बुधवार, 30 सितंबर 2009

इस्लाम नया धर्म नहीं क्या मतलब ?

अगर हम कहते हैं कि इस्लाम नया धर्म नहीं तो इसका अर्थ यह है कि इस्लाम का कोई मानव संस्थापक नहीं जैसा कि अन्य धर्मों का है, उदाहरणस्वरूप बुद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध हैं, सिख धर्म के संस्थापक गुरूनानक हैं, जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी हैं, हिन्दू धर्म भी अपने गुरूओं का धर्म कहलाता है जबकि इस्लाम का संस्थापक कोई मानव नहीं। इसका अर्थ ही होता है एक ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण।
अधिकांश लोग इसी तथ्य को न समझ सके जिसके कारण यह कहने लगे कि इस्लाम मुहम्मद सल्ल0 का लाया हुआ धर्म है अथवा एक नया धर्म है। हालांकि हर मुसलमान यह जानता मानता तथा इस बात पर आस्था रखता है कि मुहम्मद सल्ल0 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि उसको अन्तिम स्वरूप देने वाले हैं। ऐसा ही जैसा किसी एक देश में भारत का राजदूत भेजा जाता है तो राजदूत को अपने आदेश का पालन कराने का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक अपने पद पर आसीन रहे। जब दो साल की अवधि गुज़रने के बाद दूसरा राजदूत आ जाए तो पहला राजदूत अपना आदेश नहीं चला सकता क्योंकि उसकी कार्य-अवधि समाप्त हो चुकी, ऐसा ही ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें वह हर देश और हर युग में भेजे गए उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती हैं, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे, तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ती पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं क्यों कि उनकी रचना एक ही ईश्वर ने की है।
सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है ( अर्थात् आदि पुरुष जिनको कुछ लोग मनु और शतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम कहते हैं ) परन्तु उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखों का सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना
परन्तु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाला तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की संतान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता हैं कि उन्होंने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार किया था तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया।
बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया।
इसे यूं समझिए कि कोई पत्रवाहक यदि पत्र ले कर किसी के पास जाए तो उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके पर यदि वह पत्रवाहक को ही पिता समझने लगे और उसी का आदर सम्मान शुरू कर दे तो इसे क्या नाम दिया जाएगा,आप स्वयं समझ सकते हैं।

जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है । उनके समान धरते ने न किसी को देखा न देख सकती है। वही कल्कि अवतार हैं जिनकी हिन्दुसमाज में आज प्रतीक्षा हो रही है।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

रोज़ा के लाभ

विज्ञान के इस आधुनिक युग में इस्लामी उपवास के विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक लाभ सिद्ध किए गए हैं। जिन्हें संक्षिप्त में बयान किया जा रहा है।

आध्यात्मिक लाभः
(1) इस्लाम में रोजा का मूल उद्देश्य ईश्वरीय आज्ञापालन और ईश-भय है, इसके द्वारा एक व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि उसका समस्त जीवन अल्लाह की इच्छानुसार व्यतीत हो। एक व्यक्ति सख्त भूक और प्यास की स्थिति में होता है, खाने पीने की प्रत्येक वस्तुयें उसके समक्ष होती हैं, एकांत में कुछ खा पी लेना अत्यंत सम्भव होता है, पर वह नहीं खाता पीता। क्यों ? इस लिए कि उसे अल्लाह की निगरानी पर दृढ़ विश्वास है। वह जानता है कि लोग तो नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो देख रहा है। इस प्रकार एक महीने में वह यह शिक्षा ग्रहण करता है कि सदैव ईश्वरीय आदेश का पालन करेगा और कदापि उसकी अवज्ञा न करेगा।

