शनिवार, 6 सितंबर 2014

इस्लाम धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है

एक सज्जन ने फेसबुक पर लिखा है कि " बुरा ना मानें पर मैंने सुना है कि गैर मुस्लिम को मारो सताओ कुछ भी करो पर उन्हें इस्लाम कबूल करवाओ। जिसे जिहाद का नाम दिया गया है और जो भी इस काम करेगा उसे जन्नत प्राप्त होगी। क्या ये बात सही है ?"
सर्व प्रथम हम आपके स्वभाव की शुद्धता का सम्मान करते हैं कि आपने पूछने से पूर्व " बुरा ना मानें" का शब्द प्रयोग किया, यह आपकी सज्जनता और हृदय की सफाई की दलील है। रही बात आपके प्रश्न की तो यह बात 100 प्रतिशत ग़लत है। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक मानवता को एक माता पिता की संतान और भाई भाई होने की कल्पना देता है। (क़ुरआन 49: 13) दूसरों के भगवानों को बुरा भला कहने से रोकता है। (क़ुरआन 6: 108) इस्लाम ज़बरदस्ती किसी पर थोपने को वर्जित ठहराता है (क़ुरआन 2: 256) और यदि किसी पर थोपा भी गया तो वह इस्लाम की दृष्टि में मुसलमान नहीं हो सकता जब तक अपने दिल से उसे स्वीकार न कर ले। इस लिए लोभ जिहाद की जो बात कही जाती है वह बिल्कुल वेबुनियाद है।"लो जिहाद" की कल्पना मुस्लिम समाज में अब तक हमने कभी नहीं पाई, कुछ लड़के और लड़कियां इस्लाम की सत्यता को जानने के बाद इस्लाम स्वीकार करते हैं तो विदित है कि वह अपनी आस्थानुसार जीवन साथी का चयन करेंगे। इस लिए "लो जिहाद" का नाम लेकर राजनीति करने वालों से हम पूछना चाहते हैं कि जिस हिन्दु परिवार में मुस्लिम लड़कियां हिन्दु बन कर जी रही हैं क्या आप उसको "प्रेम युद्ध" का नाम देंगे ? 

फिर इस्लाम की दृष्टि में किसी एक इनसान की हत्या करना जिसने किसी की जान न ली हो न धरती में फसाद मचाया हो सारी मानवता की हत्या करने के समान है। (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो) (क़ुरआन 5: 32) और इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद जी ने कहाः जिसने किसी एक गैरमुस्लिम की हत्या कर दी जो इस्लामी देश में शान्ति के साथ रहता था तो वह महाप्रलय के दिन स्वर्ग की सुगन्ध भी न पा सकेगा। (सही बुख़ारी 3166) इस से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस्लाम मानवता की रक्षा पर कितान बल देता है। 
और इस्लाम में जिहाद की अनुमति वास्तव में फसाद और अत्याचार को ख़त्म करने के लिए दी गई है जिस से समाज में शान्ति पैदा होती और बुराइयां समाप्त होती हैं।(क़ुरआन 22: 39)
लेकिन बुरा हो शत्रुता तथा गंदी राजनिती का कि कुछ लोग इस्लाम दुश्मनी में जो चाहते हैं अपनी ज़बान से बक देते हैं। मैं चैलेंज के साथ कहता हूं कि जो व्यक्ति भी इस्लाम का विशाल दृदय से अध्ययन करेगा उसकी सत्यता, उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किए बिना नहीं रह सकता।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

देश प्रेम इस्लाम के दर्पण में



अपनी मातृभूमि से प्रेम, स्नेह और मुहब्बत एक ऐसी प्राकृतिक भावना है जो हर इंसान बल्कि हर ज़ीव में पाई जाती है। जिस धरती पर मनुष्य पैदा होता है, अपने जीवन के रात और दिन बिताता है, जहां उसके रिश्तेदार सम्बन्धी होते हैं,वह धरती उसका अपना घर कहलाती है, वहाँ की गलयों, वहाँ के दरो-दीवार, वहां के पहाड़,घाटियां, चट्टानें,जल और हवाएं, नदी नाले, खेत खलयान तात्पर्य यह कि वहां की एक एक चीज़ से उसकी यादें जुड़ी होती हैं। जहां उसके दोस्तों, माता पिता, दादा दादी का प्यार पाया जाता है। 

