत्नी अत्यन्त सेवा करने वाली और आज्ञाकारी है, वह हर समय आपका ध्यान रखती है, आपके लि भोजन गर्म करती है ओर परोसती है प्यार और प्रेम की बातें करती है, वह एक दिन आप से कहने लगे आप मेरे पति देव है। मेरा अकेले आप से काम नहीं चलता, इसलिए अपने पड़ोसी जो हैं मैंने आज से उन्हें भी अपना पति बना लिया है तो यदि आप में कुछ भी लज्जा और मानवता है और आप के खून मे गर्मी है तो आप यह बदार्शत नहीं कर पायेंगे, या अपनी पत्नी की जान ले लेंगे अथवा स्वंय मर जायेंगे। आखिर ऐसा क्यों है? केवल इसलि‍ए कि आप अपनी पत्नी के लिए किसी को साझी देखना नहीं चाहते। आप नुत्फे (वीर्य) की एक बूंद से बने हैं तो अपना साझी नहीं करते, तो वह मालिक जो उस अपवित्र बूंद से मनुष्य को पैदा करता है, वह कैसे यह बदार्शत कर लेगा कि कोई उसका साझी हो। उसके साथ किसी और की भी पूजा की जाये। जब कि इस पूरे संसार में जिसको जो कुछ दिया है उसी ने दिया है। जिस प्रकार एक वेश्या अपनी मान मर्यादा बेचकर हर आने वाले व्यक्ति को अपने ऊपर अधिकार दे देती है तो इसके कारण वह हमारी आँखों से गिरी हुई रहती है। वह मनुष्य अपने मालिक की आँखो में उस से अधिक नीच और गिर हुआ है जो उसको छोड़कर किसी और की पूजा में विलीन हो। वह कोई देवता या मूर्ति हो अथवा कोई दूसरी वस्तु।
पवित्र कुरआन मे मूर्तिपूजा का विरोध
मूर्तिपूजा के लए कुरआन में एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया है जो (गौर) विचार करने योग्य है। ‘‘अल्लाह को छोड़कर तुम जिन वस्तुओं को पूजते हो वह सब मिलकर एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकतीं, और पैदा करना तो दूर की बात है यदि मक्खी उनके सामने से कोई चीज प्रसाद इत्यादि छीन ले तो वापस नहीं ले सकतीं। फिर कैसे कायर है पूज्य और कैसे कमजोर हैं पूजने वाले, और उन्होंने उस अल्लाह की कद्र नहीं कि जैसी करनी चाहिये थी जो ताक़तवर और जबरदस्त है।‘‘क्या अच्छी मिसाल है, बनाने वाला तो स्वंय ईश्वर होता है अपने हाथों से बनायी गयी मूर्तियों के हम बनाने वाले यदि इन मूर्तियों में थोड़ी बहुत समझ होती तो वह हमारी पूजा करतीं। एक बोदा विचारकुछ लोगों का मानना यह हैं कि हम उनकी पूजा इस लिए करते हैं कि उन्होंने ही हमें मालिक का मार्ग दिखाया और उनके वास्ते से हम मालिक की दया प्राप्त करते हैं। यह बिल्कुल ऐसी बात हुई कि कोई कुली से ट्रेन के बारे में मालूम करें जब कुली उसे ट्रेन के बारे में जानकारी दे दे तो वह ट्रेन की जगह कुली पर ही सवार हो जाये, कि इसने ही हमें ट्रेन के बारे में बताया है। इसी तरह अल्लाह की सही दिशा और मार्ग बताने वाले की पूजा करना बिल्कुल ऐसा है जैसे ट्रेन को छोड़कर कुली पर सवार हो जाना। कुछ भाई यह भी कहते हैं कि हम केवल ध्यान जमाने के लिए इन मूर्तियों को रखते हैं। यह भी खूब रही कि खूब गौर से कत्ते को देख रहे हैं और कह रहे हैं कि पिताजी का ध्यान जमाने के लिए कुत्ते को देख रहे हैं। कहाँ पिताजी कहाँ कुत्ता? कहाँ यह कमजो़र मूर्ति और कहा वह अत्यन्त बलवान, दयावान मालिक, इस से ध्यान बंधेगा या हटेगा। निष्कर्ष यह है कि किसी भी प्रकार से किसी को भी उसका साझी मानना सबसे बड़ा पाप है जिसको ईश्वर कभी माफ़ नहीं करेगा, और ऐसा आदमी सदा के लिए नरक का ईधन बनेगा।