शनिवार, 24 अप्रैल 2010

संदेहों का निवारण (अन्तिम भाग)

प्रश्नः इस दुनिया में हिन्दू तो पहले से हैं,लेकिन मुसलमान बाद में क्यों बने...???

उत्तरःमानव इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि इस धरती पर अलग अलग विभिन्न मानव नहीं बसाए गए अपितु एक ही मानव से सारा संसार फैला है। निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दें, आपके अधिकांश संदेह खत्म हो जाएंगे।
सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है, ईश्वर ने सर्वप्रथम विश्व के एक छोटे से कोने धरती पर मानव का एक जोड़ा पैदा किया जिनको आदम तथा हव्वा के नाम से जाना जाता है। उन्हीं दोनों पति-पत्नी से मनुष्य की उत्पत्ति का आरम्भ हुआ जिन को कुछ लोग मनु और शतरूपा कहते हैं तो कुछ लोग एडम और ईव जिनका विस्तारपूर्वक उल्लेख पवित्र ग्रन्थ क़ुरआन(230-38) तथा भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व खण्ड 1 अध्याय 4 और बाइबल उत्पत्ति (2/6-25) और दूसरे अनेक ग्रन्थों में किया गया है। उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम कहते हैं जो आज तक सुरक्षित है।
ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें। वह हर देश और हर युग में भेजे गए, उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती है, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ति-पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं, उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
परन्तु उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखें सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना आदि।
लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं। फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाली तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की सन्तान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता है कि उन्हों ने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार की थी तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया।

बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया।

इसे यूं समझिए कि यदि कोई पत्रवाहक एक व्यक्ति के पास उसके पिता का पत्र पहुंचाता है  तो उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके परन्तु यदि वह पत्र में पाए जाने वाले संदेश को बन्द कर के रख दे और  पत्रवाहक का ऐसा आदर सम्मान करने लगे कि उसे ही पिता का महत्व दे बैठे तो इसे क्या नाम दिया जाएगा....आप स्वयं समझ सकते हैं।

ऐसा ही बिल्कुल संदेष्टाओं के साथ भी हुआ।

जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा तो ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है । उनके समान धरते ने न किसी को देखा न देख सकती है। वही कल्कि अवतार हैं जिनकी हिन्दु समाज में आज प्रतीक्षा हो रही है।

प्रश्नः अल्लाह ने सभी को अपने मज़हब का क्यों नहीं बनाया...???
उत्तरः इसका उत्तर क़ुरआन ने विभिन्न स्थानों पर दिया है क़ुरआन में कहा गयाः "(ऐ मुहम्मद) यदि आपका रब चाहता तो सब लोगों को एक रास्ते पर एक उम्मत कर देता, वे तो सदैव मुखालफ़त करने वाले ही रहेंगे। सिवाए उनके जिन पर आपका रब दया करे, उन्हें तो इसी लिए पैदा किया है। " (सूरः हूद 118) यही विषय सूरः यूनुस 96,सरः माईदा 48,सूरः शोरा 8,सूरः नहल 93 और अन्य विभिन्न आयतों में बयान किया गया है।

यह संसार परीक्षा-स्थल है परिणाम स्थल नहीं। यहाँ हर व्यक्ति को एक विशेष अवधि के लिए बसाया गया है ताकि उसका पैदा करने वाला देखे कि कौन अपने रब की आज्ञाकारी करके उसका प्रिय बनता है और औन उसकी अवज्ञा करके उसके प्रकोप का अधिकार ठहरता है। इसके लिए उनसे संदेष्टाओं द्वारा अपना संदेश भेजा और सत्य को खोल खोल कर बयान कर दिया है। फिर इनसान को उसे अपनाने की आज़ादी भी दे दी है कि चाहे तो उसके नियम को अपना कर उसके उपकारों का अधिकार बने और चाहे तो उसके नियमों का उलंधन कर के उसके प्रकोप को भुगतने के लिए तैयार हो जाए। यही है जीवन की वास्तविकता।
इस बिन्दु को क़ुरआन की यह आयत स्पष्ट रूप में बयान करती हैः "और यदि आपका रब चाहता तो धरती के सभी लोग ईमान ले आते, तो क्या आप लोगों को ईमान लाने के लिए मजबूर करेंगे" (सूरः यूनुस 99)

प्रश्नः बहुत से सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब हम बचपन से तलाश रहे हैं...मसलन ….अल्लाह ने संसार की सृष्टि करके इसे हिन्दुओं के हवाले क्यों कर दिया...??? हिन्दुओं के दौर में भी संसार आगे बढ़ा... कई सभ्यताएं आईं...
उत्तरः इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है कि पहले लोग एक ही धर्म पर थे, बाद में अलग अलग धर्मों में बट गए, वही प्रथम धर्म आज इस्लाम के नाम से जाना जाता है।