(2) रोज़ा ईश्वरीय उपकारों को याद दिलाता औऱ अल्लाह कि कृतज्ञता सिखाता है क्योंकि एक व्यक्ति जब निर्धारित समय तक खान-पान तथा पत्नी के साथ सम्बन्ध से रोक दिया जाता है जो उसकी सब से बड़ी इच्छा होती है फिर वही कुछ समय बाद मिलता है तो उसे पा कर वह अल्लाह ती प्रशंसा बजा लाता है।

(3) रोज़ा से कामवासना में भी कमी आती है। क्योंकि जब पेट भर जाता है तो कामवासना जाग उठता है परन्तु जब पेट खाली रहता है तो कामवासना कमज़ोर पड़ जाता है। इसका स्पष्टिकरण मुहम्मद सल्ल0 के उस प्रबोधन से होता है जिसमें आया है कि "हे नव-युवकों के समूह ! तुम में से जो कोई विवाह करने की शक्ति रखता हो उसे विवाह कर लेना चाहिए क्योंकि इसके द्वारा आँखें नीची रहती हैं और गुप्तांग की सुरक्षा होती है।"

(4) रोज़े से शैतान भी निदित और अपमानित होता है क्योंकि पेट भरने पर ही कामवासना उत्तेजित होता है फिर शैतान को पथभ्रष्ट करने का अवसर मिलता है। इसी लिए मुहम्मद सल्ल0 के एक प्रवचन में आया है "शैतान मनुष्य के शरीर में रक्त की भांति दौड़ता है। भूक (रोज़ा) के द्वारा उसकी दौड़ को तंग कर दो"।

शारीरिक लाभ 
(1) मनुष्य के शरीर में मेदा एक ऐसा कोमल अंग है जिसकी सुरक्षा न की जाए तो उस से विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार रोज़ा मेदा के लिए उत्तम औषधि है क्योंकि एक मशीन यदि सदैव चलती रहे और कभी उसे बंद न किया जाए तो स्वभावतः किसी समय वह खराब हो जाएगी। उसी प्रकार मेदे को यदि खान-पान से विश्राम न दिया जाए तो उसका कार्यक्रम बिगड़ जाएगा।

(2) डाक्टरों का मत है कि रोज़ा रखने से आंतें दुरुस्त एंव मेदा साफ और शुद्ध हो जाता है। पेट जब खाली होता है तो उसमें पाए जाने वाले ज़हरीले किटानू स्वंय मर जाते हैं और पेट कीड़े तथा बेकार पदार्थ से शुद्ध हो जाता है।
उसी प्रकार रोज़ा वज़न की अधिकता, पेट में चर्बी की ज्यादती, हाज़मे की खराबी(अपच), चीनी का रोग(DIABATES) बलड प्रेशर,गुर्दे का दर्द, जोड़ों का दर्द, बाझपन, हृदय रोग, स्मरण-शक्ति की कमी आदि के लिए अचूक वीण है। डा0 एयह सेन का कहना हैः "फाक़ा का उत्तम रूप रोज़ा है जो इस्लामी ढ़ंग से मुसलमानों में रखा जाता है।मैं सुझाव दूंगा कि जब खाना छोड़ना हो तो लोग रोज़ा रख लिया करें।" इसी प्रकार एक इसाई चिकित्सक रिचार्ड कहता हैः "जिस व्यक्ति को फाक़ा करने की आवश्यकता हो वह अधिक से अधिक रोज़ा रखे। मैं अपने इसाई भाइयों से कहूंगा कि इस सम्बन्ध में वह मुसलमानों का अनुसरण करें। उनके रोज़ा रखने का नियम अति उत्तम है।" (इस्लाम और मेडिकल साइंस 7)
तात्पर्य यह कि उपवास एक महत्वपूर्ण इबादत होने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी है। सत्य कहा अन्तिम ईश्दूत मुहम्मद सल्ल0 नेः "रोजा रखो निरोग रहोगे"

