रविवार, 30 जनवरी 2011

क्या क़ुरआन मानव रचिच है ? (2)

(3) क़ुरआन की शैली और मुहम्मद सल्ल0 की शैली में अन्तरःमुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों को हदीस कहा जाता है। आपके इन प्रवचनों की शैली और क़ुरआन की शैली दोनों को मिला कर देखें तो दोनों सर्वथा भिन्न देखाई देंगे। कोई भी व्यक्ति जो क़ुरआन और हदीस को पढ़ेगा दो चार वाक्य पढ़ कर ही इस परिणाम पर पहुंच जाएगा कि यह दोनों वाणियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं हो सकतीँ। क्योंकि क़ुरआन का स्वर अत्यन्त मनमोहक है अपितु क़ुरआन की शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। यही कारण था कि जब मक्का वाले मुहम्मद सल्ल0 को क़ुरआन पढ़ते हुए सुनते तो आश्चर्यचकित रह जाते थे।
मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः " ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।"हम भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि वह अरब जिनके अन्दर मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं थी जब क़ुरआनी शिक्षाओं को ले कर उठे तो थोड़े ही दिनों में चीन की सीमाओं से लेकर फ्रांस तक पहुंच गए और क़ुरआन के आधार पर एक ऐसी संस्कृति की स्थापना की जिस से प्रभावित हो कर गाँधी जी को कहना पड़ाः " जब हमारा देश स्वतंत्र होगा तो हम उसमें अबू-बक्र तथा ऊमर जैसी शासन लाएंगे।"
(4) क़ुरआन हर प्रकार के विभेदों से मुक्त हैः
मानव कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए उस से ग़लतियाँ और कोताहियाँ हाती ही रहती हैं। उसका लेखन और भाषण त्रुटियों से सुरक्षित नहीं रह सकता। ईसी लिए क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर का कथन हैः " क्या यह लोग क़रआन में चिंतन मनन नहीं करते, यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो अवश्य उसमें बहुत कुछ मतभेद पाते।" (सूरः 4 आयत 82)परन्तु क़ुरआन हर प्रकार की ग़लतियों आपत्तियों और कमियों से सुरक्षित है। यदि किसी को क़ुरआन में किसी प्रकार की आपत्ति नज़र आ रही हो तो वास्तव में ऐसा क़ुरआन का ज्ञान न होने के कारण होगा जिसके निवारण हेतु उसे क़ुरआन के विद्वानों से सम्पर्क करना चाहिए। क़ुरआन का आदेश हैः
" यह अत्यन्त महान ग्रन्थ है जिसके पास असत्य फटक भी नहीं सकता, न उसके आगे से, न उसके पीछे से, यह है अवतरित किया हुआ हिकमत वाले तथा गुणों वाले अल्लाह की ओर से" ( सूरः49 आयत 41-42)

शनिवार, 29 जनवरी 2011

क्या क़ुरआन मानव रचिच है ? (1)