प्रश्नः दूसरे मज़हब के लोगों को किसने पैदा क्या है...??? अगर अल्लाह ने... तो फिर क्यों अल्लाह को मानने वाले 'मुसलमान' दूसरे मज़हबों के लोग को 'तुच्छ' समझते हैं... क्या अपने ही अल्लाह की संतानों (दूसरे मज़हब के लोगों) के साथ ऐसा बर्ताव जायज़ है...???
उत्तरःजी हाँ! सारे इनसानों को अल्लाह ही ने पैदा किया परन्तु उन्हें जो चलने का नियम दिया उसे अधिकांश लोगों ने अपने सवार्थ हेतु परिवर्तित कर के विभिन्न धर्मों में विभाजित हो गए, आज वह अपने सृष्टिकर्ता के नियमानुसार नहीं चल रहे हैं  हालाँकि जिस उद्देश्य के अनतर्गत परमेश्वर ने मानव की रचना की थी उसकी वह प्रतिदिन अवहेलना कर रहा है ज़रा कल्पना कीजिए कि एस कर्मचारी किसी कम्पनी में बहाल होता है, कम्पनी उसे वेतन देती है परन्तु वह काम किसी दूसरी कम्पनी में जा कर करने लगे तो कम्पनी के मनेजर को उस पर अवश्य क्रोध होगा। फिर भी एक मुसलमान किसी धर्म के मानने वाले को तुच्छ नहीं समझता और न ही उसके साथ अलग व्यवहार करता है। जो लोग ऐसी मानसिकता रखते हैं वह इस्लामी नियम से अवगत नहीं।  

प्रश्नः क्या दूसरे मज़हबों के धार्मिक ग्रंथों और उनके ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातें करने से... उनका दिल दुखाने से अल्ल्लाह ख़ुश होगा...???
 उत्तरः हमें पूर्ष विश्वास है कि अन्य धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ या तो मानव रचित हैं अथवा किसी युग में ईश्वरीय ग्रन्थ थे परन्तु आज वह सुरक्षित न रहे और उनमें देवी देवताओं की बातें भी सम्मिलित हो चुकी हैं लेकिन क़ुरआन आज तक पूर्ण रूप में सुरक्षित है स्वयं उसकी आधुनिक शैली इस पर प्रमाण है।
इन स्पष्ट तथ्यों के बावजूद  इस्लाम दूसरे धर्मों के बारे में अपमानजनक बातें कहने की अनुमति कदापि नहीं देता। देखिए सूरः अनआम 108 " जो लोग अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की पूजा करते हैं उनकों बुरा भला मत कहो कि वह अज्ञानता के कारण अल्लाह को बुरा भला कहेंगे।" 

प्रश्नः 'मुसलमानों' की अपने मज़हब को श्रेष्ठ समझने और दूसरे मज़हबों को 'तुच्छ' समझने की मानसिकता ने बहुत से विवादों को पैदा कर दिया है... इनमें सबसे अहम है दहशतगर्दी... जिससे आज कई मुल्क जूझ रहे हैं... इससे इनकार नहीं किया जा सकता...
उत्तरः जी नहीं! हमें कहने दिया जाए कि एक सच्चा मुसलमान सच्चा मानव होता है क्योंकि वह विश्व भाईचारा पर विश्वास रखता है। वह सारे संसार के लोगों को अपना भाई समझता है। इस लिए एक सच्चा मुस्लिम कभी किसी अन्य धर्म के मानने वाले को अकारण हीनि नहीं पहुंचा सकता। और दहशतगर्दी का इस्लाम से कोई सम्बन्ध नहीं और हाँ! मात्र इस्लाम में नहीं अपितु हर धर्म में दहशतगर्द पाए जाते हैं जिसका इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्नःजब अल्लाह ने सभी को 'मुसलमान' पैदा नहीं किया तो फिर क्यों मज़हब के ठेकेदार सभी कौमों को 'मुसलमान' बनाने पर तुले हुए हैं...???
 बहन जी ! कोई भी मुसलमान किसी गैर-मुस्लिम को मुसलमान बनाने का प्रयास  नहीं करता है, इस्लाम का सम्बन्ध दिल से है, एक व्यक्ति स्वयं अपने दिल से इसे अपनाता है। ऊपर तो आपने क़ुरआन की यह आयत पढ़ ही ली है कि "क्या आप लोगों को ईमान लाने के लिए मजबूर करेंगे" (सूरः यूनुस 99) इसी लिए अगर कोई सौ बार भी कलमा पढ़ ले और स्वयं को मुसलमान कहे लेकिन यह दिल से नहीं है तो वह मुसलमान नहीं हो सकता। तात्पर्य यह कि एक मुस्लिम किसी को मुसलमान बनाता नहीं है बल्कि उनकी धरोहर का उनके समक्ष परिचय कराता है और बस। यही तो असल मानवता है कि अपने भाई को उसके वास्तविक पूज्य से परिजीत करा दिया जाए मानना न मानना उसके हाथ में है।   

