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शनिवार, 6 सितंबर 2014

इस्लाम धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है

एक सज्जन ने फेसबुक पर लिखा है कि " बुरा ना मानें पर मैंने सुना है कि गैर मुस्लिम को मारो सताओ कुछ भी करो पर उन्हें इस्लाम कबूल करवाओ। जिसे जिहाद का नाम दिया गया है और जो भी इस काम करेगा उसे जन्नत प्राप्त होगी। क्या ये बात सही है ?"
सर्व प्रथम हम आपके स्वभाव की शुद्धता का सम्मान करते हैं कि आपने पूछने से पूर्व " बुरा ना मानें" का शब्द प्रयोग किया, यह आपकी सज्जनता और हृदय की सफाई की दलील है। रही बात आपके प्रश्न की तो यह बात 100 प्रतिशत ग़लत है। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक मानवता को एक माता पिता की संतान और भाई भाई होने की कल्पना देता है। (क़ुरआन 49: 13) दूसरों के भगवानों को बुरा भला कहने से रोकता है। (क़ुरआन 6: 108) इस्लाम ज़बरदस्ती किसी पर थोपने को वर्जित ठहराता है (क़ुरआन 2: 256) और यदि किसी पर थोपा भी गया तो वह इस्लाम की दृष्टि में मुसलमान नहीं हो सकता जब तक अपने दिल से उसे स्वीकार न कर ले। इस लिए लोभ जिहाद की जो बात कही जाती है वह बिल्कुल वेबुनियाद है।"लो जिहाद" की कल्पना मुस्लिम समाज में अब तक हमने कभी नहीं पाई, कुछ लड़के और लड़कियां इस्लाम की सत्यता को जानने के बाद इस्लाम स्वीकार करते हैं तो विदित है कि वह अपनी आस्थानुसार जीवन साथी का चयन करेंगे। इस लिए "लो जिहाद" का नाम लेकर राजनीति करने वालों से हम पूछना चाहते हैं कि जिस हिन्दु परिवार में मुस्लिम लड़कियां हिन्दु बन कर जी रही हैं क्या आप उसको "प्रेम युद्ध" का नाम देंगे ? 

फिर इस्लाम की दृष्टि में किसी एक इनसान की हत्या करना जिसने किसी की जान न ली हो न धरती में फसाद मचाया हो सारी मानवता की हत्या करने के समान है। (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो) (क़ुरआन 5: 32) और इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद जी ने कहाः जिसने किसी एक गैरमुस्लिम की हत्या कर दी जो इस्लामी देश में शान्ति के साथ रहता था तो वह महाप्रलय के दिन स्वर्ग की सुगन्ध भी न पा सकेगा। (सही बुख़ारी 3166) इस से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस्लाम मानवता की रक्षा पर कितान बल देता है। 
और इस्लाम में जिहाद की अनुमति वास्तव में फसाद और अत्याचार को ख़त्म करने के लिए दी गई है जिस से समाज में शान्ति पैदा होती और बुराइयां समाप्त होती हैं।(क़ुरआन 22: 39)
लेकिन बुरा हो शत्रुता तथा गंदी राजनिती का कि कुछ लोग इस्लाम दुश्मनी में जो चाहते हैं अपनी ज़बान से बक देते हैं। मैं चैलेंज के साथ कहता हूं कि जो व्यक्ति भी इस्लाम का विशाल दृदय से अध्ययन करेगा उसकी सत्यता, उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किए बिना नहीं रह सकता।

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

यदि अल्लाह ने हमें बनाया तो अल्लाह को किसने बनाया ?

यह एक व्यर्थ प्रश्न है। सर्वप्रथम हम यह सवाल करते हुए मान रहे हैं कि अल्लाह  है और यदि किसी को इस विषय पर विश्वास नहीं है तो स्वयं उसे अपने वजूद पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्यों कि उसका वजूद यह पता देता है कि उसका कोई बनाने वाला है, हम बिना बनाने वाले के नहीं बन सकते और हमने स्वंय को नहीं बनाया तो इस से सिद्ध यह हुआ कि हमारा कोई बनाने वाला अवश्य है।

 अल्लाह का वजूद मान लेने के बाद तुरंत भगवान की विशेषता की ओर हमारा ज़ेहन जाता है,  अल्लाह  की विशेषता यह है कि वह सब का पैदा करने वाला है उसका कोई पैदा करने वाला नहीं, वह स्वयं से है और अपने वजूद के लिए किसी का ज़रूरतमंद नहीं। जब यह उसकी मूल विशेषता ठहरी कि कोई उसका पैदा करने वाला नहीं तो यह प्रश्न अपनी जगह पर बिल्कुल व्यर्थ है कि  अल्लाह को किसने पैदा किया।
यदि हम थोड़ी देर के लिए मान लें कि अल्लाह को किसी ने पैदा किया है तो इस से हम ऐसी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि हमें वापस आ कर फ़िर से यह मानना पड़ेगा कि  अल्लाह को किसी ने पैदा नहीं किया।
आप विचार कीजिए कि दुनिया में पैदाइश का काम जारी है, और हर सृष्टि के लिए सृष्टा की ज़रूरत है, अगर हम मानें कि हर सृष्टा के लिए एक सृष्टा की ज़रूरत है अर्थात् हर  अल्लाह के लिए दूसरे  अल्लाह की ज़रूरत है और इस सिलसिला की कोई अन्तिम कड़ी नहीं है। तो मानना पड़ेगा कि पहले अल्लाह का वजूद नहीं है।

क्यों कि हमने यह माना है कि हर भगवान के लिए दूसरे भगवान की ज़रूरत है और फिर दूसरे के लिए तीसरे, तीसरे के लिए चौथे और चौथे के लिए पांचवें भगवान की ज़रूरत है तात्पर्य यह कि यह क्रम टूटने वाला नहीं है इसका कोई अन्त नहीं है। यहां पर यही माना जा सकता है कि एक भगवान के बाद दूसरा भगवान और फिर तीसरा और फ़िर चौथा और यह सिलसिला अवश्य कहीं जा कर समाप्त होता है, और वही अन्तिम कड़ी भगवान है जो स्वयं सृष्टा है और उसे किसी ने पैदा न किया है। 

शुक्रवार, 10 मई 2013

वन्दे मातरम् ?

वन्दे मातरम् बंगला भाषा के प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी की उपन्यास 'आनंदमठ' मैं शामिल है। मूल रूप में यह उपन्यास इस्लाम शत्रुता पर आधारित है और उसमें अंग्रेज़ों को अपना सुरक्षक और मसीहा सिद्ध किया गया है। वन्दे मातरम् उपन्यास का एक भाग है। उपन्यास में विभिन्न पाट यह गीत "दुर्गा" के समक्ष गाते हैं जो हिन्दू भाईयों में माँ का स्थान रखती है और इस गीत में भारत को "दुर्गा माँ" सिद्ध किया गया है। यही कारण है कि स्वतंत्रता से पूर्व ही यह विवादस्पद बन गया था, वन्दे मातरम् भी उसी नाविल का एक भाग है औऱ उसमें भारत को दुर्गा के समान सिद्ध किया गया है। इसी लिए जवाहर लाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस और डा0 लोहिया जैसे महान नेताओं ने इस गीत का विरोद्ध किया, और जब भारत के राष्ट्रीय गीत के चयन की बात आई तो एक समूह की कोशिश के बावजूद इस गीत को राष्ट्रीय गीत नहीं बनाया गया बल्कि बंगला कवि रविंद्रनाथ टैगोर के गीत को भारत का राष्ट्रीय गीत बनाया गया जो देश-भक्ति की भावनाओं से परिपूर्ण है, जिसमें देश की प्रशंसा की गई है और किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई गई है।

यदि एक मुस्लिम वन्दे मातरम् के अनुवाद पर ही चिंतन मनन कर ले तो उसे पता चल जाएगा कि यह इस्लाम की मूल आस्था एकेश्वरवाद ही को गिरा देता है। तो लीजिए वन्दे मातरम् का प्रमाणित उर्दू अनुवाद प्रस्तुत हैः

तेरी इबादत करता हूं ऐ मेरी अच्छे पानी, अच्छे फल, भीनी भीनी खुश्क जुनूबी हवाओं और शादाब खेतों वाली मेरी माँ /हसीन चाँदनी से रौशन रात वाली, शगुफ़्ता फूलों वाली, गंजान दरख्तों वाली/ मीठी हँसी, मीठी ज़बान वाली, सुख देने वाली, बर्कत देने वाली माँ/ मैं तेरी इबादत करता हूं ऐ मेरी माँ / तीस करोड़ लोगों की पुरजोश आवाज़ें, साठ करोड़ बाज़ुओं में समेटने वाली तलवारें / क्या इतनी ताक़त के बाद भी तू कमज़ोर है ऐ मेरी माँ/ तू ही मेरे बाज़ुओं की क़ुव्वत है, मैं तेरे क़दम चूमता हूं ऐ मेरी माँ/ तू ही मेरा इल्म है, तू ही मेरा धर्म है, तू ही मेरा बातिन है, तू ही मेरा मक़्सद है / तू ही जिस्म की रूह है, तू ही बाज़ुओं की ताक़त है, तू ही दिलों की हक़ीक़त है / तेरी ही महबूब मुर्ति मन्दिर में है/ तू ही दुर्गा, दस मुसल्लह हाथों वाली, तू ही कम्ला है, तू ही कंवल के फूलों की बहार है / तू ही पानी है, तू ही इल्म देने वाली है / मैं तेरा ग़ुलाम हूँ, गुलाम का ग़ुलाम हूँ/ गुलाम के ग़ुलाम का ग़ुलाम हूँ/ अच्छे फलों वाली मेरी माँ, मैं तेरा बन्दा हूं, लहलहाते खेतों वाली मुक़द्दस मोहनी, आरास्ता पैरास्ता बड़ी क़ुदरत वाली क़ाएम व दाएम माँ/ मैं तेरा बन्दा हूँ ऐ मेरी माँ मैं तेरा ग़ुलाम हूँ। ( उर्दू अनुवाद, प्रकाशित: आल इंडिया दीनी,तालीमी कोंसल लखनऊ)

