मंगलवार, 18 नवंबर 2008

इस्लाम नया धर्म नहीं

इस्लाम के सम्बन्ध में आम तौर पर यह कहा जाता है कि यह धर्म सातवी शताब्दी ईसवी में मुहम्मद साहिब का लाया हुआ धर्म है। हालांकि इस्लाम मुहम्मद सल्ल० का लाया हुआ धर्म नहीं और न ही वह इस्लाम के संस्थापक हैं। अधिकांश लोग इसी तथ्य को न समझ सके जिसके कारण यह कहने लगे कि इस्लाम मुहम्मद सल्ल0 का लाया हुआ धर्म है अथवा एक नया धर्म है। हालांकि हर मुसलमान यह जानता मानता तथा इस बात पर आस्था रखता है कि मुहम्मद सल्ल0 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि उसको अन्तम स्वरूप देने वाले हैं। ऐसा ही जैसे किसी एक देश में भारत का राजदूत भेजा जाता है तो राजदूत को अपने आदेश का पालन कराने का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक अपने पद पर आसीन रहे। जब दो साल की अवधि गुज़रने के बाद दूसरा राजदूत आ जाए तो पहला राजदूत अपना आदेश नहीं चला सकता क्योंकि उसकी कार्य-अवधि समाप्त हो चुकी, ऐसा ही ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें वह हर देश और हर युग में भेजे गए उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती हैं, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे तथा तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ती पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं क्यों कि उनकी रचना एक ही ईश्वर ने की है, सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है ( अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु और सतरोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ) पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखों का सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना।
परन्तु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाला तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की संतान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता हैं कि उन्होंने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार किया था तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया
बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया जैसे एक हरकारा (डाक घर का पत्रवाहक ) पत्र ले कर किसी के पास जाए अब उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके पर यदि वह पत्रवाहक को ही पिता समझने लगे और उन्हीं का आदर सम्मान शुरू कर दे तो इसे
जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है ।

14 टिप्‍पणियां:

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

धर्म सनातन होता है. उस का न कोई आदि होता है और न अंत. समय-समय पर कुछ मनुष्य धर्म की शिक्षाओं से भटक जाते हैं और अधर्म के रास्ते पर चल पड़ते हैं. इन को सही रास्ता दिखाने के लिए महापुरुषों का जन्म होता है. कुछ महापुरुष अपनी शिक्षाओं को एक अलग ही धर्म का नाम दे देते हैं. इस्लाम एक ऐसा ही धर्म है.

umeshawa ने कहा…

1300 वर्ष पहले मृत एक उपलब्ध व्यक्ति का ज्ञान जो तथाकथित रुप से कुरान नामक पुस्तक मे लिपीबद्ध है वह आज के मानव को विकसित मानव बनाने मे किसी काम का नही है। श्ब्दो के अर्थ बदल गए है, परिस्थीतीया बदल गई है। अगर हम इस विश्व को एक बेहतर विश्व बनाना चाहते है तो फिर हमे धर्म को किसी व्यक्ति, देश या पुस्तक से जोड कर देखना बंद करना होगा। वह प्रवृति जो मानव को बेहतर मानव बनाती है वही धर्म है। आज फिर मुहम्म्द जैसा कोई जन्म ले मुसल्मानो के बीच तो वह मार डाला जाएगा क्योकी वह बात करेगा रुढी और परम्परा के विरोध मे। और यह कहना की अब कोई प्रबुद्ध पुरुष इस दुनिया मे नही आएगा, यह भ्रम है, मुल्लाओ का कमिनापन है।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

धर्म की व्याख्या जब व्यक्ति अपने सुबिधा के हिसाब से करने लगता है तभी धर्म पर ऊँगली उठने लगती है

आदर्श राठौर ने कहा…

कुतर्क है

talib ने कहा…

assalam alaikum, aap bahut hi achcha kam kar rahe hain.
jazak allah khair.
kabhi fursat ho to deen-dunya ki taraf bhi rukh karen, hamein khushi hogi.
wassalam
allah hafiz

श्यामल सुमन ने कहा…

नहीं समस्या धर्म जगत में, उपदेशक है जड़ उलझन की।
धर्म तो है कर्तव्य आज का, पर गाते वे राग पुराने।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

Amit K. Sagar ने कहा…

ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है. खूब लिखें, खूब पढ़ें, स्वच्छ समाज का रूप धरें, बुराई को मिटायें, अच्छाई जगत को सिखाएं...खूब लिखें-लिखायें...
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आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं.
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अमित के. सागर

safat alam taimi ने कहा…

Suresh Chandra Gupta भाई! आपने बड़ी अच्छी टिप्पणी की है पर इस से इस्लाम निकला हुआ है क्योंकि इस्लाम के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 ने स्पष्ट रूप में कहा कि मैं धर्म संस्थापक नहीं बल्कि अन्तिम संदेष्टा हूं मेरी पूजा मत करना, पूजा केवल उस अल्लाह की करना जिसने तुमको तथा सारे संसार को बनाया है । यही आदेश हर युग में गुरूओं ने दिया था पर हुआ हय कि उनके अनदर मानव ने कुछ चमत्कारियों का अनुभव कर के उनको स्वयं पूज्य मान लिया जैसे श्री राम जी एक एकेश्वरवादी गुरू थे लेकिन उनके मरने के बाद उनको ईश्वर का अवतार मान लिया गया। ऐसा ही हाल दूसरे गुरूओं के साथ हुआ लेकिन उन सारे गुरूओं में केवल मुहम्मद सल्ल0 हैं जिनकी आज पूजा नहीं की जा रही है । यहीं से आप मुहम्मद सल्ल0 तथा उन्य गुरूओं में अंतर देख सकते हैं

Abhishek ने कहा…

'कुरान' अपनी जानकारी के लिए मैंने भी पढ़ी है. सरल शब्दों में तार्किक रूप से अपनी बात रखें तो काफी उपयोगी प्रयास होगा आपका. मैंने कहीं सुना था की 1 लाख 40 हज़ार रसूल इस्लाम में हुए जिनमें 4 पर ही 'पुस्तकें' इजहार की गयीं. क्या यह सत्य है? स्वागत मेरे ब्लॉग पर भी.

संगीता पुरी ने कहा…

इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका हिन्‍दी चिटठा जगत में स्‍वागत है। आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को मजबूत बनाने के साथ ही साथ खुद भी बडी उंचाइयां प्राप्‍त करेंगे। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

नारदमुनि ने कहा…

dharm ke naam par ladne wale adharmi hain. narayan narayan

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल व शेर के लिए मेरे ब्लोग पर सादर आमंत्रित है ।
मेरी पत्रिका
www.zindagilive08.blogspot.com

raja ने कहा…

aesi bat nhi ki hindu ,muslim sikh isaai 'drmon ko mnushy ne bnay he mnushy ne jo kuch bnaya usne tbahi hi mchai he ,jese boom bandh jinke tutne ka bhy rhta he metose acha udahrn or kya hoga bhut hi hifajti chij bnai thi .hindu dhrm me sbse phle snatn purush dwara snatn dhrm bnaya gya tha phir apne apne khan pan rhn shn ke anusar usi snatn dhrm ke smrthk hindu dhrm me jati rupme muslim sikh isai or in charon me phkir smrthk ke rup me awtrit hue hen jo ant kal me apna apna hisab kitab dene ko usi bhgwan ke pas jate hen yh us ki mrji he kise wh godi me bithata he ya khin or lga deta he

बेनामी ने कहा…

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