प्रश्नःइस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद (सल्लल.) से पहले जो एक लाख 24 हज़ार नबी हुए हैं... वो किस मज़हब को मानते थे...??? 
उत्तरः यहाँ इस गलतफ़हमी को दूर कर लीजिए कि  इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद सल्ल0 नहीं बल्कि वह इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा हैं जिसका विस्तृत बयान ऊपर हो चुका है। और मानव मार्गदर्शन हेतु एक लाख चौबीस हज़ार नबी जो आए वे सब के सब इस्लाम के मानने वाले थे जैसा कि यह बात ऊपर बताई जा चुकी है। एक बार फिर ऊपर की व्याख्या को पढ़ लिया जाए। धन्यवाद।
अंत में हम अल्लाह (ईश्वर) से प्रार्थना करते हैं कि हे अल्लाह! हे  ईश्वर! तू हमें अपने सत्य नियम से अवगत करा। क्योंकि हमें एक दिन मरना है, तेरे पास पहुंचना हैं और अपने कर्मों का लेखा जोखा देना है। हे अल्लाह! तू ही हमारा मार्गदर्शन कर सकता है तेरे अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं जो हमारा मार्गदर्शन कर सके। आमीन

संदेहों का निवारण (3)

संदेहः (1) मुसलमानों में बच्चों को यही बुनियादी तालीम दी जाती है कि दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र मज़हब है जो अल्लाह का है और अल्लाह ने ही शुरू किया है, जबकि दूसरे धर्म मनुष्य ने शुरू किए हैं...

उत्तरः बहन जी! यह बिल्कुल सही है कि मुसलमान अपने बच्चों को इस्लाम की शिक्षा शुरू से ही देते हैं, उनको अल्लाह का ज्ञान भी दिया जाता है और यह  भी बताया जाता है कि ईश्वर ने मानव को बनाया और धर्ती पर बसाया तो उन्हें यूं ही नहीं छोड़ दिया कि जैसे चाहें जीवन बिताएं बल्कि जिस प्रकार एक कम्पनी कोई सामान तैयार करती है तो उसके प्रयोग करने का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को जीवन बिताने का नियम भी दिया। यह नियम एक ही हो सकता है क्यों कि मानव की उत्पत्ति एक ही माता पिता से हुई, उत्पत्ति का नियम भी एक ही है, हर एक की उत्पत्ति एक प्रकार की धातु से होती आ रही है, और उत्पत्ति करने वाला भी मात्र एक ईश्वर (अल्लाह) है। चार प्रकार की यह समानताएं इस बात का पता देती हैं कि मानव का धर्म भी एक ही होना चाहिए। न कि अलग अलग। अब प्रश्न यह है कि धरती पर विभिन्न धर्म कैसे पैदा हुए तो इसके लिए आगे पढ़िए।

संदेह (2) अल्लाह सर्वशक्तिमान है, जबकि दूसरे धर्मों के देवी-देवता 'शैतान' हैं...यानी अल्लाह के विरोधी हैं...

उत्तरः मुसलमानों के हाँ अल्लाह की कल्पना किसी विशेष जाति तथा वंश तक सीमित नही है बल्कि वह विश्व का सृष्टीकर्ता, स्वामी और पालनकर्ता है। वह अल्लाह एक है, उसके पास माता पिता नहीं, उसके पास सन्तान नहीं, उसको किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं पड़ती, वह मानव रूप धारण नहीं करता। उसका कोई भागीदार नहीं। यह शिक्षा मात्र इस्लाम की नहीं अपितु सारे धार्मिक ग्रन्थों की है। और यह बात नोट कर लें कि एक मुसलमान दूसरे धर्मों के देवी देवताओं के लिए अपशब्द का प्रयोग नहीं करता परन्तु यह अवश्य कहता है कि यह देवी देवता जिनकी पूजा की जा रही है उनको पूजने की शिक्षा स्वयं उन्हों ने नहीं दी थी और न आज उनके धार्मिक ग्रन्थ दे रहे हैं देखिएऋवेद 4 / 12 /1 दुवैरा सत्यि बहिर्षि सैकड़ों देवी देवताओं का बहिष्कार करो। और अर्थवेद 9/ 40 मैं आया है " जो लोग झूठे अस्तित्व वाले देवी देवताओं की पूजा करते हैं वे अंधा कर देने वाले गहरे अंधकार में डूब जाते हैं। वह एक ही अच्छी पूजा करने योग्य है। "