वन्दे मातरम् वह गीत है जिसे राष्ट्रीय गीत के रूप में पेश किया जा रहा है। गीत के शब्दों से सर्वथा विदित है कि यह एक धार्मिक गीत तो हो सकता है राष्ट्रीय गीत नहीं हो सकता। इसमें मात्र-भूमि को दुर्गा माँ मान कर उसे प्रत्येक उपकारों का स्रोत सिद्ध किया गया है। ज्ञान, शक्ति, ताक़त हर विशेषता उसी के साथ सम्बन्धित की गई है और पढ़ने वाला उसके क़दमों में वंदना के लिए झुका जाता है बल्कि वह प्रत्यक्ष रूप में इस बात को स्वीकार करता है कि मैं तेरी वंदना करता हूँ।

जिस गीत में यह सब कुछ कहा गया हो मुसलमान उसे कैसे पढ़ सकते हैं। कोई भी मुस्लिम इसे भलीभांति जान लेने के बाद इसका समर्थन नहीं कर सकता। जिन को पता नहीं है अथवा उन्हों ने मात्र सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लिया है वही इस का समर्थन कर सकते हैं। क्योंकि यह तो एक मुस्लिम की मूल आस्था के विरोद्ध है। मुसलमान उपने देश को प्रिय समझता है परन्तु पुज्यनीय कदापि नहीं समझ सकता।

इस गीत में देश की मिट्टी के लिए ग्यारह ऐसी विशेषताएं सिद्ध की गई हैं जो इस्लामी दृष्टीकोण से अल्लाह के अतिरिक्त अन्य के लिए सिद्ध नहीं की जा सकतीं। वह विशेषताएं यह हैं (1) सुख देने वाली (2) बर्कत देने वाली (3) तू ही हमारे बाज़ुओं की शक्ति है (4) तू ही मेरा ज्ञान है (5) तू ही मेरा परोक्ष है (6) तू ही मेरा उद्देश्य है (7) तू ही शरीर के अंदर की जान है (8) दिलों के अंदर तेरी ही वास्तविकता है (9) बड़ी शक्ति वाली (10) क़ाएम व दाएम (11) मुक़द्दस

इस गीत में बार बार वतन की मिट्टी का दास होने को स्वीकार किया गया है जबकि एक मुस्लिम मात्र अल्लाह का दास हो सकता है। इसी लिए मुसलमानों के लिए अब्दुन्नबी (नबी का दास),अब्दुर्रसूल(रसूल का दास) और अब्दुल मसीह(मसीह का दास) नाम रखना सही नहीं है। इस गीत में मन्दिरों की प्रत्येक मुर्तियों को खाके वतन का स्रोत कहा गया है। उसी प्रकार इस गीत में खाके वतन को दुर्गा देवी और कमला देवी समझा गया है। इस गीत में वतन की मिट्टी ही को धर्म कहा गया है। इस गीत में वतन की मिट्टी के सामने वन्दना की जाती है अर्थात् सर झुका कर, हाथ जोड़ कर सलाम किया जाता है। यह सब इस्लामी आस्था के सर्वथा विरोद्ध है। इसलिए मुसलमान को इस के लिए विवश न किया जाए, इसे समझने की कोशिश की जाए।

वन्देमातरम् को आधार बनाकर मुसलमानों के देश प्रेम पर शक करना बिल्कुल ग़लत है। इतिहास उठा कर देख लो किस प्रकार मुसलमानों ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जाएं गंवाइ हैं। हम भारत की मिट्टी से टूट कर प्रेम करते हैं। बल्कि देश से प्रेम करने की शिक्षा हमें स्वयं इस्लाम देता है। क्योंकि देश से प्रेम स्वाभाविक होता है और इस्लाम प्राकृतिक धर्म है इसी लिए इस्लाम ने इस पर प्रतिबंध नहीं लगाई। तात्पर्य यह कि हम अपने देश को टूट कर चाहते हैं उसके लिए हम अपनी जान भी दे सकते हैं जैसा कि हमारे पूर्जवों ने दिया भी है परन्तु जिस सृष्टा ने हमारी रचना की है, जिसने हम पर ना ना प्राकार का उपकार किया है, जो इस धरती को चला रहा है, जिसके उपकारों से एक सिकंड के लिए भी विमुख नहीं हो सकते, जो यधपि देखाई नहीं देता परन्तु उसके वजूद की निशानियाँ सम्पूर्ण संसार में फैली हुई हैं, जो अकेला है, जिसके पास माता पिता और सन्तान नहीं, जिसको किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती और जिसका कोई भागीदार नहीं। भाइयो! वह ईश्वर ( अल्लाह ) सारे संसार का ईश्वर है, मात्र मुसलमानों का नहीं, उसने हमें इस बात की कदापि अनुमति नहीं दी कि हम उसकी पूजा में किसी अन्य को भागीदार ठहराएं।

ईश्वर की पूजा में उसका किसी को भागीदार ठहराना मात्र इस्लाम में वर्जित नहीं बल्कि हिन्दू धर्म में भी वर्जित है इसी लिए जब डा0 ज़ाकिर नाइक से एक सभा में पूछा गया कि वन्दे मातरम् मुसलमान क्यों नहीं पढ़ते ? तो आपने उत्तर देते हुए कहा था कि " वन्दे मातरम् मात्र मुसलमानों के धर्म के विरोद्ध नहीं है अपितु यह हिन्दू धर्म के भी विरोद्ध है, हिन्दुओं को भी चाहिए कि वह वन्दे मातरम् न पढ़ें क्योंकि हिन्दू धर्म में भी एकेश्वरवाद की शिक्षा है और धरती पूजा से रोका गया है लेकिन इस गीत में धरती की पूजा करने की शिक्षा दी गई है।" उन्हों ने कहा कि देश अल्लाह तआला से महान नहीं हो सकता, चाहे वह सऊदी अरब हो अथवा पाकिस्तान, किसी भी देश के लोगों को यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह अपने देश की पूजा करें। इस लिए मुसलमान ऐसा नहीं कर सकता है"। उन्होंने कहा कि मुसलमान देश से प्रेम करता है लेकिन उसकी पूजा नहीं करता।"

यदि हिन्दू भाई अपने धर्म की शिक्षाओं का पालन न कर के वन्दे मातरम् गाते हैं तो गाएं, हमें उस पर कोई आपत्ति नहीं परन्तु मसलमानों को इसके लिए विवश न किया जाए क्योंकि यह मुसलमानों की मूल आस्था के विरोद्ध है जिस पर किसी प्रकार का विवाद नहीं है। जो लोग इसका समर्थन करते हैं उनको इसका सही ज्ञान नहीं है। भारत विभिन्न धर्मों का सुंदर स्तवक है उसकी पहचान ही इस चीज़ में है कि इस देश में हर धर्म के लोगों को पूरी स्वतंत्रता के साथ अपनी आस्थाओं के अनुसार जीवन बिताने का अवसर प्रदान किया गया है इस लिए मुसलमानों से अपनी पहचान खोने और अपना धर्म त्याग करने का मुतालबा न किया जाए।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

पंडित महेन्द्रपाल आर्य के प्रश्नों के उत्तर



بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान हैं
प्रिय मित्रो, कुछ समय से इन्टरनेट पर पंडित महेंद्रपाल आर्य के 15 प्रश्नों की अधिक चर्चा थी। आर्य समाज की विचारधारा के लोग इस प्रश्नपत्र को प्रचारित कर रहे हैं, और इस प्रश्नपत्र के उत्तर की मांग कर रहे हैं। जब हमने इन प्रश्नों का अध्यन किया तो पता चला कि अधिकतर प्रश्न स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 14 और बाबू धर्मपाल आर्य की पुस्तक 'तरके इस्लाम' की ही नक़ल हैं। बाबु धर्मपाल ने भी पंडित जी की तरह इस्लाम को छोड़ कर आर्य समाज को अपनाया था। लेकिन बाद में मुस्लिम विद्वानों के उत्तर से संतुष्ट हो कर उन्हों ने फिर से इस्लाम स्वीकार कर लिया और अपना नाम गाजी महमूद रखा। प्रश्नपत्र के आरम्भ में पंडित महेंद्रपाल ने लिखा है-
इस्लाम जगत के विद्वानों से कतिपय प्रश्न
सही जवाब मिलने पर इस्लाम स्वीकार
हालांकि, सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 14 का इस्लाम के विद्वानों ने पहले ही विस्तृत उत्तर दे दिया है, और हम भी अपनी वेबसाइट पर नए तथ्यों के साथ उसका उत्तर दे रहे हैं [क्लिक करें]। इस के बावजूद हम पंडित जी के प्रश्नों के उत्तर देने जा रहे हैं ताकि वह यह न कहें कि मुसलमान इनके उत्तर नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त पंडित जी की घोषणा में हमें विरोध दिख रहा है। प्रश्नपत्र के आरम्भ में वह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि यदि उनके प्रश्नों के सही उत्तर मिलें गे तो वह इस्लाम स्वीकार करें गे। लेकिन प्रश्नपत्र के अंत में वह कहते हैं, "सभी प्रश्नों का सही जवाब मिलने पर इस्लाम को स्वीकार करने को विचार किया जा सकता है."
यदि सही उत्तर मिल जाएँ तो फिर विचार क्या करना है? सीधे स्वीकार ही करलें। मैं आशा करता हूँ कि महेन्द्रपाल जी इस उत्तर से संतुष्ट हो कर इस्लाम स्वीकार करें गे.

