रविवार, 4 दिसंबर 2011

अपना काम करते रहिए



अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल. के प्रवचनों में से एक प्रवचन लेकर आज हम आप की सेवा में उपस्थित हुए हैं, हम आपसे अनुरोध करेंगे कि आप इस प्रवचन पर चिन्तन-मनन करें और देखें कि संक्षिप्त शब्द में हिकमत और तत्वदर्शिता का कैसा खज़ाना इसमें समो दिया गया है। 
प्रवचन यह हैः "यदि क़यामत का समय आ जाए और तुम में से किसी के हाथ में खजूर के पौधे हों और वह महा-प्रलय के बरपा होने से पहले पौधे को लगा सकता हो तो लगा दे क्योंकि उसे इसके बदले पुण्य मिलेगा।"    (सही जामिअ़ हदीस संख्या 1424).

सुनने वालों को मुहम्मद सल्ल. के मुख से यह वाक्य सुनने की अपेक्षा भी मुश्किल से हो सकती थी. उन्हें यह उम्मीद हो सकती थी कि मुहम्मद सल्ल. जो दुनिया में इसलिए भेजे गए थे कि लोगों को परलोक की याद दिलाएँ, इस के लिए काम करने पर उभारें और उन्हें यह निमंत्रण दें कि महा-प्रलय के भयानक दिन की तैयारी के लिए अपने दिलों को पाक साफ करें, यह बताएं कि ऐसे गम्भीर अवसर पर लोगों को जल्दी से अपने पापों की क्षमा मांगनी चाहिए यदि आप यह कहते तो आश्चर्य की कोई बात न होती.
लेकिन मुहम्मद सल्ल. ने इस प्रवचन में ऐसा कुछ नहीं कहा, अपितु ऐसी बात कही जिसकी सुनने वाले उम्मीद भी नहीं कर सकते थे. आपने यह कहा कि अगर किसी के हाथ में कोई खजूर का कोई पौधा हो और वह क़यामत से पहले उसे लगा सकता हो तो अवश्य लगा दे क्योंकि उस पर भी उसे पुण्य मिलेगा।

ज़रा सोचिए! खजूर के पौधे लगाने का निर्देश दिया जा रहा है जो कई वर्षों बाद फल दे सकता है और क़ियामत बस कुछ छणों में संसार को नष्ट- भ्रष्ट कर देने वाली है!! क्या ऐसी बात इस्लाम के संदेष्टा के पवित्र मुंह से निकल सकती है....जी हाँ! इस संक्षिप्त से वाक्य में न जाने कितने अर्थ निहित हैं:
1. सबसे पहले यह प्रवचन इस तथ्य को उजागर करता है कि परलोक का रास्ता दुनिया के रास्ते से होकर गुज़रता है। दुनिया और परलोक के रास्ते भिन्न भिन्न नहीं। दोनों एक ही रास्ते के दो किनारे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रलोक सुधारने के लिए संसार त्याग कर दो, सांसारिक भोगों से कट जाओं। दीन और दुनिया के रास्ते अलग अलग न करो अपितु दोनों रास्ता एक ही है, और वह है अल्लाह की ओर ले जाने वाला रास्ता।
2. इस हदीस से यह पाठ भी मिलता है कि धरती से एक क्षण के लिए भी परिणाम से निराशा के कारण काम नहीं रोकना चाहिए। यहाँ तक कि यदि एक क्षण बाद ही महा-प्रलय आने वाला हो, संसार से मानव जीवन का क्रम ही टूट जाने वाला हो और उसके प्रयास का कोई प्रत्यक्ष परिणाम न निकल सकता हो, तब भी लोगों को काम नहीं रोकना चाहिए, उन्हें भविष्य को आशा के साथ देखना चाहिए।
इस प्रवचन के आधार पर हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम निरंतर काम करते रहें और थकने का नाम न लें। हम पौधे लगाएँ चाहे महा-प्रलय अगले ही क्षण आने वाला हो। हम यह न सोचें कि हम इस से लाभ न उठा सकेंगे। हमारा काम है करते रहना, परिणाम के चक्कर में न पड़ना।