संदेह (3) ऐसे में भला कौन अपने अल्लाह के विरोधियों को अच्छा समझेगा...??? उनके देवी-देवताओं के बारे में ग़लत बातें की जाती हैं... इसलिए लोगों की ऐसी मानसकिता बन जाती है कि वो ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को तुच्छ समझते हैं...
उत्तरः जैसा कि हमने ऊपर ही बता दिया है कि इस्लाम वही कहता है जो अन्य धर्मों के धर्मिक ग्रन्थ कहते हैं। इसलिए आज एक मुस्लिम यह समझता है कि हमारे उन भाईयों को पता नहीं है जिसके कारण वह देवी देवताओं की पूजा कर रहे हैं। इस लिए वह प्रेम से, स्नेह से, मुहब्बत से उनके सामने अनके अपने ईश्वर का परिचय कराता है लेकिन वह अन्य धर्म के मानने वालों को बुरा नहीं समझता, न उनके देवी देवताओं के सम्बन्ध में ग़लत बातें कहता है...और कहे भी क्यों जब कि क़ुरआन ने रोक दिया.. देखिए सूरः अनआम 108
" जो लोग अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की पूजा करते हैं उनकों बुरा भला मत कहो, कि वह अज्ञानता के कारण अल्लाह को बुरा भला कहेंगे।"
 देखा ! इस्लाम हमें यही सिखाता है कि हम उनके पूज्यों के सम्बन्ध में ग़लत बातें न करें परन्तु हम उनकी पूजा करने नहीं जा सकते क्योंकि हमें सत्य और असत्य का ज्ञान है। फिर भी हम इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ भाई का समान व्यवहार करते हैं औऱ पारस्परिक सम्बन्ध में उनको वह सारा अधिकार देते हैं जो एक मुस्लिम को प्राप्त है। क्योंकि क़ुरआन ने हमें यही शिक्षा दी है देखिए ]60:8]
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है।

संदेहः (4) हम एक साल तक मदरसे में पढ़े हैं, यानि तीसरी जमात... हमें भी यह सब पढ़ाया गया है...हमने अप्पी (मुल्लानी जी को अप्पी कहते थे) से पूछा- जब हमारा अल्लाह ही सर्वश्रेष्ठ है तो फिर...क्यों हिन्दुओं की मुरादें पूरी होती हैं...???

उत्तरः जी हाँ ! अल्लाह से ही माँगना चाहिए और अल्लाह के अतिरिक्त कियी अन्य से माँगना महापाप है बल्कि इस्लाम में सब से बड़ा पाप यही हैं। यदि कोई अल्लाह के अतिरिक्त अन्य से माँगता है तो उसकी प्रार्थना भी स्वीकार नहीं होती बस उसके दिल में उसके प्रति आस्था बैठ जाती है हालाँकि देने वाला तो ऊपर वाला अल्लाह होता है वह अपनी असीम दया से प्रदान करता है कुरआन में कहा गयाः (देखिए सूरः अहक़ाफ 5 ) "और उस से बढ़ कर ज़्यादा गुमराह कौन होगा जो अल्लाह के अतिरिक्त ऐसों को पुकारता है जो क़यामत तक उसकी प्रार्थना न क़ुबूल कर सकें बल्कि उनके पुकारने से केवल ग़ाफिल हों "  ( शेष अगले  पोस्ट पर)

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

संदेहों का निवारण (2)

 इस्लाम सुधारवादी बनाता है आतंकवादी नही 
इस्लाम ने मानव को हर योग में सुधार की शिक्षा दी और आतंक से दूर रखा बल्कि इस्लाम आया ही इसी लिए ताकि शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो, कुप्रथाओं का नष्ट हो और समाज में प्रेम की भावनाएं पैदा हों। इसी लिए मुसलमान जहाँ कहीं गए लोगों ने उनके प्रेम-भाव से प्रभावित हो कर उनके धर्म को गले लगा लिया। स्वयं भारत में जब मुहम्मद बिन क़ासिम का आगमन हुआ तो उनके आचरण तथा सद्-व्यवहार से भारतवासी इतने प्रभावित हुए कि भारत के हिन्दुओं ने अपने मन्दिरों में उनका चित्र बना कर सजा लिया। इस्लाम इस बात की अनुमति कदापि नहीं देता कि लोग सुधार के नाम पर मरने मारने के लिए उतारू हो जाएं और यदि कोई मरने मारने पर उतारु हो चुका है तो वह आतंकवादी है सुधारवादी नहीं। इस्लाम का आतंक से कोई सम्बन्ध नहीं, इस्लाम और आतंक ऐसे ही है जैसे आग और पानी। इस्लाम का शाब्दिक अर्थ ही होता है "शान्ति"।