नैतिक लाभ
रोज़ा एक व्यक्ति में उत्तम आचरण, अच्छा व्यवहार, तथा स्वच्छ गुण पैदा करता है, कंजूसी,घमंड,क्रोध जैसी बुरी आदतों से मुक्ति दिलाता है। इनसान में धैर्य, सहनशीलता और निःस्वार्थ भाव को जन्म देता है। जब वह भूक की पीड़न का अनुभव करता है तो उसके हृदय में उन लोगों के प्रति दया-भाव उभरने लगता है जो प्रतिदिन अथवा सप्ताह या महीने में इस प्रकार की पीड़नाओं में ग्रस्त होते हैं। इस प्रकार उसमें बिना किसी स्वार्थ और भौतिक लाभ के निर्थनों तथा ज़रूरतमंदों के प्रति सहानुभूति की भावना जन्म लेती है, और उसे पूर्ण रूप में निर्धनों की आवश्यकताओं का अनुभव हो जाता है।

सामाजिक लाभ
रोज़ा का सामाजिक जीवन पर भी बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।
(1) वर्ष के विशेष महीने में प्रत्येक मुसलमानों का निर्धारित समय तक रोज़ा रखना, फिर निर्धारित समय तक खाते पीते रहना, चाहे धनवान हों या निर्धन समाज को समानता एवं बंधुत्व के सुत्र में बाँधता है।
(2) धनवान जब भूख एवं प्यास का अनुभव करके निर्धनों की सहायता करते हैं तो उन दोंनों में परस्पर प्रेम एवं मुहब्बत की भावनायें जन्म लेती हैं और समाज शत्रुता, घृणा और स्वार्थ आदि रोगों से पवित्र हो जाता है, क्योंकि सामान्यतः निर्धनों की सहायता न होने के कारण ही चोरी एवं डकैती जैसी घटनाएं होती हैं। सारांश यह कि रोज़ा से समानता, भाईचारा तथा प्रेम का वातावरण बनता है। समुदाय में अनुशासन और एकता पैदा होता है। लोगों में दानशीलता, सहानुभूति और एक दूसरों पर उपकार करने की भावनायें उत्पन्न होती हैं।

मानसिक लाभ रोज़ा में एक व्यक्ति को शुद्ध एवं शान्ति-पूर्ण जीवन मिलता है। उसका मस्तिष्क सुस्पष्ट हो जाता है। उसके हृदय में विशालता आ जाती है। फिर शरीर के हल्का होने से बुद्धि विवेक जागृत होती है। स्मरण-शक्ति तेज़ होती है। फलस्वरूप एक व्यक्ति के लिए कठिन से कठिन कामों को भलि-भांति कर लेना अत्यंत सरल होता है।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

