बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

सब से महत्वपूर्ण समस्या

आज धरती पर मानव विभिन्न समस्याओं में ग्रस्त है परन्तु इन सारी समस्याओं में सब से महत्वपूर्ण समस्या अपने ईश्वर, स्वामी औऱ पालनकर्ता से अवगत न होना है। क्या यह खेद की बात नहीं कि पैदा किसने किया औऱ सम्बन्ध किसी दूसरे से जोड़ा जा रहा है? क्षमा कीजिएगा यदि आज किसी साधारण व्यक्ति से पूछा जाए कि वह किसकी पूजा करता है? तो वह तुरन्त धरती पर पाए जाने वाले किसी पूज्य का नाम बताएगा। उदाहरण-स्वरुप वह कहेंगा राम जी की, कृश्रण जी की ,विष्णु जी की... या जो उसके पूज्य होंगे उनका नाम लेगा। ऐसे लोग सुबह करते हैं तो उनका नाम चपते हैं, शाम करते हैं तो उनका नाम जपते हैं। क्योंकि पूजा की जो भावना उनकी प्रकृति में डाल दी गई है यह उसी का व्यवहारिक रूप है। पर जरा दिल पर हाथ रखें। मन को टटोलें और बुद्धि लगायें तो शायद आपको यह समझ में आएगा कि वह तो मानव थे ना.....। हमारे जैसे ही जन्म लिया था ना...., हमारे जैसे ही उनको खानपान की आवश्यकता पड़ती थी ना.....। उन्हें नींद और ऊंघ भी आती थी। उन्होंने अपना सारा जीवन एक मानव के समान बिताया। स्वयं आज उनकी मूर्तियाँ इस पर प्रमाण हैं। अब प्रश्न यह है कि जब वह हमारे पूज्य ठहरे तो उनके पूज्य कौन थे? उनके भी तो कोई पूज्य रहे होंगे ना....। उनकी रचना किसने की थी ?.... वह तो एक इंसान थे ना....।
आप इसका उत्तर यह देंगे कि " यार! वह तो ईश्वर के रूप में आए थे, उनकी पूजा ईश्वर की पूजा है।" पर हमें कहने दिया जाए कि क्या यह कल्पना ईश्वर की महिमा को तुच्छ सिद्ध नहीं करती। जो ईश्वर सारे संसार का सृष्टा, पालनपर्ता और स्वामी है उसके सम्बन्ध में यह कैसे सोचा जा सकता है कि मानव मार्गदर्शन हेतु स्वयं किसी मानव का वीर्य बन जाए, किसी महिला के गर्भ से जन्म ले, फिर लोग ऐसी स्थिति में उन्हें मानव ही ना समझेंगे.... ? उनके साथ मानव जैसा ही ना व्यवहार करेंगे….?
सत्य यह है कि यह सब काल्पनिक बातें हैं , धार्मिक गुरुओं पर बहुत बड़ा अत्याचार हुआ है, जिन्होंने मानव मार्गदर्शन का काम किया था आज लोग उन्हीं की पूजा कर रहे हैं।
ईश्वर जिसने राम, कृश्रण, विष्णु सब की रचना की, उसी का उपकार है कि हम इस धरती पर चल रहे हैं, उसी ने हमारी रचना की जब कि हम तुच्छ वीर्य थे, अपने से कुछ कर नहीं सकते थे, वह माँ जिसके गर्भ में हम पैदा हुए हमारी रचना में उनका कोई हस्तक्षेप न रहा। तब ही तो बुद्धि कहती है कि जिस ईश्वर ने हमें इतना अच्छा रूप दिया है उसी ईश्वर की पूजा होनी चाहिए , उसका भागीदार नहीं होना चाहिए। यह संदेश यदि किसी धर्म ने दिया है तो वह है इस्लाम। क्योंकि यह मानव बुद्धि के अनुकूल धर्म है। सम्पूर्ण मानव के लिए उसके ईश्वर का अवतरित किया हुआ बहुमूल्य उपहार है। इसका सम्बन्ध किसी जीति अथवा देश से नहीं। जिस प्रकार हवा, पानी, धरती और आकाश से हम लाभांवित होते हैं उसी प्रकार इस्लामी नियम से लाभांवित होना तथा उसे मुक्ति का साधन बनाना सारे मानव का कर्तव्य है।
सत्य जहाँ भी मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। वह व्यक्ति सत्य को कदापि नहीं पा सकता जो सत्य के रास्ते में पूर्वजों के रीति रेवाज की ओर देखता हो । तो आइए विशाल हृदय से अपने ईश्वर के संदेश को जानने का प्रयास करें।
यदि हमने अपने ईश्वर का सही ज्ञान प्राप्त कर लिया तो समझ लें कि सारे मानव एक हो गए। सब भाई भाई बन गए। मस्जिद तथा मंदिर की समस्या समाप्त हो गई।

11 टिप्‍पणियां:

Pandit Kishore Ji ने कहा…

sahi farmaya aapne

संगीता पुरी ने कहा…

सत्य जहाँ भी मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। वह व्यक्ति सत्य को कदापि नहीं पा सकता जो सत्य के रास्ते में पूर्वजों के रीति रेवाज की ओर देखता हो । तो आइए विशाल हृदय से अपने ईश्वर के संदेश को जानने का प्रयास करें।
यदि हमने अपने ईश्वर का सही ज्ञान प्राप्त कर लिया तो समझ लें कि सारे मानव एक हो गए। सब भाई भाई बन गए। मस्जिद तथा मंदिर की समस्या समाप्त हो गई।

बहुत सटीक लिखा आपने .. कुरान के बारे में तो मुझे कोई जानकारी नहीं .. पर असली मानव धर्म धारण करने योग्‍य व्‍यवहार हैं .. मंदिर और मस्जिद की कोई अहमियत नहीं !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

परिश्रम से लिख गया बढ़िया आलेख!