कुरआन के सम्बन्ध में हमने पिछले पोस्टों में जो तथ्य बयान किए हैं उन पर बिना किसी पक्षपात के एक दृष्टि डालने से ही ज्ञात होता है कि क़ुरआन मानव रचित ग्रन्थ नहीं हो सकता अपितु ऐसी कल्पना इतिहास तथा बुद्धि दोनों के प्रतिकुल है।
डा0 जी डबल्यू लिड्ज़ कहते हैः " प्रायः कहा जाता है कि पवित्र क़ुरआन के लेखक मुहम्मद सल्ल0 हैं और उसमें जो भी बातें हैं तौरात और ईंजील से ली गई हैं, यह ग़लत है, मेरा विश्वास है कि क़ुरआन ईश-वाणी है " ।
प्रिय मित्र ! यदि आप निम्नलिखित तथ्यों पर चिंचन मनन करेंगे तो स्वयं आप क़ुरआन को ईश्वर की वाणी मानने पर विवश होंगे।
(1) क़ुरआन की भाषा शैली:
क़ुरआन का सब से महान चमत्कार यह है कि इसकी शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। वह अरब जिसमें क़ुरआन का अवतरण हुआ था अपने शुद्ध साहित्यिक रसासवादन के लिए अति प्रसिद्ध थे, उनको अपनी भाषा शैली पर बड़ा गर्व था। ऐसे लोगों को क़ुरआन ने चुनौति दी -
" और यदि उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी संदेह में होतो उस जैसी कोई सूरः ले आओ और अल्लाह के हट कर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास है, यदि तुम सच्चे हो"। ( सूरः 2 आयत 23-24)
लेकिन इतिहास साक्षी है कि पूरे अरब उसके समान एक अध्याय तो क्या एक श्लोक भी पेश करने में असमर्थ्य रहे हालाँकि वह मुहम्मद सल्ल0 के विरोद्ध में पूरे साहसी थे और आपत्ति का ओई अवसर खोना नहीं चाहते थे तथा अरबी भाषा पर भी पूरी महारत रखते थे। यदि कुरआन मानव रचना होता तो कुछ लोग अवश्य उसके समान पेश कर सकते थे परन्तु न कर सके।
यह ग्रन्थ आज तक संसार वालों के लिए चुनौति बना हुआ है तथा रहती दुनिया तक बना रहेगा।
(2) उम्मी नबी पर क़ुरआन का अवरणः
यह भी एक सत्य है कि ईश्वर ने अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन के अवतरण के लिए ऐसे संदेष्टा का चयन किया जो न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 के जन्म के पूर्व ही उनके पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की आयु हुई तो माता भी चल बसीं और आठ वर्ष के हुए तो दादा का साया भी सर से उठ गया कारणवश शिक्षा-दिक्षा से वंचित रहे और न ही उन्हें किसी विद्वान की संगति प्राप्त हुई थी आखिर ऐसे व्यक्ति से लिए यह कैसे सम्भव हो सकता था कि वह ऐसी अनुपम साहित्यिक पुस्तुक तैयार कर ले। यह ईश्वर की चाहत थी कि अन्तिम संदेष्टा पढ़े लिखे न हों ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगाए कि वह क़ुरआन को अपनी ओर से बना कर अरबों की आखों में धूल झोंक रहे हैं।
आप अशिक्षित ( उम्मी ) होने के बावजूद लोगों में पवित्रता, सच्चाई और अमानतदारी से प्रसिद्ध थे यहाँ तक कि लोगों ने आपको सादिक़ (सच्चा) और अमीन (अमानतदार) की उपाधि से रखी थी। क्या ऐसा व्यक्ति जो लोगों के बीच सच्चाई और अमानदतारी से प्रसिद्ध हो अपनी बात ईश्वर की ओर सम्बन्धित कर सकता है? यह बात बुद्धिसंगत नहीं हो सकती । ज्ञात यह हुआ कि मुहम्मद सल्ल0 का पूरा ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान था। ( शेष अगले पोस्ट में)

