रंग में क्यों रंग देते हैं।" इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म एक व्यक्तिगत मआमला है, इसे सार्वजनिक रूप नहीं देना चाहिए, परन्तु मैं एक मुस्लिम की हैसियत से इस बात से सहमत नहीं, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं। और धर्म एक इनसान की प्रकृति में शामिल है। हम सब का पैदा करने वाला ईश्वर जो एक है जिसके समान कोई नहीं, न उसका कोई भागीदार है, न उसे मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होने की आवश्यकता पड़ती है। हाँ ! यह सत्य है कि उसने मानव की रचना करने के बाद उसे यूं ही छोड़ नहीं दिया कि जैसे चाहे अपनी इच्छानुसार जीवन बिताए अपितु मानव में से ही क्रान्तिकारी मनुष्यों को चयन कर के उनका मार्गदर्शन किया, जिनको अवतार अथवा संदेष्टा कहते हैं, वह हर युग और हर देश में आते रहे, जिनकी संख्या एक लाख तक पहुंचती है। उनको अपने अपने देश तथा समाज हेतु भेजा जाता था।
परन्तु जब सातवीं शताब्दि ईसवी में यातायात के साधन ठीक हो गए। तथा एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क होने लगा तो सम्पूर्ण संसार हेतु अन्तिम अवतार भेजे गए जिन पर क़ुरआन का अवतरण हुआ जो सारे मानव को सम्बोधित करता हैं। उन्हें हम मुहम्मद कहते हैं। कुरआन लोगों को विभिन्न जातियों में विभाजित नहीं करता अपितु एकत्र करता है। उसका सार मात्र एक ईश्वर की पूजा और मानव भाई चारा है। क़ुरआन के अनुसार सारे मानव की उत्पत्ति एक ही मानव आदम औऱ हव्वा से हुई है और उन सब का बनाने वाला भी एक ही है। इस प्रकार इस्लाम मानव का धर्म है परन्तु खेद की बात यह है कि अधिक लोग अपने ही परम धर्म से वंचित हो कर इधर उधर भटक रहे हैं। आज ईश्वर का नाम तो सब लेते हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं।
यह भी सत्य है कि हम सब एक दिन अपने पैदा करने वाले के पास पहुँचने वाले और इस जीवन का लेखा जोखा देने वाले हैं, जिसके आधार पर ही हमारे स्वर्ग अथवा नरक का निर्णय किया जाएगा।
यदि हमें इन बातों का ज्ञान है जो सब को सत्य की ओर अग्रसर कर सकती हैं, और हम इन्हें छुपाएं अथवा बयान करने से संकोच करें तो मैं अपने भाईयों का शुभ-चिंतक नहीं बन सकता।

