रविवार, 25 अक्टूबर 2009

महान चमत्कार के होते हुए एक मानव-मात्र

मानव पथभ्रष्टता का मूल कारण महापुरुषों तथा संदेष्टाओं की चमत्कारियाँ हैं। ईश्वर ने मानव मार्गदर्शन हेतु हर युग एवं हर देश में जब संदेष्टाओं को भेजा, तो उनकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी। परन्तु लोगों ने इन चमत्कारियों की वास्तविकता को न समझने के कारण उन्हीं को अवतार, ईश्वर, ईश्वर का बटा आदि मान लिया। यह सब से बड़ा अत्याचार था जो संदेष्टाओं पर हुआ। इसी कारण आज लोग अपने सृ,ष्टिकर्ता, अन्नदाता औऱ पालनकर्ता को भूल कर सब कुछ महापुरुषों को समझ चुके हैं। इन प्रत्येक महापुरुषों में केवल मुहम्मद सल्ल0 एक ऐसे महापुरुष हैं जिनको आज तक एक मानव-मात्र माना जाता है। जबकि हम देखते हैं कि मुहम्मद सल्ल0 की चमत्कारियाँ बड़ी बड़ी थीं। उदाहरण-स्वरूप
(1) मक्का वालों ने आपके संदेष्टा होने का प्रमाण माँगा तो आपके एक संकेत पर चाँद के दो टुकड़े हो गए जिसका समर्थन आधुनिक विज्ञान ने भी किया है। इस चमत्कार का समर्थन चाँद पर जाने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक निल आर्म्-स् ट्रंग ने भी किया बल्कि इसी कारण उन्होंने इस्लाम भी स्वाकार किया जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
(2) हुदैबिया की सन्धि के अवसर पर अंगुलियों से पानी निकला और 1400 व्यक्तियों ने प्यास बुझाई।
(3) मुहम्मद साहिब का सब से बड़ा चमत्कार दिव्य क़ुरआन है, वह कैसे ? क्यों कि वह न लिखना जानते थे न पढ़ना और न ही उनको किसी गुरू की संगती प्राप्त हुई थी, ऐसा इन्सान क़ुरआन पेश कर रहा है जो स्वयं चुनौती दे रहा है कि ( यदि तुझे क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है तो इसके समान एक सूरः «अध्याय» ही पेश कर दो, यदि तुम सच्चे हो) [सूरः अल-बक़रः23] परन्तु इतिहास साक्षी है कि वह अरब विद्वान जिनको अपने भाषा सौन्दर्य पर गर्व था, अपनी भाषा के सामने दूसरों का गुंगा समझते थे, उसके समान एक टुकड़ा भी पेश न कर सके। हालांकि उन्हीं के समाज में पलने बढ़ने वाला एक अपढ़ व्यक्ति ऐसी वाणी पेश कर रहा था। जिस से ज्ञात यह होता है कि क़ुरआन मुहम्मद साहिब की वाणी नहीं बल्कि ईश्वर की वाणी है। औऱ आज तक क़ुरआन सारे संसार वालों के लिए चैलेंज बना हुआ है। जी हाँ! क़ुरआन की शैली ही ऐसी है कि उसके समान न कोई बना सका है न बना सकता है।
प्रिय भाई ! इन स्पष्ट चमत्कारियों के होते हुए क्या मुहम्मद सल्ल0 का हक़ नहीं था कि उनकी पूजा की जाए ? या वह अपने पूज्य होने का दावा करें ? यदि वह ऐसा दावा करते तो वह संसार जिस ने राम को ईश्वर बना डाला, जिसने कृष्ण जी को गभवान कहने से संकोच न किया, जिसने ईसा अलै0 (जिसस) को ईश्वर का बटा मान लिया। वह ऐसे महान व्यक्ति को ईश्वर मानने से कभी संकोच न करता। लेकिन वह ऐसा कैसे कह सकते थे जबकि वह सत्य संदेश ले कर आए थे। वह तो स्वंय को केवल एक मानव के रूप में प्रकट करते हैं और कहते हैं «मैं एक मानव-मात्र हूं तुम्ही जैसा» आज यदि कोई मुस्लिम मुहम्मद साहिब की पूजा करने लगे तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