क़ुरआन के व्यवहारिक रूप की सुरक्षा

प्रिय मित्रो ! क़ुरआन का एक बहुत बड़ा चमत्कार यह है कि इसके शब्द और अर्थ की सुरक्षा के साथ साथ इसके व्यावहारिक रूप की सुरक्षा का भी पूरा पूरा प्रबन्ध किया गया। वह इस प्रकार कि क़ुरआन मुहम्मद साहब पर जिस शब्द में अवतरित होता आप सल्ल0 उसका अर्थ अपने साथियों को प्रकाशना द्वारा समझाते, फिर समझाने ही पर बस नहीं करते अपितु उसे व्यवहारिक रूप देकर बताते भी थे जिसे आज की भाषा में थ्यूरी (Theory) के साथ साथ परेक्टिकल (Practical) कहा जाता है।
क़ुरआन जिस वातावरण में अवतरित हुआ, जिस सन्दर्भ में आयतें उतरीं उस संदर्भ को भी सुरक्षित कर दिया गया। यहाँ तक कि अवतरण के संदर्भ पर विशेष रूप में पुस्तकें लिखी गई हैं जिस से आयतों के संदर्भ का सरलतापूर्वक ज्ञान होता है। इस विषय को क़ुरआन के विशेषज्ञों ने " अस्बाबे नुज़ूल " ( अवतरण के कारण) का नाम दिया है। अर्थात् आयत के अवतरित होने का कारण और संदर्भ।
फिर जिस संदेष्टा अर्थात् मुहम्मद सल्ल0 पर क़ुरआन का अवतरण हुआ उनकी जीवनी को पूर्ण रूप में सुरक्षित कर दिया गया क्योंकि मुहम्मद सल्ल0 ने क़ुरआनी आदेशों का पालन कर के उनके बीच अपना आदर्श छोड़ा था ताकि कल आकर कोई ऐसा न कहे कि मैं क़ुरआनी आदेशों को अपने व्यवहारिक जीवन में जगह देने की क्षमता नहीं रखता।
इसी लिए जब एक बार मुहम्मद सल्ल0 की पत्नी हज़रत आइशा रज़ि0 से पूछा गया कि मुहम्मद सल्ल0 का आचार व्यवहार कैसा था ? तो आपने उत्तर दिया : क्या तुमने क़ुरआन नहीं पढ़ा। कहाँ: हाँ, तो उन्होंने फरमाया: "आपका आचार व्यवहार क़ुरआन था।" अर्थात् आप क़ुरआन का चलता फिरता आदर्श थे।
जहाँ कोई आदेश आया सर्वप्रथम उसे व्यवहारिक रूप दिया। आज भी कोई व्यक्ति मुहम्मद सल्ल0 की जीवनी को खंगाल कर देश ले उसे आप सल्ल0 क़ुरआन का पूर्ण व्यवहारिक आदर्श देखाई देंगे जिस से वह समझ सकता है कि क़ुरआन एक Theory है और मुहम्मद सल्ल0 की जीवनी Practical।
मुहम्मद सल्ल0 ने बाल्यावस्था से ले कर अन्तिम सांस तक जो कुछ किया और बोला उसे उनके साथियों ने कंठस्थ किया और कुछ लोगों ने उसे लिखा फिर बाद की पीढियों तक उसे पहुंचाया, जिनकी संख्या लाखों तक पहुंचती है फिर सुनने वालों ने दूसरों को सुनाया यहाँ तक कि उसे लिपिबद्ध कर दिया गया। जैसे फ़लाँ ने फलाँ से कहा और फलाँ ने फलाँ से............. कहा कि मैंने अपने कानों से मुहम्मद सल्ल0 को यह कहते हुए सुना है।
जिन व्यक्तियों द्वारा यह खबरें दूसरों तक पहुंचती हैं उनको रावी कहते हैं। इस्लामी विद्वानों ने उन रावियों की पूरी जीवनी लिखी है। यदि उन में से कोई कभी सामान्य लोगों के साथ झूठ बोलते पाया गया अथवा उसकी स्मरण-शक्ति कम्ज़ोर थी तो उसके माध्यम से बयान किए गए प्रवचनों को रद्द कर दिया गया। ताकि मुहम्मद सल्ल0 का प्रवचन और उनकी जीवनी हर प्रकार से संदेहों से पवित्र रहे।
इस प्रकार देखा जाए तो आज मानव इतिहास में मुहम्मद सल्ल0 ही वह महान व्यक्ति हैं जिनके जीवन का एक एक वाक्य - बाल्यावस्था से लेकर मृत्यु तक- हम तक सर्वथा सुरक्षित रूप में पहुंचा है।
आज इस धरती पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक ग्रन्थ पाए जाते हैं जो सर्वथा प्रमाणित नहीं , चे जाए कि वह व्यवहारिक रूप में सुरक्षित हों। यह मात्र क़ुरआन का चमत्कार है कि एक ओर क़ुरआन थ्यूरी (Theory) है तो दूसरी ओर मुहम्मद साहब की जीवनी उसका परेक्टिकल (Practical) रूप।

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

कुरआन की अन्य प्रमुख विशेषताएं (1)