मुहम्मद सल्लo का एक प्रवचन
अनुवादः हज़रत अबूज़र और हज़रत मुआज़ बिन जबल रजि़0 से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने फरमायाः जहाँ कहीं भी रहो अल्लाह से डरते रहो,गुनाहों के बाद नेकियाँ कर लो, नेकियाँ गुनाहों को मिटा देंगीं, और लोगों के साथ अच्छे आचरण से पेश आओ। (तिर्मिज़ी)
व्याख्याः यह मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में से एक महान प्रवचन (हदीस) है, जिसके शब्द कम हैं परन्तु अर्थ अत्यधिक हैं, प्यारे नबी सल्ल0 ने इसमें लौकिक तथा पारलौकिक सारी भलाइयों को एकत्र कर दिया है। इसमें मात्र तीन शब्दों में तीन मूल सम्बन्धों को बयान कर दिया गया है।
1. अल्लाह के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
2. अपने नफ्स के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
3. आम जनता के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
अल्लाह के साथ सम्बन्धः इस बिन्दू की स्पष्टता हदीस के पहले शब्द से होती है। जहाँ कहीं भी रहो अल्लाह से डरते रहो,घर में हो या घर से बाहर, एकांत में हो या साथियों के साथ,रात में हो या दिन में हर समय और हर जगह अल्लाह का डर दिल में बसाए रहो। क्योंकि अल्लाह तुझे देख रहा है। उसकी निगाह से किसी पल तुम ओझल नहीं हो सकते।
जब यह आस्था एक व्यक्ति के दिल में पैदा हो जाती है कि अल्लाह हर समय हमें देख रहा है तो उसका पूरा जीवन सुधर कर रह जाता है।वह जहाँ भी होता है अल्लाह की अवज्ञा नहीं करता, बन्द कमरे में भी होता है तो उसके मन मस्तिष्क में यह बात घूमती होती है कि यधपि यहाँ हमें लोग नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो यहां भी देख रहा है।
एक बार इस्लाम के ख़लीफ़ा उमर रजि0 अपने शासन में जनता की देख-भाल के लिए एक रात निकले, जब थक गए तो एक दीवार के सहारे बेठ कर विश्राम करने लगे। इसी बीच एक महिला ने घर के अन्दर से अपनी बच्ची को आवाज़ दिया किः बेटी उठो और दूध में पानी मिला दो ताकि बेचते समय दुध कुछ ज्यादा हो जाए।बेटी ने कहाः अम्मी जान उमर (बादशाह) के आदमी ने यह घोषना की है कि बेचने के लिए दूध में पानी न मिलाया जाए। माँ ने कहाः बेटी अभी तुम ऐसी जगह पर है जहाँ न उमर देख रहे हैं और न उनके आदमी। बेटी ने कहाः माँ उमर नहीं देख रहे हैं तो अल्लाह तो देख रहा है।
तात्पर्य यह कि इस हदीस में यह आदेश दिया गया है कि एक व्यक्ति को चाहिए कि वह हर समय अल्लाह का निगरानी को अपने ऊपर बसाए रहे, और यही रोज़े का भी सार है अल्लाह ने फरमायाः ऐ ईमान वालो तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं जैसा कि तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किए गए थे ताकि तुम्हारे अन्दर तक्वा(अल्लाह का डर) पैदा हो गाए।
तक्वा की परिभाषा करते हुए हज़रत अली रजि0 फरमाते हैं अल्लाह का डर, इस्लामी शास्त्रानुसार अमल, कम पर संतुष्ठी, और मौत के दिन की तैयारी।
इस परिभाषा से ज्ञात हुआ कि मुत्तक़ी होने के लिए इन चार विशेषताओं का पाया जाना अनिवार्य है कि अल्लाह का भय ह्दय में समाया हुआ हो, शरीयत के अनुसार उसका पूरा अमल हो रहा हो, अल्लाह ने उसे जितना दे रखा है उस पर संतुष्ट हो,और मरने के दिन को हमेशा याद रखता हो।
हज़रत अबू हुरैरा रजि0 से किसी ने तक्वा की परिभाषा पूछा तो आपने फरमायाः क्या तुझे कभी काँटेदार रास्ते से गुज़रने का इत्तेफाक़ हुआ? उसने कहाः जी हाँ बहुत बार, आपने पूछाः वहाँ तुम कैसे गुज़रे? उन्हों ने कहा कि कपड़े को खूब समेट कर गुज़रा कि कहीं काँटे दामन से उलझ न जाएं। अबू हुरैरा रजि0 ने फरमायाः यही तक्वा है।