बुधवार, 13 मार्च 2013

समाज में अमीरी और गरीबी क्यों ?


अल्लाह ने रोज़ी का वितरण अपने हाथ में रखा हैकुछ लोगों को अधिक से अधिक दिया तो कुछ लोगों को कम से कम, हर युग में और हर समाज में मालदारा और गरीब दोनों का वजूद रहा हैसवाल यह है कि आखिर अल्लाह ने अमीरी और गरीबी की कल्पना क्यों रखी
इसका उत्तर यह है कि ऐसा अल्लाह ने बहुत बड़ी तत्वदर्शिता के अंतर्गत किया।  ताकि एक वर्ग दूसरे वर्ग के काम आ सकेप्रत्येक की आवश्यकताएं एक दूसरे से पूरी होती रहें। अल्लाह ने फरमायाः 
"और एक को दूसरे पर प्रधानता प्रदान किया ताकि तुम्हें आज़माए उन चीज़ों में जो तुम को दी है. (सूरः अनआन 165) 
 मान लें कि यदि सभी लोग मालदार हो जाते तो लोगों का जीवन बिताना कठिन होता, एक का काम दूसरे से हासिल नहीं हो सकता थाऔर हर एक दूसरे पर आगे बढ़ने की कोशिश करता इस प्रकार देश और समाज का विनाश होता. जबकि लोगों के स्तर में अंतर होने के कारण अल्लाह ने जिसे कम दिया है उसे कल महाप्रलय के दिन यदि वह ईमान वाला रहा तो वहां की नेमतों से मालामाल करने का वादा किया है। 
उसी प्रकार निर्धनों को कुछ ऐसी हार्दिक शान्ति प्रदान की है जिस से मालदारों का दामन खाली है।  इसके साथ साथ अल्लाह ने उनके प्रति लोगों के मन में दया-भावशुभचिंतन, सहानुभूति की भावना पैदा की, और मानव समाज का अंग सिद्ध किया ताकि धनवान उनका ख्याल करें, यही नहीं अपितु मालदारों को गरीबों पर खर्च करने का आदेश दियाऔर उनके मालों में गरीबों का अधिकार ठहराया। अल्लाह तआला ने फरमायाः 
अल्लाह के माल में से तुम उन्हें (निर्धनों को) दो जो उसने तुम्हें दिया है। (कुरआनः सूरः नूरः 33) 
पता यह चला कि इंसान के पास जो कुछ है उसका अपना नहीं है बल्कि अल्लाह का दिया हुआ हैइस लिए यदि मनुष्य कुछ पैसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करता है तो उसे इस पर गर्व का कोई अधिकार नहीं है।
यह है अल्लाह की वह हिकमत जिस से हमें समाज में निर्धनों के वजूद के प्रति संतुष्टी प्राप्त होती है परन्तु यह कहना कि वह हीन अथवा तुच्छ हैं या उनके पापों का परिणाम है, या उनको किसी विशेष जाकि की सेवा हेतु पैदा किया गया है, बुद्धिसंगत बात नहीं लगती। 
आज भारतीय समाज में यही विचार फैलने के कारण कुछ वर्ग पशुओं के समान जीवन बिता रहे हैं। उनको कोई अधिकार प्राप्त नहीं है और स्वयं उन्हों ने भी इस प्रथा को स्वीकार कर लिया है जो मावन जाति पर बहुत बड़ा अत्याचार है। 
इस्लाम ऐसे वर्गों की हर प्रकार से सहायता करने का आदेश देते हुए मालदारों के मालों में उनका अधिकार रखता है और उनको निर्धन होने के कारण किसी भी मानवीय अधिकार से वंचित नहीं रखता। यह है  मानव स्वभाव से मेल खाने वाला इस्लाम का प्राकृतिक नियम...  

शुक्रवार, 1 जून 2012

सार्वजनिक स्थल पर नमाज़ पढ़ने वाले के प्रति प्रेंम क्यों ?

एक सज्जन ने फेसबुक पर लिखा थाः
कुछ हिंदुओं की सोच बड़ा अजीब होती है.अगर आप किसी पब्लिक प्लेस पर हनुमान चालीसा पढेंगे तब वह आपको हिकारत की नजर से देखेंगे.लेकिन अगर कोंई मुसलमान उनके बगल में चादर विछाकर नमाज पढ़ने लगेगा तब उसे बहुत इज्जत के साथ देखेंगे.

1.सब से पहली बात तो यह है कि यह जग़बात को भड़काने और दूसरों से दूर करने  वाली सोच है। क्या ही अच्छा होता कि हम प्रेम और परस्पर एकता की बात करते ।

 2. हम भारत के रहने वाले हैं, एक दूसरे को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, विषेश रूप में धार्मिक लोगों के साथ प्रेम का व्यवहार करते हैं, आज भी हमारे भारत की संस्कृति एक दूसरे को प्यार की दृष्टि से देखना सिखाती है।

3.जब मुसलमान सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ पढ़ रहा होता है तो इसके द्वारा असल में वह यह संदेश दे रहा होता है कि हम शान्तिवादी हैं,प्रेम के दूत हैं , जब हम अपने पैदा करने वाले का अधिकार यहाँ पर भी पामाल नहीं कर सकते तो उसकी सृष्टि के अधिकार को कैसे पामाल कर सकते हैं। इस तरह ऐसे व्यक्ति पर आदमी का विश्वास बंध जाता है औऱ उस के अस्तित्व से किसी को कोई भय नहीं रहता।

3. ऐसे व्यक्ति  को इज़्ज़त की दृष्टि से देखना यह एक प्राकृतिक भावना है क्यों कि मुसलमान उसी के पैदा करने वाले की पूजा कर रहा होता है इस लिए उसके प्रति प्रेम और इज्ज़त स्वाभविक है।

4. एक मूल बात यह भी है कि मुसलमानों की नमाज़ों का समय निर्धारित होता है। वह अपनी नमाज़ को दूसरे समय के लिए टाल नहीं सकता कि नमाज़ का समय समाप्त हो जाएगा, इस लिए वह जहां भी रहता है सब से पहले अपने पैदा करने वाले के अधिकार को पूरा करता है।

5. अब रही मुर्ति-पूजा की बात तो हम मुसलमान होने के नाते  उसे बुरा भला नहीं कहते और ना ही मुर्तियों के प्रति बुरे शब्द का प्रयोग कर सकते हैं कि इस्लाम हमें इस से रोकता है परन्तु यह एक अप्राकृतिक नियम है कि श्रेष्ठ मानव अपने ही हाथ से बनाई गई किसी तुच्छ मूर्ति के सामने माथा टेके, इसी लिए उसके प्रति एक आम आदमी के मन में प्रेम की भावना नहीं पैदा हो सकती। लेकिन एक मुसलमान उसे भी प्रेम ही की दृष्टि से देखता है कि कम से कम यह अपने ईश्वर का नाम तो ले रहा है यधपि उसे पहचानता नहीं है।  
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अंत में हम धन्यवाद प्रकट करते हैं डा0 अनवर जमाल साहब को कि उन्होंने इसे नवभारत टाइम्स पर पोस्ट किया जिस पर लम्बी टिप्पणियाँ की गईं। 
  

सोमवार, 28 मई 2012

दो औरतें गवाही में एक पुरुष के बराबर क्यों हैं?

यह बात सही नहीं है कि हमेशा दो औरतों की गवाही एक पुरुष ही के बराबर होती है। यह केवल कुछ मामलों में है। क़ुरआन में कम से कम पाँच ऐसी आयतें हैं जिनमें गवाहों की गवाही का उल्लेख है। लेकिन उनमें औरतों और पुरुषों में अन्तर की बात नहीं कही गई है। क़ुरआन की सूरा बक़रा अध्याय 2 की आयत 282 जो क़ुरआन की सबसे बड़ी आयत है,इस प्रकार के मामलों में यह आदेश दिया जा रहा है कि लिखित रूप में दोनों पक्षों के बीच इस तरह का मुआहदा तय पाए और इसके लिए दो गवाह बनाए जाएँ। यह ज़्यादा अच्छा है कि वे दोनों पुरुष ही हों। अगर दो पुरुष न मिल सकें तो एक पुरुष और दो औरतें काफ़ी होंगी। हज़रत आइशा (रजि़॰) की हदीस में भी एक गवाही की बात है। बहुत से धर्मशास्त्री इस बात पर एक मत हैं कि चाँद देखने के बारे में केवल एक औरत की गवाही काफ़ी है। दो औरतें गवाही में एक पुरुष के बराबर क्यों हैं?

ग़लत फ़हमियों का निवारण













मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

हमें किस धर्म का पालन करना चाहिए ?