इस्लाम ने हर युग में सुधार किया और आज भी सुधार करना ही उसके वजूद का मूल उद्देश्य है। औऱ सुधार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। क्यामत की सुबह तक सुधार का यह काम चलता रहेगा। यह भी सही है कि आज मुसलमानों में (इस्लाम में नहीं) कुछ प्रक्रियाएं ऐसी आ गई हैं जिनके कारण लोग इस्लाम को "कुछ मुसलमानों" के व्यवहारिक जीवन से तुलना करके देखने लगे हैं। यहाँ पर मुझे महाकवि टैगोर की बात याद आ रही हैं। उनके साथ एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे मौलाना सय्यद सुलैमान नदवी, इस्लाम के इतिहासकार, इन दोनों महान विद्वानों को एक साथ देख कर किसी व्यक्ति ने पूछ दिया कि आज इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों न फैल रहा है जितनी तेज़ी से मुहम्मद सल्ल० और पहले युग में फैसा - सय्यद नदवी साहिब ने टैगोर से इस प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की । तब टैगोर ने बताया कि " तब सत्य धर्म की अच्छाइयों और भलाइयों को जानने के लिए लोगों को पुस्तकालयों का रुख़ नहीं करना पड़ता था, वह हर मुसलमान के जीवन ही में विधमान था।"
क्या भारत के मुसलमान गुरु देव की बात पर ध्यान देंगे ? जी हाँ । आज सब से बड़ी बाधा हमारे देशवासियों के लिए कुछ मुसलमानों के घृणित कर्तव्य हैं । आज अन्य लोग अपनी इस धरोहर का विरोध मात्र इस कारण कर रहे हैं कि वह मुसलमानों को उसके अनुसार चलते हुए नहीं देखते।

और हाँ! इस्लाम में सुधार की जहाँ जक बात है तो इस्लामिक ला में ग्रेजुवेशन करने के नाते मैं यह कहना चाहूंगा कि इस्लामी शास्त्र में समयानुसार संशोधन की गुंजाइश रखी गई है। जो क़ुरआन और हदीस की रोशनी में ही होगी। आज भी होती रहती है और इस विषय में एक व्यक्ति अपनी खास राय भी रख सकता है। मिसाल के तौर पर निक़ाब के मस्ला ही को लीजिए, कितने इस्लामी विद्वानों ने कहा कि महिला का चिहरा पर्दा में दाखिल नहीं है। हम ऐसे विद्वानों की राय का सम्मान करते हैं। लेकिन जहाँ तक इस्लामी आस्था की बात हैं तो इसमें कोई ताल मेल नहीं...इसमें कोई समझौता नहीं...कोई सन्धि नहीं...एक लाख चौबीस हज़ार संदेष्टा मानव मार्गदर्शन हेतु भेजे गए जिनमें सब का संदेश यही रहा कि एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं। आप जानती हैं कि इस्लाम का मूल स्तम्भ एकेश्वरवाद है, मात्र एक ईश्वर की पूजा...अब यह कैसे हो सकता है कि एक मुसलमान मन्दिर में जाए...और पूजा पाट करे...इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरे धर्मों को बुरा भला कहते हैं, पदापि नहीं अपितु हम दूसरे धर्मों का सम्मान करते हैं, उनके धार्मिक गुरुओं के प्रति कोई अपशब्द का प्रयोग नहीं करते...हम गैर-मुस्लिम भाइयों के साथ एक मुस्लिम का सा व्यवहार करते हैं क्योंकि यही इस्लाम की शिक्षा है परन्तु हम अपनी आस्था का सौदा नहीं कर सकते। उदारता के लिए क्या यही रह गया है कि हम अपनी मूल आस्था को त्याग दें...? (शेष अगले पोस्ट पर)

संदेहों का निवारण (1)

बहन फिर्दौस खान ने अपने ब्लौग पर कुछ सवाल पूछा है जो अति महत्वपूर्ण हैं निम्न में उनके जवाब एक एक कर के दे रहा हूँ, कामों के हुजूम, समय की तंगी और सवाल के तफ्सील तलब होने के कारण मैं कई भागों में इसका उत्तर दूगाँ। आशा है कि इन सवालों पर चिंतन मनन करेंगी। हमारा उद्धेश्य ज्ञान का आदान प्रदान है और बस।

सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ताः
सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ता अपितु सवाल करने से ज्ञान में वृद्धि होती है। इसी लिए इस्लाम सवाल कर के ज्ञान को बढ़ावा देने की उत्साह पैदा करता है। मुहम्मद सल्ल0 के साथी आप से कहीं रास्ते में मिलते अथवा सभा में होते सवाल करके धार्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे। हदीस की पुस्तकों में इस प्रकार के सवालों का भण्डार पाया जाता है।