प्रवचन 2

श्री अब्दुल्लाह पुत्र अब्बास (रज़ि0) का बयान है कि एक दिन मैं अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के पीछे सवारी पर बैठा था कि आपने फऱमायाः

«ऐ बेटे! मैं तुम्हें कुछ बातें सिखाता हूं: अल्लाह को याद रख, अल्लाह तेरी रक्षा करेगा। अल्लाह को याद रख अल्लाह को अपने सामने पाएगा। जब तुझे कुछ सवाल करना हो, तो मात्र अल्लाह ही से सवाल कर, और जब तुझे सहायता की आवश्यकता हो, तो मात्र अल्लाह ही से सहायता माँग। और अच्छी तहर जान ले कि यदि सारा संसार इस बात पर एकत्र हो जाए कि तुझे किसी चीज़ से लाभ पहुंचा सके तो वह कदापि नहीं पहुंचा सकते, हाँ मगर उस चीज़ के साथ जो अल्लाह ने तेरे भाग्य में लिख दी है। और यदि प्रत्येक जगत इस बात पर एकत्र हो जाए कि वह तुझे किसी चीज़ से हानि पहुंचा सके तो वह कदापि नहीं पहुंचा सकते परन्तु इस चीज़ के द्वारा जो अल्लाह ने तेरे भाग्य में लिख दी है। क़लम उठा लिए गए हैं। और सहीफें खुश्क हो चुके हैं।» (तिर्मिज़ी)

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

ईश्वर की महिमा ( एक प्रवचन)

हज़रत अबू ज़र ग़िफारी रज़ि0 का कथन है, कि अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल० ने बयान किया कि अल्लाह (ईश्वर) फरमाता हैः
· «ऐ मेरे दासो! मैंने स्वयं पर अन्याय को वर्जित कर लिया है,और तुम्हारे बीच भी इसे वर्जित कर दिया है इस लिए परस्पर एक दूसरे पर अन्याय न करो।
· हे मेरे दासो! तुम में से हर व्यक्ति पथभ्रष्ट है सिवाए इसके जिसका मैंने मार्गदर्शन कर दिया, अतः तुम मुझ से मार्गदर्शन का अनुरोध करो मैं तेरा मार्गदर्शन करुंगा।
· हे मेरे दासो! तुम में से हर व्यक्ति भूखा है, सिवाए उसके जिसे मैं ने खिलाया, तुम मुझ से खाना माँगो मैं तुम्हें खिलाऊंगा।
· हे मेरे दासो! तुम में से हर एक नंगा है,सिवाए उसके जिसे मैंने पहनाया,तुम मुझसे पोशाक माँगो, मैं तुझे कपड़े पहनाऊंगा।
· हे मेरे दासो! तुम रात और दिन पाप पर पाप किए जाते हो,और मैं तुम्हारे पापों को क्षमा करता रहता हूं,तुम मुझसे अपने पापों की क्षमा माँगो, मैं तुम्हारे पापों को क्षमा कर दूंगा।
· हे मेरे दासो! तुम न तो इस बात की क्षमता रखते हो कि मुझे हानि पहुंचा सको, न इस बात की क्षमता रखते हो कि मुझे लाभ पहुंचा सको।
· हे मेरे दासो! अगर तुम्हारे प्रथम से अन्तिम तक मानव से लेकर जिन्न तक प्रत्येक लोग इस विश्व के सब से "बड़े संयम" व्यक्ति के समान हो जाएं तो इस से मेरी बादशाही मैं कुछ भी वृद्धि न होगी।
· हे मेरे दासो! यदि तुम्हारे प्रथम से अन्तिम तक, मानव से लेकर जिन्न तक, सब के सब इस विश्व के सब से "बड़े पापी" व्यक्ति के समान हो जाएं तो इस से मेरी बादशाही मैं कुछ भी कमी न आएगी।
· हे मेरे दासो! यदि तुम्हारे प्रथम से अन्तिम तक, मानव से लेकर जिन्न तक, सब के सब एक मैदान में एकत्र हो जाएं, और मुझ से माँगते जाएं तथा मैं हर एक की आवश्यकताओं की पूर्ति कर दूं , इस से मेरे ख़ज़ाने में इतनी भी "कमी" नहीं आएगी जितना कि "सुई" को समुद्र में डबोने से समुद्र के जल में कमी आती है।» (सहीह मुस्लिम)