प्रवासी होने के नाते हमें इसका सही अनुभव है। किसी को यदि अपने देश के किसी कोने में कमाने के लिए जाना होता है तो उसका इतना दिल नहीं फटता जितना एक प्रवासी का फटता है जब विदेश जा रहा होता है। यह देश से प्राकृतिक प्रेम का ही परिणाम है कि उसे छोड़ते समय हमारी स्थिति दयनीय होती है। इसी लिए जो लोग देश से विश्वासघात करते हैं उन्हें कभी अच्छे शब्दों से याद नहीं किया जाता बल्कि दिल में उनके खिलाफ हमेशा नफरत की भावनाएं पैदा होती हैं। उसके विपरीत जो लोग देश के लिए बलिदान देते हैं उनके जाने के बाद भी लोगों के हृदय में वह जीवित होते हैं मातृभूमि से प्रेम की इस प्राकृतिक भावना का इस्लाम न केवल सम्मान करता है अपितु ऐसा शान्तिपूण वातावरण प्रदान करता है जिसमें रह कर मानव अपनी मातृभूमि की भली-भांति सेवा कर सके।

मुहम्मद सल्ल. को आपके शत्रुओं ने जब अपने देश और मातृभूमि से निकलने पर विवश किया तो आपने मक्का छोड़ते समय अपनी मातृभूमि  को सम्बोधिक करते हुए कहा थाः

ما أطيبك من بلد وأحبك إلي ولولا أن قومي أخرجوني منك ما سكنت غيرك  رواه الترمذي  

“हे मक्का तू कितनी पवित्र धरती है… कितनी प्यारी है मेरी दृष्टि में….यदि मेरे समुदाय ने मुझे यहां से न निकाला होता तो मैं कदापि किसी अन्य स्थान की ओर प्रस्थान न करता।”  (तिर्मिज़ी)

जी हाँ! यह वाक्य उस महान व्यक्ति की पवित्र ज़बान से निकला हुआ है जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल. कहते हैं। और उस सयम निकला था जबकि अपनी मातृभूमि से उन्हें निकाला जा रहा था। मुहम्मद सल्ल. मक्का से न निकलते अगर निकाला न जाता, आपने हर प्रकार की यातनाएं झेलीं पर अपनी मातृभूमि में रहना पसंद किया। परन्तु जब पानी सर से ऊंचा हो गया तो न चाहते हुए भी मक्का से निकलने के लिए तैयार हो गए, जब वहाँ से प्रस्थान कर रहे थे तो विदाई के समय दिल पर उदासी छाई हुई थी। और ज़बान पर उपर्युक्त वाक्य जारी था।

फिर जब मदीना आए तो मदीना में ठहरने के बाद मदीना के लिए इन शब्दों में प्रार्थना कीः

 اللهم حبب إلينا المدينة كما حببت إلينا مكة أو أشد   

”  हे अल्लाह हमारे दिल में मदीना से वैसे ही प्रेम डाल दे जैसे मक्का से है बल्कि उस से भी अधिक। ” (बुख़ारी, मुस्लिम)  

मातृभूमि से प्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होता अपितु हमारी कथनी और करनी में भी आ जाना चाहिए इस में सब से पहले अपनी मातृभूमि की शान्ति और सलामती के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए क्योंकि दुआ में दिल की सच्चाई का प्रदर्शन होता है। इस में  झूठ, अतिशयोक्ति, या पाखंड नहीं होता और अल्लाह के साथ सीधा संबंध होता है। स्वयं अल्लाह के रसूल सल्ल. ने मदीना के लिए दुआ की थी कि “ हे अल्लाह मक्का से मदीना में दो गुनी बर्कत प्रदान कर।” (बुखारी, मुस्लिम)

क़ुरआन में स्वयं इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने प्रार्थना की थी कि हे अल्लाह इस धरती को शान्ति देन्द्र बना और यहाँ के निवासियों को भोजन हेतु विभिन्न प्रकार के फल प्रदान करः

وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَـٰذَا بَلَدًا آمِنًا وَارْزُقْ أَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ آمَنَ مِنْهُم بِاللَّـهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُ إِلَىٰ عَذَابِ النَّارِ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ   ( سورة البقرة 126)