धर्म के सम्बन्ध में कोई जबर्दस्ती नहीं। हाँ! इस विषय पर र्वाता अवश्य होनी चाहिए। वास्तविकता यह है कि
 यह प्रश्न ही बेकार है कि हमें किस धर्म को मानना चाहिए, क्यों कि धर्म तो ईश्वर की ओर से एक ही आयाहैअनेक नहीं। वह  कैसे ? इस लिए कि :
(1) हमारा ईश्वर एक है अनेक नहीं। 
(2) हम सब की रचना एक ही प्रकार से होती आ रही है अन्य प्रकार से नहीं।
(3) हम सब एक ही प्रकार की धातु (वीर्य) से बनते है। 
(4) तथा हम सब एक ही (प्रथम) माता पिता की संतान हैं। 
तो फिर धर्म अलग अलग कैसे हो सकता है ? लेकिन आज हम अलग अलग धर्म देख रहे हैं इस लिए आज उन धर्मों में से मुक्ति के लिए किसी एक धर्म का चयन करने की आवश्यकता है। लेकिन यहाँ समस्सया यह है कि आज हर धर्म के मानने वाले अपने धर्म को सत्य मान रहे हैं तो इस सम्बन्ध में मापदण्ड क्या हो सकता है... आइए देखते हैं...
(1) पहली बात यह है कि उस धर्म ने एक ईश्वर की कल्पना सिद्ध की हो। 
(2) दूसरी बात यह है कि उसका एक संदेष्टा हो जिसकी जीवनी पूर्ण रूप में शुद्ध एवं उजव्वल हो। वह भी 
स्वयं को मानव के रूप में पेश करता हों, ईश्वर के रूप में नहीं। 
(3) तीसरी बात यह है कि उस धर्म का ग्रन्थ हर प्रकार के विभेद से पाक हो जिसको चुनौति न दी जा सकती हो। 
(4) चौथी बात यह है कि उस धर्म ने एक पूर्ण जीवन व्यवस्था पेश किया हो। अर्थात उसका सम्बन्ध जीवन के प्रत्येक भाग में हो। 
(5) पाँचवीं बात यह कि उस शिक्षा के आधार पर हर युग में एक शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो सकती हो । 
(6) छट्ठी बात यह कि उस धर्म ने मानव को विभिन्न जातियों में विभाजित न किया हो। और सब को बराबर का अधिकार प्रदान करता हो ।
 यह 6 गुण जिस धर्म में पाए जाएं वही धर्म "मानव धर्म" हो सकता है।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

हर बात को आप धार्मिक चश्में से क्यों देखते हैं ?

कुछ सज्जन यह कहते हैं कि  आखिर कुछ लोग हर बात एवं घटना को धार्मिक चश्मे से  देख कर उसे धार्मिक
रंग में क्यों रंग देते हैं।" इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म एक व्यक्तिगत मआमला है, इसे सार्वजनिक रूप नहीं देना चाहिए, परन्तु मैं एक मुस्लिम की हैसियत से इस बात से सहमत नहीं, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं। और धर्म एक इनसान की प्रकृति में शामिल है। हम सब का पैदा करने वाला ईश्वर जो एक है जिसके समान कोई नहीं, न उसका कोई भागीदार है, न उसे मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होने की आवश्यकता पड़ती है। हाँ ! यह सत्य है कि उसने मानव की रचना करने के बाद उसे यूं ही छोड़ नहीं दिया कि जैसे चाहे अपनी इच्छानुसार जीवन बिताए अपितु मानव में से ही क्रान्तिकारी मनुष्यों को चयन कर के उनका मार्गदर्शन  किया, जिनको अवतार अथवा संदेष्टा कहते हैं, वह हर युग और हर देश में आते रहे, जिनकी संख्या एक लाख तक पहुंचती है। उनको अपने अपने देश तथा समाज हेतु भेजा जाता था। 
परन्तु जब सातवीं शताब्दि ईसवी में यातायात के साधन ठीक हो गए। तथा एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क होने लगा तो सम्पूर्ण संसार हेतु अन्तिम अवतार भेजे गए जिन पर क़ुरआन का अवतरण हुआ जो सारे मानव को सम्बोधित करता हैं। उन्हें हम मुहम्मद कहते हैं। कुरआन लोगों को विभिन्न जातियों में विभाजित नहीं करता अपितु एकत्र करता है। उसका सार मात्र एक ईश्वर की पूजा और मानव भाई चारा है। क़ुरआन के अनुसार सारे मानव की उत्पत्ति एक ही मानव आदम औऱ हव्वा से हुई है और उन सब का बनाने वाला भी एक ही है। इस प्रकार इस्लाम मानव का धर्म है परन्तु खेद की बात यह है कि अधिक लोग अपने ही परम धर्म से वंचित हो कर इधर उधर भटक रहे हैं। आज ईश्वर का नाम तो सब लेते हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं। 
यह भी सत्य है कि हम सब एक दिन अपने  पैदा करने वाले के पास पहुँचने वाले और इस जीवन का लेखा जोखा देने वाले हैं, जिसके आधार पर ही हमारे स्वर्ग अथवा नरक का निर्णय किया जाएगा।
 यदि हमें  इन बातों का ज्ञान है जो सब को सत्य की ओर अग्रसर कर सकती हैं, और हम इन्हें छुपाएं अथवा बयान करने से संकोच करें तो मैं अपने भाईयों का शुभ-चिंतक नहीं बन सकता।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

इस्लाम एक रूठीवादी धर्म है

क्या इस्लाम अपने मानने वालों को दूसरों से मिलने से रोकता है। दुसरे धर्मों की धार्मिक संस्कृति को अपनाने में बाधा डालता है। जबकि हिन्दु धर्म प्रत्येक धर्मों का सम्मान करना सिखाता है इसका स्पष्ट उदाहरण यह है कि एक हिन्दू किसी भी धार्मिक स्थल से जुग़रे चाहे दर्गाह ही क्यों न हो उसके समक्ष झुक जाता है क्यों कि वह जानता है कि भगवान हर जगह है। ?

इस्लाम के सम्बन्ध में यह जो बात कही गई है, इस्लामी सिद्धांत से अज्ञानता का परिणाम है। यह मात्र एक प्रकार का संदेह है। आइए इस संदेह का हम निम्न में निवारण कर रहे हैं। आशा है कि हम पर सत्य का आभास होगा।

क्या इस्लाम दूसरों से कट कर जीना सीखाता है?

इस्लाम दूसरों से कट कर जीना नहीं अपितु मिल कर जीना सीखाता है। इस्लामी सिद्धांत का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि इस्लाम में (1) एकेश्वरवाद (2) और मानव बंधुत्व दो ऐसे सिद्धांत हैं जो सारे मानव को एक कर सकते हैं।

एकेश्वरवाद का अर्थ यह हुआ कि सारी सृष्टि का सृष्टिकर्ता मात्र एक अल्लाह है अतः सम्पूर्ण मानव के लिए आवश्यक है कि मात्र उसी की पूजा करे। जब सारे मानव का पैदा करने वाला एक ठहरता है और प्रभु भी एक ही है तो इस से मित्रता बनेगी अथवा बिगड़ेगी ? उसके विपरीत यदि कोई किसी की पूजा करे, कोई किसी की पूजा करे तो इसमें असमानता के साथ साथ शत्रुता का भाव भी पाया जाता है। इसी लिए लोग अलग अलग जातियों और धर्मों में बट जाते हैं। जबकि इस्लामी सिद्धांत सारे मानव को एक समुदाय बनाने का प्रयास करता है।

दूसार सिद्धांत मानव बंधुत्व है जिसका अर्थ यह हुआ कि सारे मानव की असल एक है। सारे मानव एक ही माता पिता अर्थात् आदि पुरुष आदम और हव्वा की संतान हैं। इसलिए इस्लाम हर प्रकार के भेद-भाव और छूत-छात का खंडन करता है। मानव को जाति और वंश के आधार पर बांटने की निंदा करता है। जिससे सारे मानव एक बन्धुत्व में बंध जाते हैं।

इन दो सिद्धांतों को सामने रखें फिर सोचें कि जो धर्म सारे मानव को परस्पर भाई भाई सिद्ध करता है उनमें जाति अथवा समुदाय के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करता। और उनका पूज्य भी एक ही सिद्ध करता है। ऐसे धर्म के सम्बन्ध में यह कैसे कल्पना किया जा सकता है कि वह रुठिवाद की शिक्षा देता है।

रही यह बात कि इस्लाम "हर चीज़ की पूजा" का खंडन करता है, तो यह सिद्धांत मात्र इस्लाम का नहीं अपितु सारे धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षाओं का यही सार है कि मात्र एक अल्लाह की पूजा की जाए। इस लिए यदि कोई हिन्दु एक अल्लाह के इलावा किसी अन्य की पूजा करता है तो वह सब से पहले अपने धार्मिक ग्रन्थ की शिक्षाओं की अवहेलना करता है। हर चीज़ भगवान नहीं हो सकती। अल्लाह तो मात्र एक है वह किसी का रूप नहीं लेता, न किसी की शक्ल में अवतार लेता है। हाँ! उसने मानव मार्गदर्शन हेतु हर देश और हर युग में मानव में से ही संदेष्टाओं को भेजा जिनका अन्त मुहम्मद सल्ल0 पर हुआ। मुहम्मद सल्ल0 ने लोगों को उसी एक अल्लाह की ओर बुलाया जिसकी ओर सारे संदेष्टा बुलाते आ रहे थे। आज अल्लाह का अवतरित किया हुआ मार्ग क़ुरआन और मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में पूर्ण रूप में सुरक्षित है।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

संदेहों का निवारण (अन्तिम भाग)

प्रश्नः इस दुनिया में हिन्दू तो पहले से हैं,लेकिन मुसलमान बाद में क्यों बने...???