अपने नफ्स के साथ सम्बन्धः कुछ लोग यह समझ सकते हैं कि जो लोग अल्लाह का डर रखने वाले होते हैं उनसे गुनाह कभी होता ही नहीं। ऐसी सोच ग़लत है, इनसान है तो गलतियाँ हो ही सकती हैं, परन्तु एक मुत्तक़ी और पापी में अन्तर यह होता है कि मुत्तक़ी से जब ग़लती होती है तो वह तुरन्त पश्चाताप करता है, और अल्लाह से अपने पापों की क्षमा-याजना में लग जाता है जबकि पापी को अपने पाप की कोई चिंता नहीं होती। अतः जह एक व्यक्ति अपने पापों पर पछताते हुए तौबा कर लेता है तो अल्लाह तआला उसके गुनाहों का माफ कर देते हैं।
हदीस के दूसरे शब्द में यही बताया गया है कि जब गलतियाँ हो जाएं तो नेकी कर लो, नेकियाँ गलतियों को मिटा देंगीं। यह अल्लाह तआला की दया और कृपा है कि वह नेकियाँ करने से गुनाहों को मिटा देता है। बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल सल्ल0 के पास आया औऱ अर्ज़ कियाः ऐ अल्लाह के रसूलः मैं ने अवेध तरीक़े से आज एक महिला को बोसा ले लिया है। अल्लाह के रसूल सल्ल0 चुप रहे यहाँ तक कि यह आयत अवतरित हुईः
(और दिन के दोनों किनारों में नमाज़ क़ाएम रख और रात की कई घड़ियाँ में भी, बेशक नेकियाँ बुराइयों को दूर कर देती हैं। यह नसीहत है नसीहत हासिल करने वालों के लिए।) (सूरः हूद 114)
जब यह आयत उतरी तो अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने उस व्यक्ति को बुलाया और उसके सामने यह आयत पढ़ी। वहाँ पर उपस्थित एक दूसरे व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल क्या यह इसी के लिए खास है या यह हुक्म सब के लिए समान है ? आपने फरमायाः यह सारे लोगों के लिए सामान्य है।
सामान्य जनता के साथ सम्बन्धः
हदीस के तीसरे शब्द में आम जनता के साथ सम्बन्ध कैसा हो? इसको स्पष्ट किया गया है। इसी लिए फरमाया गया कि लोगों के साथ चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला हो, तथा किसी भी जाति से सम्बन्ध रखता हो अच्छा व्यवहार करो। अपने लिए जो पसंद करते हो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो, हर एक व्यक्ति से ख़ूश-दिली के साथ मिलो,दूसरे कोई कष्ट पहुंचाएं तो उन्हें क्षमा कर दो, और स्वयं दूसरों को कष्ट मत पहुंचाओ।
आज दिलों को जीतने के नियमों पर विभिन्न पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और उनकी बाज़ार में माँग बढ़ रही है केवल इस कारण कि यदि किसी को यह सलीक़ा आता है तो लोग उसे टूट कर चाहते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि आप किसी से ख़ूश-दिली के साथ मिलते हैं और उच्च आचरण का व्यवहार करते हैं तो वह आपसे प्रेम करने लग जाता है और आपकी प्रसनन्नता के लाग अलापने लगता है। इस्लाम ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दिया कि तुम्हारा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना इस कारण न होना चाहिए कि लोग तुम से प्रेम करें बल्कि इस लिए होना चाहिए कि इस से हमारा रब ख़ूश होगा, और हमें अपने से निकट करेगा। इसी लिए हदीस में बताया गया है कि एक व्यक्ति अपने अच्छे आचरण से रोज़ा रखने वाले और क़्याम (रात में नमाज़ पढ़ने वाले) करने वाले के पद पर आसीन हो जाता है। और जब आप सल्ल0 से पूछा गया कि वह कौन सी चीज़ है जो लोगों को जन्नत में ज्यादा दाखिल करती है? आपने फरमायाः अल्लाह का डर और अच्छा आचरण।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