 और याद करो जब इबराहीम ने कहा, “ऐ मेरे रब! इसे शान्तिमय भू-भाग बना दे और इसके उन निवासियों को फलों की रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाएँ।” कहा, “और जो इनकार करेगा थोड़ा फ़ायदा तो उसे भी दूँगा, फिर उसे घसीटकर आग की यातना की ओर पहुँचा दूँगा और वह बहुत-ही बुरा ठिकाना है!”  (अल-बकरः 126)

ईब्राहीम अलै0 ने मक्का में अम्न और रिज़्क़ में वृद्धि के लिए दुआ की जो जीवन सामग्रियों में महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। यदि वह दोनों या उनमें से एक खो जाए तो शान्ति छीन जाती है और देश जीवन सामग्रियों से खाली खाली देखाई देता है।

इस्लाम ने तो देश की शान्ति को भंग करने वालों के लिए सख्त से सख्त सज़ा सुनाई है मात्र इस लिए कि किसी को राष्ट्र में अशान्ति फैलाने का साहस न हो सकेः क़ुरआन ने कहाः

إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّـهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا أَن يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُم مِّنْ خِلَافٍ أَوْ يُنفَوْا مِنَ الْأَرْضِ ۚ ذَٰلِكَ لَهُمْ خِزْيٌ فِي الدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ ﴿سورة المائدة  33

 जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से लड़ते है और धरती के लिए बिगाड़ पैदा करने के लिए दौड़-धूप करते है, उनका बदला तो बस यही है कि बुरी तरह से क़त्ल किए जाए या सूली पर चढ़ाए जाएँ या उनके हाथ-पाँव विपरीत दिशाओं में काट डाले जाएँ या उन्हें देश से निष्कासित कर दिया जाए। यह अपमान और तिरस्कार उनके लिए दुनिया में है और आख़िरत में उनके लिए बड़ी यातना है  (माइदा 33)

इस्लाम हर उस काम का आदेश देता है जिस से राष्ट्र के लोगों के बीच सम्बन्ध दृढ़ रहे। इस्लाम ने मातृभूमि से प्यार के अंतर्गत ही रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है। इसे बहुत बड़ी नेकी बताया गया है और उसे नष्ट करना फसाद का कारण सिद्ध किया है। सम्बन्ध बनाने की सीमा इतनी विशाल है कि हर व्यक्ति के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया गयाः इसी लिए मुहम्मद सल्ल. ने फरमायाः

لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّى يُحِبَّ لِأَخِيهِ مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ   رَوَاهُ الْبُخَارِيُّ

तुम में का एक व्यक्ति उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक अपने भाई के लिए वही न पसंद करे जो अपने लिए पसंद करता हैं। ( सहीह बुख़ारी)

बल्कि इस्लाम ने विश्व बंधुत्व की कल्पना देते हुए सारे मानव को एक ही माता पिता की संतान सिद्ध किया और उनके बीच हर प्रकार के भेद भाव का खंडन करते हुए फरमाया कि ईश्वर के निकट सब से बड़ा व्यक्ति वह है जो अल्लाह का सब से अधिक भय रखने वाला हो, अल्लाह का आदेश हैः

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّـهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ ﴿ سورة الحجرات 13﴾

  ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है (सूरः अह-हुजरात 13

इसी लिए मुहम्मद सल्ल. ने आदेश दिया कि:

 مَنْ ظَلَمَ مُعَاهَدًا، أَوِ انْتَقَصَهُ حَقًّا، أَوْ كَلَّفَهُ فَوْقَ طَاقَتِهِ، أَوْ أَخَذَ مِنْهُ شَيْئًا بِغَيْرِ طِيبِ نَفْسٍ مِنْهُ؛ فَأَنَا حَجِيجُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ( أبو داود:   السلسلة الصحيحة  445)

” जिस किसी ने किसी अम्न से रहने वाले गैर-मुस्लिम पर अत्याचार किया, या उसके अधिकार में किसी प्रकार की कमी की, या उसकी शक्ति से अधिक उस पर काम का बोझ डाला, या उसकी इच्छा के बिना उसकी कोई चीज़ ले ली तो में कल क्यामक के दिन उसका विरोधी हुंगा। ( सुनन अबू दाऊद, अल-सिलसिला अल-सहीहा 445)