उत्तरःमानव इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि इस धरती पर अलग अलग विभिन्न मानव नहीं बसाए गए अपितु एक ही मानव से सारा संसार फैला है। निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दें, आपके अधिकांश संदेह खत्म हो जाएंगे।
सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है, ईश्वर ने सर्वप्रथम विश्व के एक छोटे से कोने धरती पर मानव का एक जोड़ा पैदा किया जिनको आदम तथा हव्वा के नाम से जाना जाता है। उन्हीं दोनों पति-पत्नी से मनुष्य की उत्पत्ति का आरम्भ हुआ जिन को कुछ लोग मनु और शतरूपा कहते हैं तो कुछ लोग एडम और ईव जिनका विस्तारपूर्वक उल्लेख पवित्र ग्रन्थ क़ुरआन(230-38) तथा भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व खण्ड 1 अध्याय 4 और बाइबल उत्पत्ति (2/6-25) और दूसरे अनेक ग्रन्थों में किया गया है। उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम कहते हैं जो आज तक सुरक्षित है।
ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें। वह हर देश और हर युग में भेजे गए, उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती है, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ति-पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं, उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
परन्तु उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखें सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना आदि।
लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं। फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाली तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की सन्तान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता है कि उन्हों ने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार की थी तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया।

बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया।

इसे यूं समझिए कि यदि कोई पत्रवाहक एक व्यक्ति के पास उसके पिता का पत्र पहुंचाता है  तो उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके परन्तु यदि वह पत्र में पाए जाने वाले संदेश को बन्द कर के रख दे और  पत्रवाहक का ऐसा आदर सम्मान करने लगे कि उसे ही पिता का महत्व दे बैठे तो इसे क्या नाम दिया जाएगा....आप स्वयं समझ सकते हैं।

ऐसा ही बिल्कुल संदेष्टाओं के साथ भी हुआ।

जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा तो ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है । उनके समान धरते ने न किसी को देखा न देख सकती है। वही कल्कि अवतार हैं जिनकी हिन्दु समाज में आज प्रतीक्षा हो रही है।

प्रश्नः अल्लाह ने सभी को अपने मज़हब का क्यों नहीं बनाया...???
उत्तरः इसका उत्तर क़ुरआन ने विभिन्न स्थानों पर दिया है क़ुरआन में कहा गयाः "(ऐ मुहम्मद) यदि आपका रब चाहता तो सब लोगों को एक रास्ते पर एक उम्मत कर देता, वे तो सदैव मुखालफ़त करने वाले ही रहेंगे। सिवाए उनके जिन पर आपका रब दया करे, उन्हें तो इसी लिए पैदा किया है। " (सूरः हूद 118) यही विषय सूरः यूनुस 96,सरः माईदा 48,सूरः शोरा 8,सूरः नहल 93 और अन्य विभिन्न आयतों में बयान किया गया है।

यह संसार परीक्षा-स्थल है परिणाम स्थल नहीं। यहाँ हर व्यक्ति को एक विशेष अवधि के लिए बसाया गया है ताकि उसका पैदा करने वाला देखे कि कौन अपने रब की आज्ञाकारी करके उसका प्रिय बनता है और औन उसकी अवज्ञा करके उसके प्रकोप का अधिकार ठहरता है। इसके लिए उनसे संदेष्टाओं द्वारा अपना संदेश भेजा और सत्य को खोल खोल कर बयान कर दिया है। फिर इनसान को उसे अपनाने की आज़ादी भी दे दी है कि चाहे तो उसके नियम को अपना कर उसके उपकारों का अधिकार बने और चाहे तो उसके नियमों का उलंधन कर के उसके प्रकोप को भुगतने के लिए तैयार हो जाए। यही है जीवन की वास्तविकता।
इस बिन्दु को क़ुरआन की यह आयत स्पष्ट रूप में बयान करती हैः "और यदि आपका रब चाहता तो धरती के सभी लोग ईमान ले आते, तो क्या आप लोगों को ईमान लाने के लिए मजबूर करेंगे" (सूरः यूनुस 99)

प्रश्नः बहुत से सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब हम बचपन से तलाश रहे हैं...मसलन ….अल्लाह ने संसार की सृष्टि करके इसे हिन्दुओं के हवाले क्यों कर दिया...??? हिन्दुओं के दौर में भी संसार आगे बढ़ा... कई सभ्यताएं आईं...
उत्तरः इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है कि पहले लोग एक ही धर्म पर थे, बाद में अलग अलग धर्मों में बट गए, वही प्रथम धर्म आज इस्लाम के नाम से जाना जाता है।

प्रश्नः दूसरे मज़हब के लोगों को किसने पैदा क्या है...??? अगर अल्लाह ने... तो फिर क्यों अल्लाह को मानने वाले 'मुसलमान' दूसरे मज़हबों के लोग को 'तुच्छ' समझते हैं... क्या अपने ही अल्लाह की संतानों (दूसरे मज़हब के लोगों) के साथ ऐसा बर्ताव जायज़ है...???
उत्तरःजी हाँ! सारे इनसानों को अल्लाह ही ने पैदा किया परन्तु उन्हें जो चलने का नियम दिया उसे अधिकांश लोगों ने अपने सवार्थ हेतु परिवर्तित कर के विभिन्न धर्मों में विभाजित हो गए, आज वह अपने सृष्टिकर्ता के नियमानुसार नहीं चल रहे हैं  हालाँकि जिस उद्देश्य के अनतर्गत परमेश्वर ने मानव की रचना की थी उसकी वह प्रतिदिन अवहेलना कर रहा है ज़रा कल्पना कीजिए कि एस कर्मचारी किसी कम्पनी में बहाल होता है, कम्पनी उसे वेतन देती है परन्तु वह काम किसी दूसरी कम्पनी में जा कर करने लगे तो कम्पनी के मनेजर को उस पर अवश्य क्रोध होगा। फिर भी एक मुसलमान किसी धर्म के मानने वाले को तुच्छ नहीं समझता और न ही उसके साथ अलग व्यवहार करता है। जो लोग ऐसी मानसिकता रखते हैं वह इस्लामी नियम से अवगत नहीं।  

प्रश्नः क्या दूसरे मज़हबों के धार्मिक ग्रंथों और उनके ईष्ट देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातें करने से... उनका दिल दुखाने से अल्ल्लाह ख़ुश होगा...???
 उत्तरः हमें पूर्ष विश्वास है कि अन्य धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ या तो मानव रचित हैं अथवा किसी युग में ईश्वरीय ग्रन्थ थे परन्तु आज वह सुरक्षित न रहे और उनमें देवी देवताओं की बातें भी सम्मिलित हो चुकी हैं लेकिन क़ुरआन आज तक पूर्ण रूप में सुरक्षित है स्वयं उसकी आधुनिक शैली इस पर प्रमाण है।
इन स्पष्ट तथ्यों के बावजूद  इस्लाम दूसरे धर्मों के बारे में अपमानजनक बातें कहने की अनुमति कदापि नहीं देता। देखिए सूरः अनआम 108 " जो लोग अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की पूजा करते हैं उनकों बुरा भला मत कहो कि वह अज्ञानता के कारण अल्लाह को बुरा भला कहेंगे।" 

प्रश्नः 'मुसलमानों' की अपने मज़हब को श्रेष्ठ समझने और दूसरे मज़हबों को 'तुच्छ' समझने की मानसिकता ने बहुत से विवादों को पैदा कर दिया है... इनमें सबसे अहम है दहशतगर्दी... जिससे आज कई मुल्क जूझ रहे हैं... इससे इनकार नहीं किया जा सकता...
उत्तरः जी नहीं! हमें कहने दिया जाए कि एक सच्चा मुसलमान सच्चा मानव होता है क्योंकि वह विश्व भाईचारा पर विश्वास रखता है। वह सारे संसार के लोगों को अपना भाई समझता है। इस लिए एक सच्चा मुस्लिम कभी किसी अन्य धर्म के मानने वाले को अकारण हीनि नहीं पहुंचा सकता। और दहशतगर्दी का इस्लाम से कोई सम्बन्ध नहीं और हाँ! मात्र इस्लाम में नहीं अपितु हर धर्म में दहशतगर्द पाए जाते हैं जिसका इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्नःजब अल्लाह ने सभी को 'मुसलमान' पैदा नहीं किया तो फिर क्यों मज़हब के ठेकेदार सभी कौमों को 'मुसलमान' बनाने पर तुले हुए हैं...???
 बहन जी ! कोई भी मुसलमान किसी गैर-मुस्लिम को मुसलमान बनाने का प्रयास  नहीं करता है, इस्लाम का सम्बन्ध दिल से है, एक व्यक्ति स्वयं अपने दिल से इसे अपनाता है। ऊपर तो आपने क़ुरआन की यह आयत पढ़ ही ली है कि "क्या आप लोगों को ईमान लाने के लिए मजबूर करेंगे" (सूरः यूनुस 99) इसी लिए अगर कोई सौ बार भी कलमा पढ़ ले और स्वयं को मुसलमान कहे लेकिन यह दिल से नहीं है तो वह मुसलमान नहीं हो सकता। तात्पर्य यह कि एक मुस्लिम किसी को मुसलमान बनाता नहीं है बल्कि उनकी धरोहर का उनके समक्ष परिचय कराता है और बस। यही तो असल मानवता है कि अपने भाई को उसके वास्तविक पूज्य से परिजीत करा दिया जाए मानना न मानना उसके हाथ में है।   

प्रश्नःइस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद (सल्लल.) से पहले जो एक लाख 24 हज़ार नबी हुए हैं... वो किस मज़हब को मानते थे...??? 
उत्तरः यहाँ इस गलतफ़हमी को दूर कर लीजिए कि  इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद सल्ल0 नहीं बल्कि वह इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा हैं जिसका विस्तृत बयान ऊपर हो चुका है। और मानव मार्गदर्शन हेतु एक लाख चौबीस हज़ार नबी जो आए वे सब के सब इस्लाम के मानने वाले थे जैसा कि यह बात ऊपर बताई जा चुकी है। एक बार फिर ऊपर की व्याख्या को पढ़ लिया जाए। धन्यवाद।
अंत में हम अल्लाह (ईश्वर) से प्रार्थना करते हैं कि हे अल्लाह! हे  ईश्वर! तू हमें अपने सत्य नियम से अवगत करा। क्योंकि हमें एक दिन मरना है, तेरे पास पहुंचना हैं और अपने कर्मों का लेखा जोखा देना है। हे अल्लाह! तू ही हमारा मार्गदर्शन कर सकता है तेरे अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं जो हमारा मार्गदर्शन कर सके। आमीन

संदेहों का निवारण (3)

संदेहः (1) मुसलमानों में बच्चों को यही बुनियादी तालीम दी जाती है कि दुनिया में इस्लाम ही एक मात्र मज़हब है जो अल्लाह का है और अल्लाह ने ही शुरू किया है, जबकि दूसरे धर्म मनुष्य ने शुरू किए हैं...

