जिस समय पूरी दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही थी और उसका कोई समाधान देखाई नहीं दे रहा था उस समय कुछ गैर-मुस्लिम पश्चिमी अर्थशास्त्र विशेषज्ञयों नें यह परामर्श दिया था कि विश्व आर्थिक संकट से निकलने के लिए इस्लामी आर्थिक नियम को अपनाना अति आवश्यक है। यूरोप की एक अर्थशास्त्र विशेषज्ञ महिला स्वाती ताजीना ने लिखा था " अमेरिका का आर्थिक संकट इस्लामी आर्थिक नियम के लिए शुभ अवसर है जो ब्याज से बिल्कुल खाली है। "
और पत्रिका तचालीज़ के सम्पादक ने लिखा था " यदि हमारे अर्थ व्यवस्था के विशेषज्ञों नें क़ुरआन की शिक्षाओं का सम्मान किया होता और उनके आधार पर आर्थिन नियम निर्धारित की होती तो हम इस संकट में ग्रस्त न होते "।
यह बात बिल्कुल सही है कि जब दुनिया का आर्थिक नियम ब्याज पर चलना शुरू हो जाता है तो उसकी तबाही यक़ीनी हो जाती है क्योंकि ब्याज मानव जीवन के लिए एडज़ के समान है जो उसकी देफाई क़ुव्वत को घुन लगा देता है और उसे संकट के गड्ढे में जा गिराता है।
यह संदेश हमें क़ुरआन ने आज से चौदह सौ वर्ष पहले स्पष्ट रूप में दे दिया था " अल्लाह ब्याज को मिटाता है और दान को बढ़ाता है।" (सूरः बक़रा आयत न0 276)
इसी परिणाम को देखते हुए 1970 की दहाई में प्राइवेट सेक्टर में विभिन्न इस्लामी बेंकों की स्थापना हुई। 1980 की दहाई में इरान, सूडान, पाकिस्तान और मलेशिया ने इस्लामी बैंककारी के नवीन नियम को अपनाया। इस समय जद्दा से जकारता तक 50 मुल्कों में 280 सूद फ्री बैंक चल रहे हैं। डेनमार्क, ब्रिटेन, लक्जमबर्ग, स्विट्जरलैंड उनमें एक है। ताजा स्थिति है लंदन का दक्षिणी हिस्सा इस्लामी बैंकों के केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। इस इलाके में बैंकों की संख्या पांच तक पहुंच गई है।
ब्रिटेन में कुल शरई बैंकों की तादाद बाईस है और लंदन स्टॉक एक्सचेंज में इस्लामी बैंकों की हिस्सेदारी दस लाख अरब डॉलर तक आ गई है। जो दुबई के बाद दूसरे नंबर पर है। 1975 में दुबई में पहली इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक की बुनियाद रखी गई थी। 1977 में मिस्र और सूडान में फैसल इस्लामिक बैंक के नाम से पहली बार दो प्राइवेट बैंक खोले गए थे। 2007 तक दुनियाभर में इस्लामी बैंकों का कारोबार 37 प्रतिशत की दर से बढ़कर 729 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। और उनकी आर्थिक स्थिति भी दूसरे बेंकों की तुलना में अच्छी है।
इस्लामी बैंकिंग नियम की सब से मूल विशेषता यह है कि यह ब्याज, धोकाधरी, सट्टेबाज़ी, भ्रष्टाचार से बिल्कुल पाक है। यह नियम किसी इनसान का बनाया हुआ नहीं अपितु अल्लाह का उतारा हुआ नियम है जिसमें फेर बदल की गुंजाइश नहीं और जिसमें सारे इनसानों का हित है।