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

nice Post

दिनेश आस्तिक ने कहा…

सफत जी नमस्कार।
ज्ञान-वर्धक पोस्ट के लिये बधाई।
यह मेरी समझ से परे है कि हम मनुष्य हर बात
एवं घटना को धार्मिक चश्में देखकर उसे धार्मिक
रंग में रंग देते हैं।
मेरा मानना है कि केवल एक धर्म मानवता,
एक ईश्वर प्रकृति, एक जाति भारतीयता तथा
एक मात्र धार्मिक पुस्तक संविधान है।
धर्म आस्था एवं विश्वास का नहीं, अपितु तर्क,
बुद्धि एवं सत्य का विषय है। जिन धर्मों की हम
बात करते हैं, वस्तुतः वे धर्म नहीं, अपितु
सम्प्रदाय हैं। तथा जिस ईश्वर का उल्लेख होता है,
वह मात्र मानवीय कल्पना है।
मेरा उद्देश्य किसी का हृदय दुखाना नहीं है,
सत्य जानने की जिज्ञासा है। कृपया मेरे blog
पर आकर मार्ग-दर्शन मुझे अनुग्रहीत करें।
http://dineshkranti.blogspot.com/

safat alam taimi ने कहा…

दिनेश आस्तिक जी! सर्वप्रथम हम आपके आभारी हैं कि आपने हमारे ब्लौग का दर्शन किया और अपना परम विचार भी छोड़े। बहुत बहुत धन्यवाद
आपका यह कहना कि ("यह मेरी समझ से परे है कि हम मनुष्य हर बात
एवं घटना को धार्मिक चश्में देखकर उसे धार्मिक
रंग में रंग देते हैं।" ) अर्थात आपने इस विषय को धर्म से क्यों जोड़ दिया? तो ऐसा इस लिए कि मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूं। और धर्म एक इनसान की प्रकृति में शामिल है। हम सब का पैदा करने वाला ईश्वर जो एक है जिसके समान कोई नहीं, न उसका कोई भागीदार है, उसने मानव की रचना करने के बाद उसे यूं ही नहीं छोड़ दिया कि जैसे चाहे अपनी इच्छानुसार जीवन बिताए अपितु मानव में से ही क्रान्तिकारी मनुष्यों द्वारा उनका मार्गदर्शन भी किया, जिनको अवतार अथवा संदेष्टा कहते हैं, वह हर युग और हर देश में आते रहे, जिनकी संख्या एक लाख तक पहुंचती है। उनसको अपने अपने देश तथा समाज हेतु भेजा जाता था। परन्तु जब सातवीं शताब्दि ईसवी में यातायात के साधन ठीक हो गई तथा एक देश का सम्पर्क दूसरे देश से होने लगा तो सम्पूर्ण संसार हेतु अन्तिम अवतार भेजे गए जिन पर क़ुरआन का अवतरण हुआ जो सारे मानव को सम्बोधन करता हैं। उन्हें हम मुहम्मद कहते हैं। कुरआन लोगों को विभिन्न जातियों में विभाजित नहीं करता अपितु एकत्र करता है। उसका सार मात्र एक ईश्वर की पूजा और मानव भाई चारा है। क़ुरआन के अनुसार सारे मानव की उत्पत्ति एक ही मानव आदम औऱ हव्वा से हुई है और उन सब का बनाने वाला भी एक ही है। इस प्रकार इस्लाम मानव का धर्म है परन्तु खेद की बात यह है कि अधिक लोग अपने ही परम धर्म से वंचित हो कर इधर उधर भटक रहे हैं। आज ईश्वर का नाम तो सब लेते हैं परन्तु उसे पहचानते बहुत कम लोग हैं। यदि आप विस्तृत में अपनी अमानत की खोज करने के इच्छुक हैं तो हमारे ब्लौग के अन्य लेखों का अध्ययन करें। याद रखें इस्लाम की सारी शिक्षाएं बुद्धिसंगत हैं। धन्यवाद