उत्तरः बहन जी! यह बिल्कुल सही है कि मुसलमान अपने बच्चों को इस्लाम की शिक्षा शुरू से ही देते हैं, उनको अल्लाह का ज्ञान भी दिया जाता है और यह  भी बताया जाता है कि ईश्वर ने मानव को बनाया और धर्ती पर बसाया तो उन्हें यूं ही नहीं छोड़ दिया कि जैसे चाहें जीवन बिताएं बल्कि जिस प्रकार एक कम्पनी कोई सामान तैयार करती है तो उसके प्रयोग करने का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को जीवन बिताने का नियम भी दिया। यह नियम एक ही हो सकता है क्यों कि मानव की उत्पत्ति एक ही माता पिता से हुई, उत्पत्ति का नियम भी एक ही है, हर एक की उत्पत्ति एक प्रकार की धातु से होती आ रही है, और उत्पत्ति करने वाला भी मात्र एक ईश्वर (अल्लाह) है। चार प्रकार की यह समानताएं इस बात का पता देती हैं कि मानव का धर्म भी एक ही होना चाहिए। न कि अलग अलग। अब प्रश्न यह है कि धरती पर विभिन्न धर्म कैसे पैदा हुए तो इसके लिए आगे पढ़िए।

संदेह (2) अल्लाह सर्वशक्तिमान है, जबकि दूसरे धर्मों के देवी-देवता 'शैतान' हैं...यानी अल्लाह के विरोधी हैं...

उत्तरः मुसलमानों के हाँ अल्लाह की कल्पना किसी विशेष जाति तथा वंश तक सीमित नही है बल्कि वह विश्व का सृष्टीकर्ता, स्वामी और पालनकर्ता है। वह अल्लाह एक है, उसके पास माता पिता नहीं, उसके पास सन्तान नहीं, उसको किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं पड़ती, वह मानव रूप धारण नहीं करता। उसका कोई भागीदार नहीं। यह शिक्षा मात्र इस्लाम की नहीं अपितु सारे धार्मिक ग्रन्थों की है। और यह बात नोट कर लें कि एक मुसलमान दूसरे धर्मों के देवी देवताओं के लिए अपशब्द का प्रयोग नहीं करता परन्तु यह अवश्य कहता है कि यह देवी देवता जिनकी पूजा की जा रही है उनको पूजने की शिक्षा स्वयं उन्हों ने नहीं दी थी और न आज उनके धार्मिक ग्रन्थ दे रहे हैं देखिएऋवेद 4 / 12 /1 दुवैरा सत्यि बहिर्षि सैकड़ों देवी देवताओं का बहिष्कार करो। और अर्थवेद 9/ 40 मैं आया है " जो लोग झूठे अस्तित्व वाले देवी देवताओं की पूजा करते हैं वे अंधा कर देने वाले गहरे अंधकार में डूब जाते हैं। वह एक ही अच्छी पूजा करने योग्य है। "

संदेह (3) ऐसे में भला कौन अपने अल्लाह के विरोधियों को अच्छा समझेगा...??? उनके देवी-देवताओं के बारे में ग़लत बातें की जाती हैं... इसलिए लोगों की ऐसी मानसकिता बन जाती है कि वो ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को तुच्छ समझते हैं...
उत्तरः जैसा कि हमने ऊपर ही बता दिया है कि इस्लाम वही कहता है जो अन्य धर्मों के धर्मिक ग्रन्थ कहते हैं। इसलिए आज एक मुस्लिम यह समझता है कि हमारे उन भाईयों को पता नहीं है जिसके कारण वह देवी देवताओं की पूजा कर रहे हैं। इस लिए वह प्रेम से, स्नेह से, मुहब्बत से उनके सामने अनके अपने ईश्वर का परिचय कराता है लेकिन वह अन्य धर्म के मानने वालों को बुरा नहीं समझता, न उनके देवी देवताओं के सम्बन्ध में ग़लत बातें कहता है...और कहे भी क्यों जब कि क़ुरआन ने रोक दिया.. देखिए सूरः अनआम 108
" जो लोग अल्लाह के अतिरिक्त अन्य की पूजा करते हैं उनकों बुरा भला मत कहो, कि वह अज्ञानता के कारण अल्लाह को बुरा भला कहेंगे।"
 देखा ! इस्लाम हमें यही सिखाता है कि हम उनके पूज्यों के सम्बन्ध में ग़लत बातें न करें परन्तु हम उनकी पूजा करने नहीं जा सकते क्योंकि हमें सत्य और असत्य का ज्ञान है। फिर भी हम इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ भाई का समान व्यवहार करते हैं औऱ पारस्परिक सम्बन्ध में उनको वह सारा अधिकार देते हैं जो एक मुस्लिम को प्राप्त है। क्योंकि क़ुरआन ने हमें यही शिक्षा दी है देखिए ]60:8]
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है।

संदेहः (4) हम एक साल तक मदरसे में पढ़े हैं, यानि तीसरी जमात... हमें भी यह सब पढ़ाया गया है...हमने अप्पी (मुल्लानी जी को अप्पी कहते थे) से पूछा- जब हमारा अल्लाह ही सर्वश्रेष्ठ है तो फिर...क्यों हिन्दुओं की मुरादें पूरी होती हैं...???

उत्तरः जी हाँ ! अल्लाह से ही माँगना चाहिए और अल्लाह के अतिरिक्त कियी अन्य से माँगना महापाप है बल्कि इस्लाम में सब से बड़ा पाप यही हैं। यदि कोई अल्लाह के अतिरिक्त अन्य से माँगता है तो उसकी प्रार्थना भी स्वीकार नहीं होती बस उसके दिल में उसके प्रति आस्था बैठ जाती है हालाँकि देने वाला तो ऊपर वाला अल्लाह होता है वह अपनी असीम दया से प्रदान करता है कुरआन में कहा गयाः (देखिए सूरः अहक़ाफ 5 ) "और उस से बढ़ कर ज़्यादा गुमराह कौन होगा जो अल्लाह के अतिरिक्त ऐसों को पुकारता है जो क़यामत तक उसकी प्रार्थना न क़ुबूल कर सकें बल्कि उनके पुकारने से केवल ग़ाफिल हों "  ( शेष अगले  पोस्ट पर)

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

संदेहों का निवारण (2)

 इस्लाम सुधारवादी बनाता है आतंकवादी नही 
इस्लाम ने मानव को हर योग में सुधार की शिक्षा दी और आतंक से दूर रखा बल्कि इस्लाम आया ही इसी लिए ताकि शान्तिपूर्ण समाज की स्थापना हो, कुप्रथाओं का नष्ट हो और समाज में प्रेम की भावनाएं पैदा हों। इसी लिए मुसलमान जहाँ कहीं गए लोगों ने उनके प्रेम-भाव से प्रभावित हो कर उनके धर्म को गले लगा लिया। स्वयं भारत में जब मुहम्मद बिन क़ासिम का आगमन हुआ तो उनके आचरण तथा सद्-व्यवहार से भारतवासी इतने प्रभावित हुए कि भारत के हिन्दुओं ने अपने मन्दिरों में उनका चित्र बना कर सजा लिया। इस्लाम इस बात की अनुमति कदापि नहीं देता कि लोग सुधार के नाम पर मरने मारने के लिए उतारू हो जाएं और यदि कोई मरने मारने पर उतारु हो चुका है तो वह आतंकवादी है सुधारवादी नहीं। इस्लाम का आतंक से कोई सम्बन्ध नहीं, इस्लाम और आतंक ऐसे ही है जैसे आग और पानी। इस्लाम का शाब्दिक अर्थ ही होता है "शान्ति"।

इस्लाम ने हर युग में सुधार किया और आज भी सुधार करना ही उसके वजूद का मूल उद्देश्य है। औऱ सुधार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। क्यामत की सुबह तक सुधार का यह काम चलता रहेगा। यह भी सही है कि आज मुसलमानों में (इस्लाम में नहीं) कुछ प्रक्रियाएं ऐसी आ गई हैं जिनके कारण लोग इस्लाम को "कुछ मुसलमानों" के व्यवहारिक जीवन से तुलना करके देखने लगे हैं। यहाँ पर मुझे महाकवि टैगोर की बात याद आ रही हैं। उनके साथ एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे मौलाना सय्यद सुलैमान नदवी, इस्लाम के इतिहासकार, इन दोनों महान विद्वानों को एक साथ देख कर किसी व्यक्ति ने पूछ दिया कि आज इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों न फैल रहा है जितनी तेज़ी से मुहम्मद सल्ल० और पहले युग में फैसा - सय्यद नदवी साहिब ने टैगोर से इस प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की । तब टैगोर ने बताया कि " तब सत्य धर्म की अच्छाइयों और भलाइयों को जानने के लिए लोगों को पुस्तकालयों का रुख़ नहीं करना पड़ता था, वह हर मुसलमान के जीवन ही में विधमान था।"
क्या भारत के मुसलमान गुरु देव की बात पर ध्यान देंगे ? जी हाँ । आज सब से बड़ी बाधा हमारे देशवासियों के लिए कुछ मुसलमानों के घृणित कर्तव्य हैं । आज अन्य लोग अपनी इस धरोहर का विरोध मात्र इस कारण कर रहे हैं कि वह मुसलमानों को उसके अनुसार चलते हुए नहीं देखते।