प्रिय दोस्तो ! हमने पिछले पोस्टों में क़ुरआन की कुछ विशेषताओं का अल्लेख किया है वास्तव में क़ुरआन मानव के लिए अवतरित हुआ है जिसके संदेश से परिचित होना हर व्यक्ति का काम है। इसी उद्देश्य के अन्तर्गत निम्न में हम अन्य कुछ विशेषताएं प्रस्तुत कर रहे हैं।
क़ुरआन की शिक्षाएं हर युग के लिए:
क़ुरआन एक ऐसा ग्रन्थ है जिसकी शिक्षाएं हर युग के लोगों के सिए समान रूप में व्यवहारिक आदर्श हैं इसी लिए वह अपने लाए हुए धर्म को "व्यवहारिक धर्म" ( सूरः 30 मंत्र 30 ) के नाम से मानव के सामने प्रस्तुत करता है। एक दूसरे स्थान पर क़ुरआन में हैः " वास्तव में यह क़ुरआन वह मार्ग दिखाता है जो सब से सीधा है" (सूरः 17 मंत्र 9 ) -
आज के इस आधुनिक युग में यदि कोई नियम पूर्ण रूप में लाभदायक हो सकता है तो वह क़ुरआनी नियम है। क़ुरआन नें शराब पर प्रतिबन्ध लगाया, महिलाओं को पर्दा करने का आदेश दिया, ब्याज को अवैध ठहराया, व्यभिचार को समाज के लिए घृणित कार्य बताया- तात्पर्य यह कि हर अच्छे काम का आदेश दिया और हर बुरे काम से रोका। विदित है कि इन्हीं बुराइयों के फैलने के कारण हमारा समाज खराब होता जा रहा है। इन बुराइयों का खंडन करने की आवश्यकता हर युग में रही है और रहेगी।
जीवित भाषा:
क़ुरआन जिस भाषा में उतारा वह एक जीवित भाषा है। मुस्लिम देशों के अतिरिक्त संसार के सभी देशों में न केवल इस भाषा का प्रचलन है अपितु यह जीवित और शिक्षा का माध्यम है और यह विशेषता मात्र क़ुरआन की है। बाईबल तथा वेद आदि की भाषा अब संसार के किसी क्षेत्र अथवा भाग में प्रयोग नही होती।
सब से अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ:
क़ुरआन संसार में सब से अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ है और लाखों की संख्या में लोगों ने उसे कंठस्थ कर रखा है। छोटे छोटे बच्चे दो चार वर्ष में क़ुरआन को कंठस्थ कर लेते हैं। मुसलमानों में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो क़ुरआन पढ़ना न जानते हों जब कि संस्कृत भाषा में ग्रन्थ पढने वाले आज दाल में नमक के समान हैं।
संरक्षक ग्रन्थ:
पवित्र क़ुरआन के अनुसार ईश्वर का भेजा हुआ धर्म शुरू से एक ही रहा है। परन्तु लोगों ने उसमें अपने स्वार्थ के लिए परिवर्तन कर दिया। इस लिए आज अन्य धर्म ग्रन्थों की वास्तविक शिक्षाएं भी पवित्र ग्रन्थ से ही मालूम हो सकती हैं। क़ुरआन में है " हे पैगम्बर! हमने सच्चाई के साथ तुम पर क़ुरआन को अवतरित किया है जो अपने से पूर्व ग्रन्थों की पुष्टि करने वाला है तथा उनका रक्षक भी है। " ( सूरः 5 आयत 48)
अर्थात पिछले ग्रन्थों के मूल संदेश पर मिलावटों और परिवर्तनों के जो पर्दे डाल दिए गए हैं उन्हें क़ुरआन हटा देता है और उनकी मूल शिक्षाओं का निर्धारण कर देता है।
अन्तिम ग्रन्थ :
ईश्वर ने संदेष्टाओं का क्रम मुहम्मद सल्ल0 पर बन्द किया तो क़ुरआन को भी फाइनल अथार्टी ( Final Authority) के रूप में अवतरित किया। क़ुरआन अपने लाने वाले संदेष्टा के सम्बन्ध में कहता है: " बल्कि व ईश्वर के संदेष्टा और नबियों के समापक ( अन्तिम संदेष्टा ) हैं।'' ( सूरः 33 आयत 40 )