रमज़ान का इनामी प्रतियोगिता = केवल गैर-मुस्लिम भाइयों के लिए

निम्नलिखित वाक्यों में सही उत्तर पर ( √ ) के चिन्ह लगाएं ।
1- इस्लाम का अर्थ क्या होता है ?
शान्ति ( )
मानव एकता ( )
आतंकवाद ( )
2- इस्लाम विश्वव्यापी धर्म है जो................. के मार्गदर्शन हेतु आया।
अरब वासियों ( )
प्रत्येक मानव ( )
यूरोप और अमेरिका के रहने वालों ( )
3-अमेरीकी लेखक डा0 माईकल हार्ट ने अपनी पुस्तक " The 100" में
मानव इतिहास पर प्रभाव डालने वाले 100 महान व्यक्तियों का वर्णन किया है उनमें प्रथम स्थान पर ..................को रखा है।
मोहम्मद सल्ल0 ( )
ईसा अ0 स0 ( )
गांधी जी ( )
4- वह ईश्वरीय ग्रन्थ जो महा-प्रलय के दिन तक बिना किसी परिवर्तन और मिलावट के सुरक्षित रहेगा वह ...... है।
बाईबल ( )
क़ुरआन करीम ( )
तौरात ( )
5- भारत के रेल मंत्री का नाम .......... है।
लालू यादव ( )
मम्ता बनरजी ( )
शिव राज पाटेल ( )
6- अल्लाह पर विश्वास रखने में यह सम्मिलित है कि...............................
केवल एक अल्लाह पर विश्वास रखा जाए तथा उसकी पूजा में किसी को भागीदार न ठहराया जाए।( )
आकाशीय दूतों, ईश्वरीय ग्रन्थों, संदेष्टाओं, महाप्रलय के दिन और भाग्य की अच्छाई एंव बुराई पर विश्ववास रखा जाए ( )
ऊपर के दोनों ( )

निम्नलिखित वाक्यों पर सही ( √ ) या गलत ( þ ) के चिन्ह लगाऐं
(1) मोहम्मद सल्ल0 के निमन्त्रण की मौलिक बातें थीं (केवल एक अल्लाह पर विश्वास रखा जाए तथा उसकी पूजा में किसी को भागीदार न ठहराया जाए। और महाप्रलय के दिन पर विश्वास किया जाए। ( )
(2) मुसलमान मोहम्मद साहिब की पूजा करते हैं। ( )
(3) इस्लाम एक पूर्ण जीवन व्यवस्था है जो जीवन के सम्पूर्ण भाग को शामिल है। ( )
(4) क़ुरआन ईश्वाणी है मनुष्य की वाणी नहीं, ईश्वर (अल्लाह) ने इसे अन्तिम संदेष्टा मोहम्मद सल्ल0 पर आकाशीय दूत जिब्रील के माध्म से अवतरित किया। ( )
(5) मृत्यु के पश्चात मानव से उनके कर्मों का लेखा-जोखा लिया जाएगा और अपने कर्मानुसार या तो स्वर्ग में प्रवेश करेगा अथवा नरक में डाल दिया जाएगा। ( )
(6) मुसलमान ह़ज करने के लिए मक्का जाते हैं। ( )
(7) मुसलमान ईसा अ0 स0 पर विश्वास नहीं रखते। ( )
(8) प्रकृति ने ही विश्व को पैदा दिया। ( ) (9) इस्लाम ने महिलाओं को जो अधिकार दिया है उतना अधिकार अन्य किसी धर्म ने उसे नहीं दिया। ( )
(10) ईश्वर ने प्रत्येक वस्तुओं को पानी से पैदा किया। ( )
(11) मुसलमान सर्व सन्देष्टाओं पर विश्वास और उनका आदर-सम्मान करते है। ( )
(12) इस्लाम में रोज़ा (उपवास) शाबान के महीना में अनिवार्य़ होता है। ( )
(23) अन्तिम संदेष्टा मोहम्मद सल्ल0 हैं। ( )
(24) मुसलमानों के पास तीन त्योहार हैं। ( )
(15) एक व्यक्ति जब दिल से यह बोतला है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा हैं) तो वह मुसलमान बन जाता है। ( )
(16) इस्लाम एक अल्लाह की उपासना की ओर बुलाता और जातिवाद तथा ऊंच-नीच की भावनाओं का खंडन करता है। ( )