बुधवार, 25 नवंबर 2009

हज्ज और क़ुर्बानी के नायक

अभी हज्ज और क़ुर्बानी का त्योहार आ रहा है। हज्ज और क़ुर्बानी का इतिहास क्या है?मुसलमान हज़्ज और क़ुर्बानी क्यों करते हैं। और हज्ज और क़ुर्बानी का वास्तविक अभिप्राय क्या है? इन सब को समझने के लिए सब से पहले हमें हज्ज और कुर्बानी के नायक को समझना होगा तो आइए! सब से पहले हम हज्ज और कुर्बानी के नायक को जानते हैं?
हज्ज और क़ुर्बानी के नायकः ईब्राहीम (ईश्वर की उन पर शान्ति हो)आज से अनुमानतः साढ़े चार हज़ार वर्ष पूर्व इब्राहीम अलैहिस्सलाम (ईश्वर की उन पर शान्ति हो) इराक़ के शहर "बाबुल" के एक सम्मानित परिवार में पैदा हुए। आप संदेष्टा "नूह" के बेटे "साम" की संतान में से थे। अतिथिगन थे इसी लिए उनकी उपाधि "अबू-ज़ैफान" (अतिथियों वाला) पड़ गई थी। जिस वातावरण में पैदा हुए क़ुरआन ने उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की ओर संकेत किया है जिस से ज्ञात होता है कि उस समय लोग तीन भागों में बटे हुए थे। (1) कुछ लोग चंद्रमा एंव सूर्य की पूजा करते थे। (2) कुछ लोग पत्थर और कंकड़ी से बनाई गई मुर्तियों के सामने झुकते थे। (3) जबकि कुछ लोग उस समय के शासक "नमरूद" की पूजा करते थे।
ऐसे ही अंधकार वातावरण में एक प्रोहित "आज़र" के घर ईब्राहीम अलै0 की पैदाईश हुई। उनके पिता "आज़र" लोहार थे, वह लकड़ी की मूर्ति बनाते, उन्हें बेचते और लोगों को उनकी पूजा की ओर आमंत्रित किया करते थे।
समय गुज़रता रहा। इब्राहीम अलै0 बाल्यावस्था ही से मूर्तियों को अप्रिय दृष्टि से देखते, उनकी आलोचना करते और सोचते रहते कि यह मूर्तियाँ न खा सकती हैं, न पी सकती हैं, न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं तो आखिर लोग इनकी पूजा क्यों करते हैं? इन से लाभ की आशा एवं हानि का भय क्यों रखते हैं? यह कैसे लोग हैं जो अपने हाथों से मूर्ति बनाते हैं और फिर कहते हैं कि यह हमारे पूज्य हैं।
जब ईश्वर ने इब्राहीम अलै0 को अपने समुदाय की ओर संदेष्टा बनाकर भेजा तो सब से पहले आपने अपने पिता को समझाया कि "पिता जी! आप क्यों उन चीज़ों की उपासना करते हैं, जो न सुनती हैं, न देखती हैं, और न आपका कोई काम बना सकती हैं? पिता जी! मेरे पास एक ऐसा ज्ञान आया है जो आपके पास नहीं आया, आप मेरी बात मानें मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊंगा। पिता जी! आप शैतान की पूजा न करें शैतान तो करुणामय ईश्वर का अवज्ञाकारी है। पिता जी! मुझे डर है कि कहीं आप करुणामय ईश्वर के प्रकोप में ग्रस्त न हो जाएं।" (सूरः19 आयत 42-45)
परन्तु पिता ने एक न सुनी और झटकते हुए कहा "हे इब्राहीम! यदि तू अपने इस काम से न रुका तो मैं तुझे पत्थर से मार मार कर बर्बाद कर दूंगा.....बस यही कहता हूं कि तू हमेशा के लिए मुझ से अलग हो जा"। (जारी )

2 टिप्‍पणियां:

जीवन का उद्देश ने कहा…

salamun alaikum
bahut khub, aap ki sudar lakh se hum log bahut labh utha rahe hai, Allah aap ke giyaan ko adhik se adhiktam kare, esitarah likhte rahiye

talib ने कहा…

MASHA ALLAH BAHUT KHOOB! ALLAH KI RAHMAT HO AAP PAR AAMIN!