स्वयं क़ुरआन में अनुमानतः 15 स्थानों पर यूं आया हैः "लोग आप से ....के सम्बन्ध में पूछते हैं, तो आप कह दीजिए कि …

सात सवाल सूरः बक़रा में
 يسئلونك عن الأهلة --يسئلونك ماذا ينفقون قل ما أنفقتم --يسئلونك عن الشهر الحرام قتال فيه قل قتال فيه-- يسئلونك عن الخمر والميسر-- ويسئلونك ماذا ينفقون قل العفو--ويسئلونك عن اليتامى قل إصلاح لهم خير-- ويسئلونك عن المحيض-


एक सवाल सूरः माईदा में: يسئلونك ماذا أحل لهم قل أحل لكم الطيبات
दो सवाल सूरः आराफ में
. يسئلونك عن الساعة أيان مرساها قل إنما علمها عند ربي--- يسئلونك كأنك حفي عنها قل إنما علمها عند الله
एक सवाल सूरः अनफ़ाल में    يسئلونك عن الأنفال قل الأنفال لله والرسول
एक सवाल सूरः इस्रा में ويسئلونك عن الروح قل الروح من أمر ربي
एक सवाल सूरः कहफ़ में  ويسئلونك عن ذي القرنين
एक सवाल सूरः ताहा में ويسئلونك عن الجبال فقل ينسفها ربي نسفاً
एक सवाल सूरः नाज़ियात में يسئلونك عن الساعة أيان مرساها


क़ुरआन में यह भी आया हैः "हमारे उन संदेष्टाओं से पूछो जिन्हें हमने आप से पूर्व भेजा था... " (सूरःज़ुखरुफ 45)
सवाल आधा ज्ञान है और उत्तर आधा ज्ञान और अच्छा सवाल करना अच्छी बुद्धि का प्रेरक होता है। हदीस की किताब सुनन अबी दाऊद में है कि एक व्यक्ति को सर में ज़ख़्म हो गया, उसने (साधारण लोगों से) पूछा कि क्या मेरे लिए तयम्मुम करने की अनुमति है? लोगों ने (ज्ञान न होने के बावजूद) कह दिया कि नहीं तेरे लिए छूट नहीं। उसने पानी से स्नान कर लिया, जिस से उसके सर में पानी प्रवेश कर गया और वह मर गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल0 को इस की सूचना मिली तो आपने फरमायाः उन लोगों ने उसे (ग़लत मस्ला बता कर) क़त्ल किया है अल्लाह उनको क़त्ल करे, ज्ञान नहीं था तो पूछ ली होती, अज्ञानता की औषधि सवाल करना ही है।"
 क़ुरआन यह भी कहता हैः
"यदि तुम नहीं जानते हो तो ज्ञान रखने वालों से पूछ लो" (सूरः नहल43)
हाँ सवाल करने से उस समय मना किया गया है जबकि ऐसी चीज़ के सम्बन्ध में सवाल किया जाए जिसकी कोई ज़रूरत न हो। उसी प्रकार सवाल करने का तात्पर्य समझना हो न कि बकवास करना।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

शान्ति...शान्ति...शान्ति

इस्लाम का उद्देश्य पूरे संसार में शान्ति स्थापित करना है। इस्लाम हर धर्म का सम्मान करता है। क़ुरआन में इनसानी जानों का सम्मान इतना किया गया है कि उसने किसी एक व्यक्ति (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो) की हत्या को सारे संसार की हत्या सिद्ध करता हैः “जो कोई किसी इनसान को जबकि उसने किसी की जान न ली हो अथवा धरती में फसाद न फैलाया हो, की हत्या करे तो मानो उसने प्रत्येक इनसानों की हत्या कर डाला और जो कोई एक जान को ( अकारण कत्ल होने से) बचाए तो मानो उसने प्रत्येक इनसानों की जान बचाई” (सूरः माईदा आयत न0 32) और मुसलमान जिस नबी को अपनी जान से अधिक प्रिय समझते हैं वह प्रत्येक संसार के लिए दयालुता बन कर आए थे (हे मुहम्मद)हमनें आपको सम्पूर्ण संसार के लिए दयालुता बना कर भेजा है ” (सूरः अंबिया 107)
मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में आता है जो कोई इस्लामी शासन में रहने वाले गैर मुस्लिम की हत्या कर दे वह स्वर्ग की बू तक न पाएगा” (सही बुख़ारी)