उस से आगे बढ़ कर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह फ़रमाया किः

 مَنْ قَتَلَ مُعَاهَدًا لم يَرِحْ رَائِحَةَ الْـجَنَّةِ  ( رواه البخاري :  2995)

” जिसने किसी अम्न से रहने वाले गैर-मुस्लिम  की हत्या की वह जन्नत की खुशबू तक न पा सकेगा।” (सहीह बुख़ारी 2995)

बल्कि इस्लाम ने पशु पक्षी, पौधे, और पत्थर सब के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दियाः अल्लाह के रसूल सल्ल. ने फरमाया कि एक महिला को एक बिल्ली के कारण अज़ाब दिया गया। उसने बिल्ली को बांध रखा था, उसे न खिलाती थी और न खोलती थी कि ज़मीन के कीड़े मकूड़े खा लेती, जिस से वह मर गई अतः इसके कारण वह नरक में गई। (बुखारी, मुस्लिम) आप सल्ल. ने फरमाया कि “यदि क़यामत का समय आ जाए और तुम में से किसी के हाथ में खजूर के पौधे हों और वह महा-प्रलय के बरपा होने से पहले पौधे को लगा सकता हो तो लगा दे क्योंकि उसे इसके बदले पुण्य मिलेगा।” (सही जामिअ़ हदीस संख्या 1424).

स्वतंत्रता और इस्लामः 

अल्लाह ने सम्पूर्ण सृष्टी को स्वतंत्र पैदा किया है। अल्लाह को यह बात कदापि प्रिय नहीं कि उसकी सृष्टि किसी और की दासता में रह कर जीवन बिताए। कारण यह है अल्लाह सृष्टा है तो वह अपनी प्रत्येक सृष्टि से दासता का मुतालबा स्वयं अपने लिए करता है और अपने दासों को अपनी दासता में देखना चाहता है। क्योंकि उसने सम्पूर्ण जीव-जातियों को पैदा ही नहीं किया है वरना उन पर विभिन्न प्रकार का उपकार भी किया है। तथा उन सब का संरक्षण भी कर रहा है।
जब उसी ने संसार को रचाया, उसी ने हर प्रकार का अपकार किया, वही संसार को चला रहा है तथा संसार की अवधि पूर्ण होने के पश्चात वही संसार को नष्ट भी करेगा तो मानव को प्राकृतिक रूप में उसी की दासता की छाया में जीवन भी बिताना चाहिए। और उसके अतिरिक्त हर प्रकार की दासता को नकार देना चाहिए।
स्वतंत्रता किनता महत्वपूर्ण उपकार है यह उस से पूछिए जो स्वतंत्र वातावरण में जीवन बिताने के बाद दासता की ज़ंजीरो में जकड़ा हुआ हो। इसी लिय इस्लाम ने स्वतंत्रता पर बहुत बल दिया, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “तहरीके आजादी” पृष्ठ 14 में लिखा है :

” इनसानों को मानव की दासता से मुक्ति दिलाना इस्लाम का ईश्वरीय उद्देश्य है।”

मौलाना अपनी दूसरी पुस्तक “क़ौलेफस्ल” पृष्ठ 50 में लिखते हैं:

” इस्लाम ने ज़ाहिर होते ही यह घोषणा किया कि सत्य शक्ति नहीं बल्कि स्वयं सत्य है, और ईश्वर के अतिरिक्त किसी के लिए उचित नहीं ईश्वर के दासों को अपना अधीन और दास बनाए।”
मौलाना आज़ाद ने मुसलमानों का नेतृत्व करते हुए मात्र दो ही रास्ते अपनाने की दावत दी है। आज़ादी या मौत, अतः वह पूरे निर्भयता से कहते हैं:

“इनसानों के बुरे व्यवहार से किसी शिक्षा की वास्तविकता नहीं झुटलाई जा सकती। इस्लाम की शिक्षा उसके ग्रन्थ में मौजूद है। वह किसी स्थिति में भी वैध नहीं रखती कि स्वतंत्रता खो कर मुसलमान जीवन बिताए। मुसलमानों को मिट जाना चाहिए। तीसरा रास्ता इस्लाम में कोई नहीं” (क़ौले-फैसल, 63-64)