और हाँ! इस्लाम में सुधार की जहाँ जक बात है तो इस्लामिक ला में ग्रेजुवेशन करने के नाते मैं यह कहना चाहूंगा कि इस्लामी शास्त्र में समयानुसार संशोधन की गुंजाइश रखी गई है। जो क़ुरआन और हदीस की रोशनी में ही होगी। आज भी होती रहती है और इस विषय में एक व्यक्ति अपनी खास राय भी रख सकता है। मिसाल के तौर पर निक़ाब के मस्ला ही को लीजिए, कितने इस्लामी विद्वानों ने कहा कि महिला का चिहरा पर्दा में दाखिल नहीं है। हम ऐसे विद्वानों की राय का सम्मान करते हैं। लेकिन जहाँ तक इस्लामी आस्था की बात हैं तो इसमें कोई ताल मेल नहीं...इसमें कोई समझौता नहीं...कोई सन्धि नहीं...एक लाख चौबीस हज़ार संदेष्टा मानव मार्गदर्शन हेतु भेजे गए जिनमें सब का संदेश यही रहा कि एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं। आप जानती हैं कि इस्लाम का मूल स्तम्भ एकेश्वरवाद है, मात्र एक ईश्वर की पूजा...अब यह कैसे हो सकता है कि एक मुसलमान मन्दिर में जाए...और पूजा पाट करे...इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरे धर्मों को बुरा भला कहते हैं, पदापि नहीं अपितु हम दूसरे धर्मों का सम्मान करते हैं, उनके धार्मिक गुरुओं के प्रति कोई अपशब्द का प्रयोग नहीं करते...हम गैर-मुस्लिम भाइयों के साथ एक मुस्लिम का सा व्यवहार करते हैं क्योंकि यही इस्लाम की शिक्षा है परन्तु हम अपनी आस्था का सौदा नहीं कर सकते। उदारता के लिए क्या यही रह गया है कि हम अपनी मूल आस्था को त्याग दें...? (शेष अगले पोस्ट पर)

संदेहों का निवारण (1)

बहन फिर्दौस खान ने अपने ब्लौग पर कुछ सवाल पूछा है जो अति महत्वपूर्ण हैं निम्न में उनके जवाब एक एक कर के दे रहा हूँ, कामों के हुजूम, समय की तंगी और सवाल के तफ्सील तलब होने के कारण मैं कई भागों में इसका उत्तर दूगाँ। आशा है कि इन सवालों पर चिंतन मनन करेंगी। हमारा उद्धेश्य ज्ञान का आदान प्रदान है और बस।

सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ताः
सवाल करने से ईमान खतरे में नहीं पड़ता अपितु सवाल करने से ज्ञान में वृद्धि होती है। इसी लिए इस्लाम सवाल कर के ज्ञान को बढ़ावा देने की उत्साह पैदा करता है। मुहम्मद सल्ल0 के साथी आप से कहीं रास्ते में मिलते अथवा सभा में होते सवाल करके धार्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे। हदीस की पुस्तकों में इस प्रकार के सवालों का भण्डार पाया जाता है।

स्वयं क़ुरआन में अनुमानतः 15 स्थानों पर यूं आया हैः "लोग आप से ....के सम्बन्ध में पूछते हैं, तो आप कह दीजिए कि …

सात सवाल सूरः बक़रा में
 يسئلونك عن الأهلة --يسئلونك ماذا ينفقون قل ما أنفقتم --يسئلونك عن الشهر الحرام قتال فيه قل قتال فيه-- يسئلونك عن الخمر والميسر-- ويسئلونك ماذا ينفقون قل العفو--ويسئلونك عن اليتامى قل إصلاح لهم خير-- ويسئلونك عن المحيض-


एक सवाल सूरः माईदा में: يسئلونك ماذا أحل لهم قل أحل لكم الطيبات
दो सवाल सूरः आराफ में
. يسئلونك عن الساعة أيان مرساها قل إنما علمها عند ربي--- يسئلونك كأنك حفي عنها قل إنما علمها عند الله
एक सवाल सूरः अनफ़ाल में    يسئلونك عن الأنفال قل الأنفال لله والرسول
एक सवाल सूरः इस्रा में ويسئلونك عن الروح قل الروح من أمر ربي
एक सवाल सूरः कहफ़ में  ويسئلونك عن ذي القرنين
एक सवाल सूरः ताहा में ويسئلونك عن الجبال فقل ينسفها ربي نسفاً
एक सवाल सूरः नाज़ियात में يسئلونك عن الساعة أيان مرساها


क़ुरआन में यह भी आया हैः "हमारे उन संदेष्टाओं से पूछो जिन्हें हमने आप से पूर्व भेजा था... " (सूरःज़ुखरुफ 45)
सवाल आधा ज्ञान है और उत्तर आधा ज्ञान और अच्छा सवाल करना अच्छी बुद्धि का प्रेरक होता है। हदीस की किताब सुनन अबी दाऊद में है कि एक व्यक्ति को सर में ज़ख़्म हो गया, उसने (साधारण लोगों से) पूछा कि क्या मेरे लिए तयम्मुम करने की अनुमति है? लोगों ने (ज्ञान न होने के बावजूद) कह दिया कि नहीं तेरे लिए छूट नहीं। उसने पानी से स्नान कर लिया, जिस से उसके सर में पानी प्रवेश कर गया और वह मर गया। जब अल्लाह के रसूल सल्ल0 को इस की सूचना मिली तो आपने फरमायाः उन लोगों ने उसे (ग़लत मस्ला बता कर) क़त्ल किया है अल्लाह उनको क़त्ल करे, ज्ञान नहीं था तो पूछ ली होती, अज्ञानता की औषधि सवाल करना ही है।"
 क़ुरआन यह भी कहता हैः
"यदि तुम नहीं जानते हो तो ज्ञान रखने वालों से पूछ लो" (सूरः नहल43)
हाँ सवाल करने से उस समय मना किया गया है जबकि ऐसी चीज़ के सम्बन्ध में सवाल किया जाए जिसकी कोई ज़रूरत न हो। उसी प्रकार सवाल करने का तात्पर्य समझना हो न कि बकवास करना।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

एक संदेह

कल सजीव भाई ने हमारे ब्लाँग के तीन लेखों पर अलग अलग एक ही टिप्पणी डाली जिसका सार यह है कि:
(1) मुस्लिम हर धर्म की समानता की बात करता है परन्तु इस्लाम, क़ुरआन और मुहम्मद सल्ल0 को ऊपर दिखाना चाहता है। क्यों...?
(2) मुहम्मद सल्ल0 की तुलना अन्य धार्मिक ग्रन्थों से मत करो।
(3) क़ुरआन अच्छा ग्रन्थ है परन्तु उसमें समयानुसार कुछ चैंज हो जाए तो अच्छा होता।

यह विचार अधिकांश भाइयों का है इस लिए संक्षिप्त में पोस्ट के रूप में इसका उत्तर देने की कोशिश की जा रही है। आशा है कि मेरी प्रेमवाणी पर चिंतन मनन किया जाएगा।
जी हाँ! मुस्लिम हर धर्म का सम्मान करता है, उनके गुरुओं को भी बुरा भला नहीं कहता लेकिन सत्य को बताने से भी नहीं चुकता क्यों कि यदि सत्य को न बताया जाए तो लोग अंधकार में पड़े रहेंगे।
(1) सत्य धर्म केवल एक ही हो सकता है, ईश्वर जब एक है तो उसका नियम भी एक ही होगा ना...वही तो इस्लाम है जिसे हर युग में संदेष्टाओं ने लोगों से उसका परिचय कराया..., जिसे संदेष्टाओं के अनुयाई अपनी अपनी भाषा में विभिन्न नाम से जानते थे। अरबी में आज उसी धर्म का नाम इस्लाम है। इसी को सनातन धर्म भी कह सकते हैं। इस धर्म का मूल सार है एक ईश्वर की पूजा...और यह पूजा आज के युग में अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 के बताए हुए नियमानुसार होगी। यह कहना भी सही नहीं कि सारे धर्म एक हैं और ईश्वर तक पहुंचना किसी एक धर्म के पालन पर निर्भर नहीं है...ऐसा इस लिए सही नहीं कि ईश्वर एक है तो सम्पर्क मात्र उसी से होना चाहिए...और उस तक पहुंचने का वही रास्ता है जिसे उसने स्वयं बता दिया है...और एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक सीधी लाइन एक ही हो सकती है, यदि इनसान ईश्वर को संसार का बनाने वाला मानता है तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह शासक भी है और शासक के आज्ञापालन का नियम और क़ानून एक ही हो सकता है।

(2) आपका कहना कि मुहम्मद को मुहम्मद ही रहने दो उनके समर्थन के लिए अन्य धार्मिक ग्रन्थों का हवाला न पेश करो... तो इस सम्बन्ध में जानने की बात यह है कि वह अन्तिम अवतार हैं... जिनके आने की भविष्यवाणी केवल हिन्दू ग्रन्थों ही नहीं अपितु प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थों ने की थी। क्योंकि ईश्वर ने एक लाख चौबीस हज़ार संदेष्टाओं को अलग अलग देशों में मात्र इस लिए भेजा था कि उस समय मानव अलग अलग टोलियों में बटे हुए थे, यातायात के साधन नहीं थे, एक देश का दूसरे देश से सम्पर्क नहीं था...एक दूसरे की भाषा को सीखने का प्रचलन भी नहीं था। अतः आवश्यकता थी कि ईश्वर मानव मार्गदर्शन हेतु हर भाषा तथा हर देश में अलग अलग संदेष्टा भेजे...परन्तु सब का संदेश एक ही रहा और सारे संदेष्टाओं ने अपने अपने अनुयाइयों को अन्तिम अवतार के आने की सूचना भी दी जो अब तक उनके ग्रन्थों में मौजूद है। जब सातवी शताब्दी ईसवी में भौतिक, सामाजिक और राजनीतिक उन्नति ने दुनिया को एक कर दिया तो सब से अन्त में ईश्वर ने मुहम्मद सल्ल0 पर अन्तिम संदेश उतारा। इसी लिए वह जगत-गरु हैं, सारे धर्मों के गुरू।
मेरे भाई! निष्पक्ष हो कर इस्लाम का अध्ययन करने की ज़रूरत है पता चल जाएगा कि जिसका हम विरोद्ध करने बैठे हैं यह स्वयं हमारी धरोहर है। हम आपके शुभचिंतक हैं,स्वार्थी नहीं, हमें इस से आखिर क्या लाभ होने वाला है, बस हमें सहानुभूति प्रिय है, सच्ची हमदर्दी का हक़ अदा करना हमारा कर्तव्य है। हमारा काम पहुंचा देना है मानना न मानना आपके एख्तियार में है।