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

१२४००० संदेष्टाओं के पश्चात विश्व नायक क्यों ?

एक सज्जन ने बड़ा अच्छा प्रश्न किया कि क्यों ईश्वर ने एक लाख चौबीस हज़ार संदाष्टाओं को भेजा? शायद प्रमात्मा पहली बार सही धर्म न भेज पाया, क्यों नबियों का संदेश अधोरा रहा ? यह एक संदेह है जिसका निवारण होना चाहिए ताकि सत्य खुल कर सामने आ सके। इसी उद्देश्य के अन्तर्गत आपकी सेवा में हम यह लेख प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह सत्य है कि इस्लाम उसी समय से है जिस समय से मानव है। प्रथम मानव को इस्लाम ही की शिक्षा दी गई थी। औऱ इसी शिक्षा को मानव तक पहुचाने के लिए हर युग में संदेष्टा आते रहे। शुरु में हर एक जाति में अलग-अलग संदेशवहाक आते थे,उनकी शिक्षायें उनकी जाति तक ही सीमित रहती थीं। और उन्हें एक पूर्ण जीवन व्यवस्था भी नही दिया जाता था। उसका कारण यह था कि उस समय प्रत्येक जातियाँ एक दूसरे से अलग थीं। उनके बीच अधिक मेल जूल न था। भाषायें विभिन्न होती थीं, जिन्हें सीखने की ओर लेग बहुत कम ध्यान देते थे। मानव बुद्धि भी बहुत सीमित थी, ऐसी स्थिती में एक ही शिक्षा का प्रत्येक जातियो में फैलाना अत्यन्त कठिन था, क्यों कि मानव जाति की प्रगति उसी प्रकार हुई है जिस प्रकार एक बच्चे की प्रगति होती है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था फिर युवावस्था। इस प्रकार ईश्वरीय संदेश का भी उसी युग के अनुसार होना आवश्यक था। अतएवं ईश्वर ने रोगी की सामर्थ्य के अनुकुल औषधि का भी चयन किया और मानव जाति को इतने ही आदेश दिए जिसकी वह शक्ति रखती हो।इसी लिए उनको पूर्ण-जीवन व्यवस्था नहीं दिया गया। यह उस तत्वदर्शी ईश्वर की तत्वदर्शीता थी।
जबकि हम देखते हैं कि सातवीं शताब्दि ई0 मे ऐसी स्थिती नहीं थी। यातयात के साधन बहुत हद तक ठीक हो गए थे। व्यापार, कला-कौशल, की उन्नति के साथ साथ जातियों में परस्पर सम्बन्ध का़यम हो गये थे। चीन और जापान से लेकर यूरोप और अफ्रीक़ा के देशों तक जलीय तथा स्थलीय यात्राओं की शुरुआत हो गई थी,बडे़ बडे़ विजेताओ ने कई कई देशो को एक राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ दिया था। इस प्रकार वह दूरी और जुदाई जो पहले मानव जाति के बीच पाई जाती थी धीरे धीरे कम होती गई और यह सम्भव हो गया कि इस्लाम की एक ही शिक्षा और एक ही धर्म विधान प्रत्येक संसार के लिए भेजा जाय़े। इस संक्षिप्त विवरण से शायद संदेह का निवारण हो गया होगा ।