जी हाँ ! इस्लाम कदापि नहीं चाहता कि इनसान दास बन कर जीवन बिताए। 

स्वतंत्रता अभियान और मुसलमानः

भारत का इतिहास साक्षी है कि जब तन के गोरे और मन के काले अंग्रेज़ों ने भारत में व्यवसाय के नाम अपना क़दम जमाना चाहा तो सर्वप्रथन इस्लामी विद्वानों ने अंग्रेज़ों के विरोद्ध युद्ध करने की घोषणा की थी। सब से पहले शाह अब्दुल अज़ीज़ दिहलवी ने अंग्रेज़ों से युद्ध का फतवा दिया और फिर इस सोच को भारत के कोने कोने में फैलाया गया, 1857 से पहले मुसलमान ही इस अभियान में शरीक थे, बाद में मुस्लिम विद्वानों ने ग़ैरमुस्लिम भाइयों तक भी अपनी भावनाएं पहुंचाईं यहां तक कि स्वतंत्रता का अभियान देश के कोने कोने में चलने लगा। अंततः 1947 में हमारा भारत स्वतंत्र हो गा। मुसलमानों ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए जो बलिदान दिया है वह भारत के इतिहास का एक रौशन बाब है।

चप्पा चप्पा बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने हैं।

आज भी हमें अपने देश से प्रेम है और उसके लिए हम कटने मरने तक की भावना रखते हैं। परन्तु भारत में साम्प्रदाइकता का बुरा हो कि आज़ादी के बाद ही कुछ लोग ऐसे पैदा हुए जिन्होंने अंग्रेज़ों की पालीसी “फूट डोलो हुकूमत करो” को अपनाते हुए देश में घृणा फैलाने की सम्भवतः कोशिश की, मुसलमानों को हमेशा देश में सौतेला सिद्ध करने का प्रयास करते रहे, और आज तक कर रहे हैं।

हम देश प्रेमी हैं देश भक्त नहीं:

कुछ लोग पूछते हैं कि आप अपने देश से अधिक प्यार करते हैं अथवा अपने धर्म से…? ऐसे लोगों से हम कहना चाहेंगे कि आप हम से मानो यह प्रश्न कर रहे हैं कि तुम अपने बाप का बेटा हो या मां का। उत्तर स्पष्ट है कि मैं अपने बाप का भी बेटा हूं और मां का भी। उसी प्रकार मुसलमान होने के नाते मेरा धर्म इस्लाम है और भारतीय होने के नाते मेरा देश भारत है.. इस लिए किसी के देश प्रेमी होने पर संदेह करना स्वयं को देशद्रोंही सिद्ध करना है। हम अपने देश से इतना प्यार करते हैं कि उसके लिए जान देने के लिए भी तैयार हैं परन्तु इसके बावजूद हम देश प्रेमी ही रहेंगे देश भक्त नहीं हो सकते। क्यों कि भक्ति मात्र एक अल्लाह की होनी चाहिए। भक्ति में उसके साथ अन्य को भागीदार ठहराना वैध नहीं। जिसका राज है उसी का चलना चाहिए, जिस कम्पनी के कर्मचारी हैं उसी का काम होना चाहिए।     

राष्ट्र से प्रेम करने वाला कौनः

राष्ट्र से प्रेम करने वाला वही हो सकता है जो राष्ट्र हित के लिए काम करे, जो प्रेम और स्नेह का वातावरण बनाए, जो बंधुत्व और भाईचारा को बढ़ावा दे। वह देश प्रेमी नहीं हो सकता जो देश की शान्ति को भंग करे, जो देश की एकता का विरोद्ध करे, जो देश में घृणा फैलाए, जो देश की सम्पत्ति का दुर्उपयोग करे। 

राष्ट्र के प्रति हमारा कर्तव्यः

68 वें स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर हमें अपना जाइज़ा लेने की ज़रूरत है कि हमने अब तक अपने देश के लिए क्या किया है। देश की प्रगति में कितना भाग लिया है। जन-कल्याण के लिए क्या क्या है। जाग्रुकता अभियान में किस हद तक भाग लिया है। आज हमारा कर्तव्य बनता है कि भारत की प्रगति हेतु शिक्षा और जन-कल्याण के लिए जो भी भुमिकाएं हो सकती हों देने का वचन दें।   


