ज़कात
इस्लाम के पाँच स्तम्भों में से एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है,यह
हृदय को बख़ीली और कंजूसी से शुद्ध करती है और दानशीलता लाती है, सहानुभूति और निर्धनों की
सहायता की भावना पैदा करती है और जब हम अपने पैदा करने वाले के समक्ष उपस्थित
होंगे तो उसका पुण्य भी बड़ा लाभदायक और सफलतायोग्य होगा। ज़कात कोई देक्स नहीं
जिसे एक मुसलमान बोझ समझ कर अदा करता हो, बल्कि यह माल के निश्चित सीमा तक पहुंच जाने के पश्चात हर
एक हज़ार पर पचीस रूपये हैं जिसे एक मुसलमान दिल की खुशी से अदा करता है और उसकी
अदाएगी से न घबराता न भागता है यहाँ तक कि यदि उसके पास कोई लेने वाला न जाए फिर
भी उसे अदा करता है। हर समाज में धनवानों और निर्धनों का वजूद होता है, समाजवाद ने
उत्पादन को जनता की संयुक्त संपत्ति बना दिया जिसके कारण कुछ ही वर्षों में अपनी
मौत मर गया, उसकी
तूलना में पूंजीवाद ने व्यक्ति को उत्पादन का ऐसा मालिक बना दिया
जिस में दोसरों का कण बराबर अधिकार नहीं रखा गया, इसी प्रणाली के कारण आज धनवान अधिक धनवान हो रहा है और निर्धन
अधिक निर्धन हो रहा है, इस्लाम
ने प्राकृतिक व्यवस्था यह दिया कि इंसान अपनी मेहनत से जो कुछ कमाता है वह उसी की
संपत्ति है लेकिन उसके माल में समाज के गरीबों और निर्धनों का भी अधिकार है। यही
ज़कात है जिससे धनवानों और निर्धनों के बीच परस्पर प्रेम पैदा होता है, यदि ऐसा न हो तो समाज में
चोरी डकैती, लूट
मार और अशान्ति आती है। इसी से आप इस्लाम की महानता को समझ सकते हैं कि इस्लाम ने
धनवानों पर ज़कात अनिवार्य करके मानवता के साथ कितनी बड़ी सहानुभूति की है।

हमारे देश भारत में हर धर्म एवं पथ के मानने वालों का अनेकता में एकता का प्रदर्शन करना हर्ष का विषय है परन्तु खेद की बात यह है कि एक दूसरे के प्रति हमारा ज्ञान सुनी सुनाई बातों, दोषपूर्ण विचार तथा काल्पनिक वृत्तांतों पर आधारित है। आज पारस्परिक प्रेम हेतु धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में जानने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य के अन्तर्गत यह ब्लौग आपकी सेवा में प्रस्तुत है। हमें आशा है कि पाठकगण निष्पक्ष हो कर अपनी भ्रांतियों को दूर कर के सही निर्णय लेंगे।
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