(3) कुरआन ईश्वर की वाणी है यह मानव रचना नहीं, न हो सकता है, क्योंकि आज तक क़ुरआन स्वयं चैलेंज कर रहा है (यदि तुम क़ुरआन के सम्बन्ध में संदेह में पड़े हो तो उसके समान एक सूरः ही ले आओ यदि तुम सच्चे हो ) (2:23) पर इतिहास साक्षी है कि आज तक कोई क़ुरआन के समान न एक टूकड़ा बना सका है और न बना सकता है। जबकि मुहम्मद सल्ल0 जिन पर क़ुरआन उतरा न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 की बातें जिनको हदीस कहा जाता है उनमें और क़रआन में आसमान और ज़मीन का अंतर है। तात्पर्य यह कि क़ुरआन कोई मानव रचना नहीं कि उसमें समयानुसार परिवर्तन करने की आवश्यकता पड़े क्यों कि इंसान अपने युग के अनुसार सोचता है इसी लिए मानव रचित ग्रन्थों में इसकी आवश्यकता पड़ सकती है लेकिन क़ुरआन उस ईश्वर की वाणी है जो स्वयं संसार का सृष्टा है। सृष्टा ही सृष्टि की आवश्यकताओं से भलीभांति अवगत होता है। फिर आज तक इसका एक एक शब्द भी सुरक्षित है।

आपका यह संदेह कि यदि क़ुरआन ईश्वर की वाणी होता तो बिस्मिमिल्लाह से शुरू न किया जाता...जिसका अर्थ होता है शुरू करता हूं अल्लाह के नाम से... तो इसका उत्तर यह है कि यहाँ ईश्वर ने अपने शब्दों में मानव को सिखाया है कि उसकी प्रशंसा कैसे की जाए ताकि मानव ईश्वर के बताए हुऐ नियमानुसार ईश्वर की प्रशंसा करे। शायद मेरी बात स्पष्ट है। ईश्वर की आप पर दया हो।

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

एक प्रार्थना, संदेहों का निवारण

यह एक प्रार्थना है, अनुरोध है, गुज़ारिश है साम्प्रदाइकता के सदस्यों से! क्योंकि मैं भी एक भारतीय हूँ। भारत की धरती से प्यार करता हूं, इस पावन धरती की स्वतंत्रता में अपने पूवर्जों के बलिदान हमें याद हैं। फिर इतिहास ने यह भी देखा है कि हमने अपने देश में शताब्दियों से अनेकता में एकता का प्रदर्शन किया है। हर धर्म एवं पथ के मानने वाले शान्ति के साथ इस धरती पर रहते आ रहे हैं।
इस नाते मैं अपनी भावना जो दिल की गहराई से निकली हुई है साम्प्रदाइकता के सदस्यों के नाम पेश करना चाहता हूं। शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बात
आपने मुम्बई में रहने वाले यूपी बिहार के लोगों को मुम्बई से निकालने की योजना बनाई, पूना के लोहगाँव के मुसलमानों को आपने जन्म-भूमि से निकलने पर विवश किया। औऱ अब एक नया शोशा यह छौड़ा है कि (मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहना छोड़ दें और भारत को दारुल हर्ब भी न कहें)
प्रिय बन्धुओ! मैं यही समझता हूं कि आपको मनवता से प्यार है। इस नाते आपने शत्रुता में यह बात न कही होगी, शायद यह आपत्ती अज्ञानता के कारण है। अतः यदि आपने ऐसा बयान अज्ञानता के कारण दिया है तो इसका निवारण किए देता हूं।
हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहींजहां तक भारत को दारुल हर्ब कहने की बात है तो कोई मुसलमान अथवा इस्लामी विद्बान हिन्दुस्तान को दारुल हर्ब नहीं कहते। सब से पहले दारुल हर्ब क्या है इसे समझ लें। दारुल हर्ब वह धरती है जहां मुलमानों के लिए धार्मिक किसी प्रकार का काम करना वर्जित हो। वहां हर समय मुसलमान अपने जान तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में चिंतित हों। और ऐसा मुसलमानों के लिए भारत में नहीं है।
दूसरी बात यह कि दारुल हर्ब को अर्थ युद्ध करने का स्थान नहीं। बल्कि जैसा कि मैंने कहा कि वह देश जहां गैर-मुस्लिम मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हों, और मुसलमानों को वहाँ कोई शक्ति प्राप्त न हो।
इस अर्थ को सामने रखें और स्वंय सोच कर देखें कि मुलममानों के लिए भारत आखिर दारुल- हर्ब कैसे होगा? यही कारण है कि जब मेडिया में यह चर्चा आम हुई लो मुस्लिम समितियों की ओर से फत्वा भी आया कि हिन्दुस्तान दारुल-हर्ब नहीं।
जैसे दारुल-उलूम दिउबंद तथा विभिन्न मुस्लिम विद्वानों ने बयान दिया कि हिन्दुस्तान दारुल हर्ब नहीं और न कभी हो सकता है।
ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहना
जहां तक ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कहने की बात है तो यह याद रखें कि कोई भी मुलमनान किसी गैर-मुस्लिम को काफिर नहीं कहता। बल्कि काफिर कह कर पुकारने से मुहम्मद सल्ल0 ने मना किया है। दूसरी बात यह कि काफिर का अर्थ क्या होता है? उस पर भी ग़ौर करके देख लीजिए काफिर अरबी शब्द है जिसका हिन्दी अनुवाद करें को होगा(अमुस्लिल, अथावा गैर-मुस्लिम) अग्रेज़ी अनुवाद करें तो होगा(Non Muslim) अब आप ही बताएं कि एक व्यक्ति या तो मुस्लिम होगा अथवा गैर-मुस्लिम, तीसरी कोई संज्ञा नहीं। यदी कोई गैर-मुस्लिम होना पसंद न करता हो तो वह मुस्लिम बन जाए। समस्या का समाधान बस इसी में है। इस सम्बन्ध में लीजिए डा0 ज़ाकिर नाइक का उत्तर भी पढ़ लीजिए
(काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है- अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस।)

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

काफिर कह कर गाली क्यों ?

मुसलमान ग़ैर मुस्लिमों को काफिर कह कर गाली क्यों देते हैं ?
उत्तर : काफिर अरबी भाषा का शब्द है जो कुफ्र से निकला है इस शब्द का अर्थ है छुपाना, इनकार करना और रद्द करना अर्थात ऐसा व्यक्ति जो इस्लामी आस्था का इनकार करे अथवा उसे रद्द कर दे उसे इस्लाम में काफिर कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति इस्लाम के ईश्वरीय कल्पना का इनकार कर दे वह काफिर कहलाएगा। यदि हमें इस शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना होगा तो कहूंगा Non Muslim अर्थात जो व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार नहीं करता वह Non Muslim है और अरबी में कहा जाएगा कि वह काफिर है-
अतः यदि आप यह मुतालबा करते हैं कि Non Muslim को काफिर न कहा जाए तो यह किस प्रकार सम्भव होगा ? यदि कोई गैर मुस्लिम यह मुतालबा करे कि मुझे काफिर न कहा जाए अर्थात ग़ैर मुस्लिम न कहा जाए तो मैं यही कह सकता हूँ कि श्रीमान! आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो स्वयं आपको ग़ैर-मुस्लिम अर्थात काफिर कहना छोड़ दूंगा क्योंकि काफिर और ग़ैर-मुस्लिम में कोई अतंर तो है नहीं, यह तो सीधा सीधा शब्द का अरबी अनुवाद Non Muslim है और बस। ( डा0 ज़ाकीर नाइक )

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

टैगोर ने कहा


महाकवि टैगोर के साथ एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे मौलाना सय्यद सुलैमान नदवी, इस्लाम के इतिहासकार, इन दोनों महान विद्वानों को एक साथ देख कर किसी व्यक्ति ने यूं प्रश्न कर दिया कि:
" आज इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों न फैल रहा है जितनी तेज़ी से मुहम्मद साहब और उनके बाद के युग में फैला ?"
सय्यद साहिब ने टैगोर से इस प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना की, तब टैगोर ने बताया कि:
" तब सत्य धर्म की अच्छाइयों और भलाइयों को जानने के लिए लोगों को पुस्तकालयों का रुख़ नहीं करना पड़ता था, वह हर मुसलमान के जीवन ही में मौजूद था।"
अर्थात् शुरू ज़माने में लोग मुसलमानों के व्यवहार को देख कर सच्चे धर्म का पता लगा लेते थे कि जिनके व्यवहार इतने अच्छे होंगे उनका धर्म कितना अच्छा होगा, लेकिन आज लोगों को इस्लाम पुस्तकों में ढूंढने की ज़रूरत पड़ती है और वही इस्लाम की सच्चाई को जानने में सफल होगा जो इस्लाम का अध्ययन करेगा।
क्या हम मुसलमान टैगोर की बात पर ध्यान देंगें ? जी हाँ। आज सब से बड़ी बाधा हमारे देशवासियों के लिए कुछ मुसलमानों के घृणित कर्तव्य हैं। आज वे अपने ही धर्म इस्लाम का इस कारण विरोध कर रहे हैं कि वे कुछ मुसलमानों को उसके अनुसार चलते नहीं देखते।