देखा! यह है इस्लाम की शिक्षा… और एक मुसलमान इसी पर 100 प्रतिशत विश्वास रखता है। एक मुस्लिम कभी किसी गैर-मुस्लिम को गैर-मुस्लिम होने के नाते किसी प्रकार का कष्ट कदापि नहीं पहुंचा सकता इसलिए कि वह जानता है कि सारे इनसान एक ही माता पिता की सन्तान हैं।
ज़रा आप मुहम्मद सल्ल0 की आदर्श जीवनी का अध्ययन कर के देख लीजिए उनके शत्रुओं ने उनको और उनके अनुयाइयों को निरंतर 13 वर्ष तक मक्का में हर प्रकार की यातनाएं दीं। उनके गले में रस्सी डाल कर मक्का की गलियों में घसेटा गया, अरब की तपती हुई भूमि पर,दहकते कोइले पर लिटान कर उनकी छाती पर पत्थर रखा गया। जब अत्याचार बर्दाश्त से बाहर हो गया तो कुछ लोग देश त्याग कर के हबशा में शरण ली। मुहम्मद सल्ल0, आपके अनुयाइयों तथा आपके सहायक पारिवारिक व्यक्तियों का सामाजिक बाइकाट किया तो उन्हें तीन वर्ष तक नगर से बाहर एक पहाड़ी की घाटी में शरण लेनी पड़ी। मुसलमानों को देश निकला दिया और सारे के सारे मुसलमान अपनी सारी सम्पत्ति छोड़ कर मदीना में जा बसे। यहाँ तो कम से कम शत्रुओं को चैन से रहने देना चाहिए था लेकिन मक्का आने के बाद भी आठ वर्ष तक मुसलमानों के विरोद्ध युद्ध ठाने रखा।
लेकिन आप और आपके अनुयाई इन सब को सहन करते रहे यहाँ तक कि 21 वर्ष तक अत्याचार सहते सहते जब अन्त में मक्का पर विजय पा चुके तो सार्वजनिक क्षमा की घोषणा कर दी। जिसका परिणाण यह हुआ कि मक्का विजय के वर्ष उनके अनुयाइयों की संख्या 10 हज़ार थी तो दो वर्ष में ही एक अन्तिम हज के अवसर पर एक लाख चालीस हज़ार हो गई। क्यों वह सोचने पर विवश हुए कि जिस इनसान को हमने 21 वर्ष तक चैन से रहने नहीं दिया हम पर क़ाबू पाने के बाद हमारी क्षमा की घोषणा कर रहा है, मानो यह स्वार्थी नहीं बल्कि हमारी भलाई चाहता है।
आज तालबान अथवा उनके सहयोगी जो इस्लाम के नाम पर लोगों की हत्या कर रहे हैं इस्लाम इसकी अनुमति कदापि नहीं देता। और हम उनकी कट्टरता का पूर्ण रूप में विरोद्ध करते हैं। हमारी वही आस्था है जिसकी ओर क़ुरआन ने संकेत किया कि एक इनसान की हत्या मानो सम्पूर्ण इनसान की हत्या है।  

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

एक संदेह

कल सजीव भाई ने हमारे ब्लाँग के तीन लेखों पर अलग अलग एक ही टिप्पणी डाली जिसका सार यह है कि:
(1) मुस्लिम हर धर्म की समानता की बात करता है परन्तु इस्लाम, क़ुरआन और मुहम्मद सल्ल0 को ऊपर दिखाना चाहता है। क्यों...?
(2) मुहम्मद सल्ल0 की तुलना अन्य धार्मिक ग्रन्थों से मत करो।
(3) क़ुरआन अच्छा ग्रन्थ है परन्तु उसमें समयानुसार कुछ चैंज हो जाए तो अच्छा होता।

यह विचार अधिकांश भाइयों का है इस लिए संक्षिप्त में पोस्ट के रूप में इसका उत्तर देने की कोशिश की जा रही है। आशा है कि मेरी प्रेमवाणी पर चिंतन मनन किया जाएगा।
जी हाँ! मुस्लिम हर धर्म का सम्मान करता है, उनके गुरुओं को भी बुरा भला नहीं कहता लेकिन सत्य को बताने से भी नहीं चुकता क्यों कि यदि सत्य को न बताया जाए तो लोग अंधकार में पड़े रहेंगे।
(1) सत्य धर्म केवल एक ही हो सकता है, ईश्वर जब एक है तो उसका नियम भी एक ही होगा ना...वही तो इस्लाम है जिसे हर युग में संदेष्टाओं ने लोगों से उसका परिचय कराया..., जिसे संदेष्टाओं के अनुयाई अपनी अपनी भाषा में विभिन्न नाम से जानते थे। अरबी में आज उसी धर्म का नाम इस्लाम है। इसी को सनातन धर्म भी कह सकते हैं। इस धर्म का मूल सार है एक ईश्वर की पूजा...और यह पूजा आज के युग में अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के बताए हुए नियमानुसार होगी। यह कहना भी सही नहीं कि सारे धर्म एक हैं और ईश्वर तक पहुंचना किसी एक धर्म के पालन पर निर्भर नहीं है...ऐसा इस लिए सही नहीं कि ईश्वर एक है तो सम्पर्क मात्र उसी से होना चाहिए...और उस तक पहुंचने का वही रास्ता है जिसे उसने स्वयं बता दिया है...और एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक सीधी लाइन एक ही हो सकती है, यदि इनसान ईश्वर को संसार का बनाने वाला मानता है तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह शासक भी है और शासक के आज्ञापालन का नियम और क़ानून एक ही हो सकता है।