शनिवार, 8 मार्च 2014

इस्लाम में नारी का महत्व


यदि आप धर्मों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हर युग में महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया गया, हर धर्म में महिलाओं का महत्व पुरुषों की तुलना में कम रहा। बल्कि उनको समाज में तुच्छ समझा गया, उन्हें प्रत्येक बुराइयों की जड़ बताया गया, उन्हें वासना की मशीन बना कर रखा गया। एक तम्बा युग महिलाओं पर ऐसा ही बिता कि वह सारे अधिकार से वंचित रही। यह इस्लाम की भूमिका है कि उसने हव्वा की बेटी को सम्मान के योग्य समझा और उसको मर्द के समान अधिकार दिए गए। क़ुरआन की सूरः बक़रः (2: 228) में कहा गया:

“महिलाओं के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं जैसे मर्दों के अधिकार उन पर हैं।” 

इस्लाम में महिलाओं का बड़ा ऊंचा स्थान है। इस्लाम ने महिलाओं को अपने जीवन के हर भाग में महत्व प्रदान किया है। माँ के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, पत्नी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बेटी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बहन के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, विधवा के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, खाला के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, तात्पर्य यह कि विभिन्न परिस्थितियों में उसे सम्मान प्रदान किया है जिन्हें बयान करने का यहाँ अवसर नहीं हम तो बस उपर्युक्त कुछ स्थितियों में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान पर संक्षिप्त में प्रकाश डालेंगे।

माँ के रूप में सम्मानः 

माँ होने पर उनके प्रति क़ुरआन ने यह चेतावनी दी कि “और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है – उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे – कि ”मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है॥14॥ ” कुरआन ने यह भी कहा कि “तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें ‘उँह’ तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्‍टापूर्वक बात करो॥23॥  और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, “मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।”॥24॥ (सूरः बनीइस्राईल 23-25)  माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने का अन्तिम ईश्दुत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी आदेश दिया, एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सब से ज्यादा अधिकारी कौन है? आप ने फरमायाः तुम्हारी माता, उसने पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारी माता. पूछाः फिर कौन ?  कहाः तुम्हारी माता, पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारे बाप। मानो माता को पिता की तुलना में तीनगुना अधिकार प्राप्त है। अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः अल्लाह की आज्ञाकारी माता-पिता की आज्ञाकारी में है और अल्लाह की अवज्ञा माता पिता की अवज्ञा में है” (तिर्मज़ी)

पत्नी के रूप में सम्मानः 

पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। (निसा4 आयत 19)  और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ”एक पति अपनी पत्नी को बुरा न समझे यदि उसे उसकी एक आदत अप्रिय होगी तो दूसरी प्रिय होगी।” (मुस्लिम) उसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भी फरमायाः “संसार भोग-विलास की चीज़ है और संसार की सब से उत्तम भोग-विलास की सामग्री नेक पत्नी है” (मुस्लिम)

बेटी के रूप में सम्मानः

 मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ”जिसने दो बेटियों का पालन-पोषन किया यहां तक कि वह बालिग़ हो गई वह महाप्रलय के दिन हमारे साथ होगा” (मुस्लिम) आपने यह भी फरमायाः जिसने बेटियों के प्रति किसी प्रकार का कष्ट उठाया और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करता रहा तो यह उसके लिए नरक से पर्दा बन जाएंगी” (मुस्लिम)

बहन के रूप में सम्मानः 

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः जिस किसी के पास तीन बेटियाँ हों अथवा तीन बहनें हों उनके साथ अच्छा व्यवहार किया तो वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा” (अहमद)

विधवा के रूप में सम्मानः

 इस्लाम ने विधवा की भावनाओं का बड़ा ख्याल किया बल्कि उनकी देख भाल और उन पर खर्च करने का बड़ा पुण्य बताया है। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ”विधवाओं और निर्धनों की देख रेख करने वाला ऐसा है मानो वह हमेशा दिन में रोज़ा रख रहा और रात में इबादत कर रहा है।” (बुखारी)

खाला के रूप में सम्मानः

 इस्लाम ने खाला के रूप में भी महिलाओं को सम्मनित करते हुए उसे माता का पद दिया। हज़रत बरा बिन आज़िब कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः ”खाला माता के समान है।” (बुखारी)