शनिवार, 6 सितंबर 2014

इस्लाम धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है

एक सज्जन ने फेसबुक पर लिखा है कि " बुरा ना मानें पर मैंने सुना है कि गैर मुस्लिम को मारो सताओ कुछ भी करो पर उन्हें इस्लाम कबूल करवाओ। जिसे जिहाद का नाम दिया गया है और जो भी इस काम करेगा उसे जन्नत प्राप्त होगी। क्या ये बात सही है ?"
सर्व प्रथम हम आपके स्वभाव की शुद्धता का सम्मान करते हैं कि आपने पूछने से पूर्व " बुरा ना मानें" का शब्द प्रयोग किया, यह आपकी सज्जनता और हृदय की सफाई की दलील है। रही बात आपके प्रश्न की तो यह बात 100 प्रतिशत ग़लत है। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक मानवता को एक माता पिता की संतान और भाई भाई होने की कल्पना देता है। (क़ुरआन 49: 13) दूसरों के भगवानों को बुरा भला कहने से रोकता है। (क़ुरआन 6: 108) इस्लाम ज़बरदस्ती किसी पर थोपने को वर्जित ठहराता है (क़ुरआन 2: 256) और यदि किसी पर थोपा भी गया तो वह इस्लाम की दृष्टि में मुसलमान नहीं हो सकता जब तक अपने दिल से उसे स्वीकार न कर ले। इस लिए लोभ जिहाद की जो बात कही जाती है वह बिल्कुल वेबुनियाद है।"लो जिहाद" की कल्पना मुस्लिम समाज में अब तक हमने कभी नहीं पाई, कुछ लड़के और लड़कियां इस्लाम की सत्यता को जानने के बाद इस्लाम स्वीकार करते हैं तो विदित है कि वह अपनी आस्थानुसार जीवन साथी का चयन करेंगे। इस लिए "लो जिहाद" का नाम लेकर राजनीति करने वालों से हम पूछना चाहते हैं कि जिस हिन्दु परिवार में मुस्लिम लड़कियां हिन्दु बन कर जी रही हैं क्या आप उसको "प्रेम युद्ध" का नाम देंगे ? 

फिर इस्लाम की दृष्टि में किसी एक इनसान की हत्या करना जिसने किसी की जान न ली हो न धरती में फसाद मचाया हो सारी मानवता की हत्या करने के समान है। (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो) (क़ुरआन 5: 32) और इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद जी ने कहाः जिसने किसी एक गैरमुस्लिम की हत्या कर दी जो इस्लामी देश में शान्ति के साथ रहता था तो वह महाप्रलय के दिन स्वर्ग की सुगन्ध भी न पा सकेगा। (सही बुख़ारी 3166) इस से आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस्लाम मानवता की रक्षा पर कितान बल देता है। 
और इस्लाम में जिहाद की अनुमति वास्तव में फसाद और अत्याचार को ख़त्म करने के लिए दी गई है जिस से समाज में शान्ति पैदा होती और बुराइयां समाप्त होती हैं।(क़ुरआन 22: 39)
लेकिन बुरा हो शत्रुता तथा गंदी राजनिती का कि कुछ लोग इस्लाम दुश्मनी में जो चाहते हैं अपनी ज़बान से बक देते हैं। मैं चैलेंज के साथ कहता हूं कि जो व्यक्ति भी इस्लाम का विशाल दृदय से अध्ययन करेगा उसकी सत्यता, उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किए बिना नहीं रह सकता।

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वो तो नज़र ही आ रही हैष
--
दर्म मज़हब कोई बुरा नहीं होता है।
बस लोगों की मानसिकता की बात है।

safat alam taimi ने कहा…

डा. जी आपका हमारे पेज पर हार्दिक स्वागत है। रही बात इस्लाम की तो बड़े खेद की बात है कि मेडिया उसकी सच्चाई को छुपाता और उस पर विभिन्न प्रकार के आरोप डाल कर मानव समाज के समक्ष उसे प्रस्तुत करता है। कारणवश लोग इस्लाम के सम्बन्ध में संदेह में पड़े हुए हैं। साहसी वही है जो एक बार विशाल हृदय के साथ इसका अध्ययन कर के देखे। एक बार फिर धन्यवाद डा. रूपचन्द्र जी।