(2) आपका कहना कि मुहम्मद को मुहम्मद ही रहने दो उनके समर्थन के लिए अन्य धार्मिक ग्रन्थों का हवाला न पेश करो... तो इस सम्बन्ध में जानने की बात यह है कि वह अन्तिम अवतार हैं... जिनके आने की भविष्यवाणी केवल हिन्दू ग्रन्थों ही नहीं अपितु प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थों ने की थी। क्योंकि ईश्वर ने एक लाख चौबीस हज़ार संदेष्टाओं को अलग अलग देशों में मात्र इस लिए भेजा था कि उस समय मानव अलग अलग टोलियों में बटे हुए थे, यातायात के साधन नहीं थे, एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क नहीं था...एक दूसरे की भाषा को सीखने का प्रचलन भी नहीं था। अतः आवश्यकता थी कि ईश्वर मानव मार्गदर्शन हेतु हर भाषा तथा हर देश में अलग अलग संदेष्टा भेजे...परन्तु सब का संदेश एक ही रहा और सारे संदेष्टाओं ने अपने अपने अनुयाइयों को अन्तिम अवतार के आने की सूचना भी दी जो अब तक उनके ग्रन्थों में मौजूद है। जब सातवी शताब्दी ईसवी में भौतिक, सामाजिक और राजनीतिक उन्नति ने दुनिया को एक कर दिया तो सब से अन्त में ईश्वर ने मुहम्मद सल्ल0 पर अन्तिम संदेश उतारा। इसी लिए वह जगत-गरु हैं, सारे धर्मों के गुरू।
मेरे भाई! निष्पक्ष हो कर इस्लाम का अध्ययन करने की ज़रूरत है पता चल जाएगा कि जिसका हम विरोद्ध करने बैठे हैं यह स्वयं हमारी धरोहर है। हम आपके शुभचिंतक हैं,स्वार्थी नहीं, हमें इस से आखिर क्या लाभ होने वाला है, बस हमें सहानुभूति प्रिय है, सच्ची हमदर्दी का हक़ अदा करना हमारा कर्तव्य है। हमारा काम पहुंचा देना है मानना न मानना आपके एख्तियार में है।

(3) कुरआन ईश्वर की वाणी है यह मानव रचना नहीं, न हो सकता है, क्योंकि आज तक क़ुरआन स्वयं चैलेंज कर रहा है (यदि तुम क़ुरआन के सम्बन्ध में संदेह में पड़े हो तो उसके समान एक सूरः ही ले आओ यदि तुम सच्चे हो ) (2:23) पर इतिहास साक्षी है कि आज तक कोई क़ुरआन के समान न एक टूकड़ा बना सका है और न बना सकता है। जबकि मुहम्मद सल्ल0 जिन पर क़ुरआन उतरा न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 की बातें जिनको हदीस कहा जाता है उनमें और क़रआन में आसमान और ज़मीन का अंतर है। तात्पर्य यह कि क़ुरआन कोई मानव रचना नहीं कि उसमें समयानुसार परिवर्तन करने की आवश्यकता पड़े क्यों कि इंसान अपने युग के अनुसार सोचता है इसी लिए मानव रचित ग्रन्थों में इसकी आवश्यकता पड़ सकती है लेकिन क़ुरआन उस ईश्वर की वाणी है जो स्वयं संसार का सृष्टा है। सृष्टा ही सृष्टि की आवश्यकताओं से भलीभांति अवगत होता है। फिर आज तक इसका एक एक शब्द भी सुरक्षित है।

आपका यह संदेह कि यदि क़ुरआन ईश्वर की वाणी होता तो बिस्मिमिल्लाह से शुरू न किया जाता...जिसका अर्थ होता है शुरू करता हूं अल्लाह के नाम से... तो इसका उत्तर यह है कि यहाँ ईश्वर ने अपने शब्दों में मानव को सिखाया है कि उसकी प्रशंसा कैसे की जाए ताकि मानव ईश्वर के बताए हुऐ नियमानुसार ईश्वर की प्रशंसा करे। शायद मेरी बात स्पष्ट है। ईश्वर की आप पर दया हो।