मोहम्मद कासिम ने कहा…

achhi jankari ki liye sukriya

safat alam taimi ने कहा…

संगीता पुरी साहिबा!
सब से पहले हम अपने ब्लौग में आपका स्वागत करते हैं। धन्यवाद। दूसरी बात यह है कि क़ुरआन के अनुसार जो धर्म धरती पर मानव के लिए आया वह इस्लाम ही है जिसका नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहा। जैसे भारत में सनातन धर्म। जिसका मूल उद्दुश्य था एक ईश्वर की पूजा तथा मूर्ति पूजा का खंडन। सब से अन्त में ईश्वर ने सम्पूर्ण मानव जाति के लिए संसार के मध्य में कल्कि अवतार अर्थात् मुहम्मद साहिब को भेजा जिन्होंने सम्पूर्ण संसार की मुक्ति का काम किया। आज उनका संदेश इस्लाम के रूप में पूर्ण रूप में सुरक्षित है। यह सम्पूर्ण संसार के लिए उसके ईश्वर की ओर से बहुत बड़ा उपहार है। बस ज़रूरत है कि इसे जानने की कोशिश की जाए। ईश्वर की दया हो आप सब पर। धन्यवाद

safat alam taimi ने कहा…

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक महोदय !
आपका सम्मान दिल में है। हम आपकी कविताओं के प्यासे रहते हैं। इस ब्लौग पर हम जो कुछ लिखते हैं वह दिल के निकली हुई बातें होती हैं जिन्हें दिलों तक पहुंचाना हमारा उद्देश्य होता है। इन बातों को वही लोग समझ सकते हैं जो इन पर चिंतन मनन करें।
डा0 साहिब! ईश्वर का हम सब नाम लेते हैं पर उस महान ईश्वर को बहुत कम लोग पहचान रहे हैं। यह हमारे जीवन का सब से मूल प्रश्न है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। धन्यवाद

HINDU TIGERS ने कहा…

यही इस्लाम की और उसे मानने बालों की असली समस्या है वे अपने शिवा किसी और के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते ।इसी बजह से सब मुसलिमबहुल क्षेत्रों में मारकाट मची हुई है। भगवान एक है इशु, अल्हा और विश्णु उसके विभिन्न नाम हैं।जिस दिन मुसलमानों को सह बात आ जाएगी उस दिन यो सारी मारकाट अपने आप खत्म हो जाएगी। अगर आपने यह लेख अनजाने में लिखा तो भगबान आपको माफ करे।

safat alam taimi ने कहा…

HINDU TIGERS… साहिब !
दिल की बात मैं कैसे बताओं, बस आप समझ लीजिए कि मैं आप के धरोहर ही का परिचय करा रहा हूं। यह हमारी समस्या नहीं बल्कि हमारा आप से प्रेम है कि आप ही की अमानत का हम परिचय कराने बैठे हैं। बिल्कुल भगवान एक है, उसको विभिन्न नाम से पुकारा जाता है परन्तु वह भगवान जो चार हाथ और आठ पैर रखता है। हम उस भगवान को मानते अवश्य है पर पहचानते नहीं हैं। यदि उसी ईश्वर का सही परिचय करा दिया जाए ताकि लोग अपने ईश्वर को पालें तो यह कैसी सहानुभूति होगी मेरे भाई। यही बात तो मैं समझाना चाहता हूं। इसी के लिए हमारे रातों की नींद समाप्त रहती है।
याद रखें कि सारे मानव एक हैं।
उन का पैदा करने वाला भी एक है।
उनकी रचना भी एक ही प्रकार से होती आ रही है।
तो उनका जीवन व्यवस्था अलग अलग कैसे हो सकता है। कभी आपने इस विषय पर गौर किया कि आज धरती पर सारे लोग एक ईश्वर का नाम ले रहे हैं पर इनसानों की पूजा कर रहे हैं। इस्लाम ही ऐसा धर्म है जो ईश्वर का सही परिचय कराता है और उसी एक ईश्वर की पूजा की ओर सारे मानव को बोलाता है।
ईशू, अल्लाह, तथा विश्णु एक नहीं। हाँ ईशू एक मानव थे बल्कि कुरआन के अनुसार संदेष्टा थे लेकिन आज ईसाइयों ने उनको ईश्वर का बेटा मान लिया। विश्णु का भी आज हम रूप देख रहे हैं जबकि ईश्वर रूप नहीं लेता वेदों का संदेश है (न तस्य प्रतिमा अस्ति)ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं बन सकती। यही बात तो हम कहते हैं। क्योंकि क़ुरआन सत्य का परिचय कराता है। एक बार क़ुरआन का अध्ययन करके देख लें। आज आपके ईश्वर का सुरक्षित ग्रन्थ इस धरती पर केवल क़ुरआन है। पता चल जाएगा कि हम जिसका विरोद्ध कर रहे थे वह तो हमारा ईश्वर ही है जिसे हमनें अज्ञानता के कारण मानव का रूप दे दिया था। धन्यवाद

मोहम्मद कासिम ने कहा…

bhut achhi baat

welcome to my blog

sim786.blogspot.com

जीवन का उद्देश ने कहा…

बहुत बहुत धन्यबाद, आप का लेख सुन्दर ही नही अति सुन्दर है। अल्लाह से मेरी प्रार्थाना है कि आप का लेख सुन्दर से सुन्ररतम होता रहे और आप को स्वस्थ तथा खुशहाल रखे आमीन। या रब्ह,

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत अच्छा एक तथ्य परक लेख ! शुभकामनायें