बुधवार, 2 मार्च 2011

क़ुरआन और विज्ञान (1)

क़ुरआन के ईश-वाणी होने के लिए यह प्रमाण काफी है कि उसने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व उन वैज्ञानिक बातों की भी चर्चा की है जिसकी खोज विज्ञान आज के युग में कर सका है इस प्रकार के विभिन्न वैज्ञानिक तथ्य क़ुरआन में बयान किए गए हैं। "पवित्र क़ुरआम कोई विज्ञान की पुस्तक नहीं है अपितु मार्गदर्शक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में छ हज़ार से अधिक आयतें हैं उनमें से एक हज़ार से अधिक आयतों का सम्बन्ध विज्ञान से है।" (क़ुरआन और आधुनिक विज्ञान डा0 ज़ाकिर नाइक पृष्ठ 12)

हम निम्म में कुछ प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं:

भ्रूण का विकासः
पवित्र क़ुरआन में मानव भ्रूण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को इस प्रकार बयान किया गया हैः
" हमने इनसान को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बुंद बना कर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़ा का रूप दिया। फिर हमने उस लोथड़े को बूटी का रूप दिया। फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाईँ। फिर हमने उस हड्डियों पर मास चढ़ाया। फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप दे कर खड़ा किया।" ( सूरः 23 आयत 12-14)

कनाडा यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर मूरे इस आयतों के सम्बन्ध में लिखते हैं:
"अत्यधिक अनुसंधान के पश्चात जो तथ्य हमें क़ुरआन और हदीस से प्राप्त हुए हैं वास्तव में वह बहुत चौंकाने वाले हैं क्योंकि यह तथ्य सातवीं ईसवी के हैं जब भ्रूणकी के बारे में बहुत कम अध्ययन हुआ था। भ्रूण के सम्बन्ध में सब से पहला अनुसंधान जो ऐरिक स्टेट द्वारा टिकन के अण्डे पर किया गया उसमें भी इस अवस्थाओं का बिल्कुल उल्लेख नहीं है।"


इसके बाद प्रोफेसर मूरे ने अपना निष्कर्ष कुछ इस प्रकार दिया हैः
"हमारे लिए स्पष्ट है कि यह तथ्य मुहम्मद सल्ल0 पर अल्लाह की ओर से ही आया है क्योंकि इस (भ्रुणकी) सम्बन्ध की खोज हज़रत मुहम्मद सल्ल0 की मृत्यु के बहुत बाद में हुई। यह हमारे लिए स्पष्ट करता है कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए संदेष्टा हैं।"
( Moore, K.L, The Development Human, 3th Edition, W.B Saunders co. 1982)


यातनाएं खाल को होती हैं शरीर को नहीं:
प्रोफेसर तेगासान ने जब सन्1995 में रियाज़ (सऊदी अरब) में होने वाली सभा में निम्न आयत पर चिन्तन मनन कियाः
" जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया उन्हें हम जल्द ही आग में जोंकेंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे ताकि वह यातनाओं का मज़ा चखते रहें"।
तो अन्त में उन्होंने अपना विचार इन शब्दों में व्यक्त किया :
" मैं विश्वास करता हूं कि क़ुरआन में जो कुछ भी 14-00 वर्ष पूर्व लिखा जा चुका सत्य है जो आज अनेकों वैज्ञानिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल0 पढ़े लिखे न थे अतः वह अल्लाह के संदेष्टा ही हैं और उन्होंने योग्य सृष्टा की ओर से अवतरित ज्ञान को ही समस्त मनुष्यों तक पहुंचाया, वह योग्य सृष्टा अल्लाह ही है। इस लिए लगता है कि वह समय आ गया है कि मैं गवाही देते हुए पढ़ूं: " ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए (अन्तिम) संदेष्टा हैं।"
यही वह वैज्ञानिक तथ्य था जिस से प्रभावित हो कर उसी समय उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया।


पहाड़ों की सृष्टि की हिकमतः
विज्ञान ने आधुनिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि पहाड़ों की जड़ पृथ्वी के नीचे हैं जो पृथ्वी को डुलकने से बचाता है और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। इस तथ्य की ओर क़ुरआन ने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व संकेत कर दिया थाः "क्या हमने पृथ्वी को बिछौना और पर्वतों को मेख़ नहीं बनाया?" । ( सूरः 78 आयत 6-7) एक दूसरे स्थान पर फरमायाः " और हमनें ज़मीन में पहाड़ जमा दिए ताकि वह इन्हें ले कर ढुलक न जाए"। ( सूरः 21 आयत 31)


3 टिप्‍पणियां:

tabish shams ने कहा…

bilkul shi frmaya hi sifat sb quran ny ji bhot phly bta diya hi usko aaj viggyan bhi man rha hi issy yha pta chlta hi ky quran ek sachchi or asmani kitab hi . or iski sb baty isi thr schchi hi. allah sabo isy smjhny my mdad kry.aamin.

Saurabh Goyal ने कहा…

भाई साहब एक बात बताओ...
करोडो वर्षो पूर्व जब पृथ्वी पर पानी ही पानी था जब तो वेह लुढकी नहीं...कैसी बच्चो वालो बात करत्ते हो ..............

Saurabh Goyal ने कहा…

भाई साहब एक बात बताओ...
करोडो वर्षो पूर्व जब पृथ्वी पर पानी ही पानी था जब तो वेह लुढकी नहीं...कैसी बच्चो वालो बात करत्ते हो ..............